जिजीविषा (कविता)

थोड़ी खुशी और बहुत अचरज हुआ
यह देख कर कि
मेरे मोहल्ले का वह बुजुर्ग
अभी भी अपनी बदहाली में जिंदा है
दो बरस पहले
जब मैं उन्हें देखकर शहर गया था
यही महसूस किया
अब ये कुछ महीनों से ज्यादा नहीं जीने वाले
लेकिन उन्होंने कहा था,
'अभी मेरी जिंदगी लंबे अरसे तक चलने वाली है।
भीष्म याद है तुम्हें,
जिसने मृत्यु को अपने बस में कर रखा था?
मैं वैसा योद्धा तो नहीं लेकिन
मेरी जिजीविषा कतई कमजोर नहीं।
मेरे पांच पुत्र हैं
और मैंने संकल्प कर रखा है
मैं दम तोड़ूगा तो उसी समय जब
वे पांचों मेरे पास होंगे
और मैं जानता हूं
वह दिन आना कितना मुश्किल है।
जब से गए हैं मेरे बेटे गांव छोड़कर
कभी एक तो कभी दूसरा आता
तीन-चार दिनों में वापस चला जाता।
मुझे शिकायत उनसे नहीं
क्योंकि जानता हूं
गांव में उनके पास
जीविका का साधन भी नहीं
शहर में वे जीवन के प्रति संघर्षरत तो है
यहां तो संघर्ष करने को कुछ बचा ही नहीं।
मुझे याद नहीं अंतिम बार
कब इकट्ठे मेरे पास आए थे सभी
शायद तब जब उसकी मां का निधन हुआ था।
वह भी बाट जोहती रही थी
एक बार, सिर्फ एक बार
अपने सभी पुत्रों को एक साथ देख ले
फिर खुशी से मृत्यु के रथ पर सवार हो चले।
उसकी जिजीविषा शायद कमजोर थी
उसकी प्रतीक्षा डगमगा गई
सभी पुत्रों को एक साथ देखने से पहले ही
मृत्यु की गोद में समा गई।
उसके जीते जी तो सभी आ सके नहीं
हां, मरने के बाद
बर्षों बाद, जमा हुए थे वे।
लेकिन मैं अपने संकल्प पर अडिग हूँ
मैं तब तक मृत्यु को टाले रखूंगा जब तक
वे एक साथ मेरे पास नहीं आतें
मैं मरने के बाद
उन्हें अपने पास देखने की तमन्ना
नहीं कर सकता
मुझे तो जीते जी उन्हें देखना है।'

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