कबीर का मानवतावाद (लेख)

 कबीर का मानवतावाद
- सीमा कुमारी .

कबीरा तुमने क्या पाया, सच से नेह लगाए
सच का दर्पण या जग में कौड़ी मोल बिकाये।

कबीरदास को इस लोक में अवतरित हुए लगभग सवा छः सौ वर्ष से अधिक समय बीत चुका है लेकिन समय आज भी वहीं का वहीं ठहरा हुआ है। कबीर यदि आज भी होते तो उसी तरह जंजीरों में बांधकर डूबोए गए होते, हाथी के पैरों तले रौंदवाए गए होते और यकीन मानिए कबीर तब भले ही बच निकले हो आज बचना नामुमकिन होता। कबीर ने समाज को सच का आइना दिखाने का जो दुस्साहस किया उसकी सजा हर युग में एक समान होती है।  मैं कबीर को भगवान या कोई अवतारी पुरुष नहीं मानता हूं। मेरी नजर में वे एक नायक की तरह हैं जिसका इस समाज में पैदा होकर विकसित होना आश्चर्य की बात कदाचित नहीं है। उन्हें भगवान या अवतारी पुरुष की संज्ञा देकर लोग उन्हें आमजन से अलग कर देने पर उतारू होते हैं ताकि यह साबित कर दिया जाए कि कबीर ने जो किया वह करना किसी आमजन के लिए, किसी सामान्य पुरुष के लिए संभव नहीं है। जबकि होना यह चाहिए कि लोग कबीर से प्रेरणा लेकर सच के मार्ग पर अडिग रहें। समाज को सन्मार्ग पर लाने की लड़ाई में खुद आगे बढ़ें न की किसी अवतार की प्रतीक्षा करें। कबीर में विद्रोही तत्व कूट-कूट कर भरा था। उनका विद्रोह था- सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक पाखंडों के प्रति। विद्रोही उनसे पहले भी हुए और उनके बाद भी लेकिन और लोगों का विद्रोह सुरक्षित विद्रोह होता था, लोग एक पांव उठाने से पहले दूसरा पांव कस कर जमा लेते थे। यानी जहां औरों का विद्रोह चालाकियां से भरा था वही कबीर का विद्रोह उन्मुक्त था। कबीर ने यदि हिंदुओं का प्रपंच उघाड़ा होता तो मुसलमानों का समर्थन प्राप्त होता और मुसलमानों की धूर्तता उजागर करते तो हिंदुओं का शह मिलता। लेकिन नहीं, युगों में कभी-कभी कोई ऐसा योद्धा भी पैदा होता है जो सारी दुनिया से अकेला लड़ता है। कबीर की लड़ाई मानवों के विरुद्ध मानवता के लिए थी।
कबीर के दर्शन में सबसे बड़ा महत्व 'मानवतावाद' का था। उनका मानना था कि मानव-जीवन में सभी धर्मों से ऊंचा स्थान दया और प्रेम का है। जीवन में प्रेम के पाठ को कबीर ने वेदों और कुरानों के पाठ से ज्यादा महत्व दिया है।
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोई
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।

यहां महत्व की बात यह है कि कबीर के द्वारा निर्दिष्ट-प्रेम इतना आसान भी नहीं है। इस प्रेम में 'मैं' को पूरी तरह 'उस' में लीन कर देना होता है।
लाली मेरे लाल की जित देखूं तित लाल
लाली देखन मैं गई मैं भी हो गई लाल ।

कबीर का यह प्रेम सही मायने में मानवतावाद की सुंदर तस्वीर है जिसके अंदर समस्त विश्व  समाहित है। उनका मानवतावाद किसी व्यक्ति या वर्ग-विशेष पर केंद्रित नहीं है, अपितु समष्टिगत है। कबीर उन धार्मिक उन्मादियों की तरह नहीं थे जिन्हें गाय से हमदर्दी है लेकिन भैंस या बकरी से नहीं। वे हत्या को घृणित कार्य मानते हैं, वह हत्या गाय की हो या बकरी की इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
जाका दूध धाय कर पीजे ता माता का वध क्यों कीजे।
*               *            *
बकरी पाती खात है ताकि काढ़ी खाल
जो जन बकरी खात है ताको कौन हवाल।

यह सवाल आज भी यक्षप्रश्न की तरह मुंह बाए खड़ा है कि बकरी की हत्या पुण्य कैसे है ? जिस गाय की हत्या एक धर्म में अक्षम्य अपराध है उसकी हत्या दूसरे धर्म में जिहाद कैसे हो सकता है ? समाज की इन्हीं विसंगतियों पर प्रहार करते हुए कबीर ने पूरी दुनिया को वैरी बना लिया था। मजे की बात यह है कि जिस कबीर ने 'पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजू पहाड़' कहकर मूर्ति पूजन का विरोध किया उसी कबीर के अनुयायियों ने कबीर की मूर्ति बनाकर उनका मंदिर बनवा दिया।
'जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ' कहकर व्यर्थ के संचय का विरोध करने वाले कबीर के शिष्यों ने उनके नाम पर मठों का निर्माण कर लोभ का अड्डा जमा लिया।
           कबीर का मानव दर्शन आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके समय में था। बल्कि आज उनका मानवतावाद और भी ज्यादा प्रासंगिक हो उठा है। धर्म-संप्रदाय के नाम पर, जातिभेद के नाम पर, जो सामाजिक पतन हो रहा है उसका समाधान कबीर के साहित्य में मौजूद है। आज भी धर्म दिखावे मात्र की वस्तु रह गई है। कबीर ने धर्म में पवित्रता का महत्व स्थापित करते हुए बतलाया कि धर्म का संबंध आत्मा से होना चाहिए न कि बाह्य जीवन से। व्यक्ति के प्रतिष्ठा का आधार उसका कर्म होना चाहिए न कि उसकी जाति और गोत्र। आज का समाज कहने को ग्लोबल हो रहा है लेकिन बाजारवाद ने दुनिया को जितना करीब लाया है व्यक्तिगत स्वार्थ ने आदमी को आदमी से उतना ही दूर कर दिया है। कबीर ने मानवीय-स्वार्थ को मेटने का प्रयास करते हुए कहा था, 'मन लागा मेरे यार फकीरी में।'
और यहीं विश्व-बंधुत्व की बात करते हुए वे कहते हैं,
'जो रस गागर निबुआ में सो रस नहीं जमीरी में।'
पूरे संसार में आपसी द्वेष और घृणा का बोलबाला है। कहीं भी मनुष्य के हृदय में दूसरे मनुष्य या प्राणी के लिए दया भाव नहीं दिखता है। लोग स्वार्थ में ऐसे लिप्त हैं कि अपने अलावा किसी को कुछ समझते ही नहीं, मानवता, जैसे पूरी तरह में शिथिल पर चुकी है। मानवीय सद्भावना पूरी तरह से लुप्त हो चुका है। ऐसे समय में कबीर की वाणी मानवीय हृदय में मानवता को जगाने का एक सार्थक प्रयास प्रमाणित होता है जहां कबीर कहते हैं कि हरेक प्राणी में ईश्वर का वास है। कण-कण में उस ईश्वर का तत्व मौजूद है, इसलिए मनुष्य को प्राणी मात्र पर दया करना चाहिए। कटु वचन बोलकर किसी का हृृदय दुखाना पाप है,
'घट घट में वह साईं रमता, कटुक वचन मत बोल रे।'
मनुष्यों ने हर तरफ जो घृणा फैला रखा है वह समाज को गंदा करने के अलावे और कुछ नहीं कर रहा। ऐसे घृणित, गंदगीयुक्त समाज में मनुष्यों का रहना संभव नहीं है। मनुष्य के लिए तो ऐसे संसार की निर्मिति परम आवश्यक है जहां प्रेम का महत्व हो, लोग प्रेम की अधीनता स्वीकार कर सच्ची मानवीय संवेदनाओं के साथ जीवन व्यतीत करते हों। कबीर का मानना है कि हम लोग प्रेम नगर के निवासी हैं और यहां उसी का निवास हो सकता है, वही सुखी रह सकता है जो निस्वार्थ भाव से श्रद्धा और सबूरी में अपना जीवन व्यतीत करता हो,
'प्रेम नगर में रहन हमारी, भल बनि आइ सबूरी में।'
        आर्थिक रूप से आज का समाज जिन दो वर्गों में बंटा हुआ है उसके बीच की खाई दिनों दिन बढ़ती ही जा रही है। अमीर और अधिक अमीर होते जा रहे हैं, गरीबों की दशा ऐसी हो चली है कि उन्हें खाने को पर्याप्त मात्रा में अन्न भी नसीब नहीं हो पाता है। यह दूरी बाजारवादी दौर में निरंतर बढ़ती जा रही है, यहां देश के 95% पूंजी पर मात्र 2% लोगों का अधिकार है। ऐसे में लोगों के बीच असंतोष का बढ़ना सामान्य सी बात है और यह असंतोष लोगों के बीच असामान्य जीवन व्यवस्था को उत्पन्न करता है। ऐसे में कबीर की युक्ति कितनी प्रासंगिक हो उठती है जहां वे लोगों को उतना मिलने पर ही संतोष करने की बात करते हैं जितने से उनका काम चल सके। यदि लोग अपनी-अपनी जरूरत के अनुसार प्राप्त करके दूसरे के अधिकार का हनन करना छोड़ देते हैं तो निश्चित रूप से सामाजिक विसंगतियां काफी कम हो जाती है। कबीर कहते हैं,
 साईं इतना दीजिए जामे कुटुम समाय
 मैं भी भूखा ना रहूं साधु न भूखा जाए।

यहां पर आज के समय के ऐसे भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों- नेताओं को एक कड़ी फटकार मिलती है जो अपना वेतन तो प्राप्त करते ही हैं छोटे-मोटे काम के लिए भी गरीबों का रक्त चूसना अपना अधिकार समझते हैं।
कबीर ने जब लिखा,
पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजू पहाड़
ताते यह चाकी भली पीस खाए संसार।

यहां लोग कबीर की समीक्षा करते हुए इतना ही देख पाते हैं कि कबीर ने मूर्ति पूजन का विरोध किया है। मूर्ति पूजन का विरोध सिर्फ बाह्य आडंबर के लिए किए जाने वाले पूजा का विरोध है। कबीर कहीं भी धार्मिक आस्था को गलत नहीं बतलाते हैं बल्कि शुद्ध मन से किया गया धार्मिक आस्था तो कबीर के हृदय में बसता है। कबीर एक सच्चे भक्त थे जिनको भक्ति में दिखावा पसंद नहीं था। यहां दूसरी पंक्ति पर अगर गौर की जाए तब देखने को मिलता है कि कबीर कर्मवाद के समर्थक थे। उनका मानना था कि अगर पत्थर की पूजा की जाए तो वह पत्थर पूजने योग्य है जो कर्मरत है, जहां मानव का श्रम लगा होता है। चक्की के पूजे जाने का मतलब कर्म की पूजा है। मनुष्य यदि अपने कर्म को पूजा समझकर करता है तो वह निश्चय ही उसकी श्रेष्ठ साधना होती है।
ऐसे एक दो नहीं अनगिनत उदाहरण भरे पड़े हैं जहां कबीर ने मानवीय चेतना को जागृत करने का प्रयास किया है। ये सारे प्रसंग आज के समाज में भी प्रासंगिक हैं और आने वाले दिनों में भी इनकी प्रासंगिकता बरकरार रहेगी।
आज भी भारतीय जनमानस में जितनी प्रसिद्धि कबीर और तुलसी के पदों की है उतनी किसी अन्य रचना कि नहीं। समाज जैसे-जैसे विकसित हो रहा है उसकी सामाजिक-धार्मिक संकीर्णता बढ़ती जा रही है और कबीर प्रासंगिक होते जा रहे हैं। कबीर आज साहित्य की कक्षाओं में परीक्षा संबंधित पाठ मात्र बनकर रह गए हैं जब की आवश्यकता यह है कि लोग कबीर को जाने और उनके बताए मार्ग पर चलें। कबीर का मानवतावाद ही आज के मृतप्राय समाज को संजीवनी पिलाकर जिलाने में सक्षम है। आज भी समाज को ऐसे व्यक्ति की तलाश है जो सच बोलने की सजा जानते हुए सच बोलने का जोखिम उठाने को तैयार हो।

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