रिश्तों की हकीकत (लघुकथा)


रिश्तों की हकीकत (लघुकथा)

मनोहर रोज की तरह सुबह से ही अपनी नई गाड़ी को धोने-साफकरने में लगा हुआ था। यह उसके नित्यप्रति का नियम था कि घंटों अपनी गाड़ी को पहले पानी से धोता फिर सूखे कपड़े से पोछकर उस पर तेल लगाता। गाड़ी हमेशा चमचमाती रहती। मनोहर हमेशा ख्याल रखता कि गाड़ी पर कोई खरोच न आए। अपनी गाड़ी पर मनोहर का स्नेह जितना बढ़ता परिवार के प्रति उसका रूप उतना ही उग्र होता जा रहा था। आज जब उसने अपनी गाड़ी चमचमा कर लगाई उसके कुछ ही देर बाद उसका बड़ा भाई अपनी गाड़ी निकाल रहा था। भूलवश उसका पैर मनोहर की गाड़ी से जा लगा। बस फिर क्या था मनोहर ने अपने भाई (बड़े भाई) को जमकर लताड़ लगाया और यह कह कर माफ कर दिया कि, 'आज तुम्हारा दिन अच्छा था वर्ना अभी तक मैं थप्पड़ लगा चुका होता।' दो खरोच आई थी, एक गाड़ी पर दूसरा किसी के दिल पर। मनोहर कपड़े को तेल में भिगोकर गाड़ी का खरोच मिटाने लगा।

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