ताउम्र जिंदगी तन्हा ही बसर कर आया (गज़ल)

जिन्दगी  तू  मुझे  किस  मोड़ पर ले आया
एक बार फिर उसके दहलीज पर ले आया।

मैं  कतराता  रहा  हूं  जिसकी  राह में आने से
तू बहला कर मुझे उसकी जिन्दगी में ले आया।

सब झेला है, तेरी यह ठिठोली भी सह लूंगा
अपनी बिसात पर तू मुझे मोहरा बना लाया।

अपनी  पारी  तो हमने कभी खेली ही नहीं
वक्त मेरी जिन्दगी को खिलौना बना लाया।

अरे, तू मुझसे मिलने आया भी तो उस वक्त
जब मैं खुद  को खुद ही से जुदा कर आया।

अब तो दरवाजा खोल दे हवाओं के लिए 'अमित'
ताउम्र  जिंदगी  तन्हा  ही  बसर  कर  आया।

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