आज का भारतीय समाज और प्रेमचंद (लेख).

आज का भारतीय समाज और प्रेमचंद।

प्रेमचंद को हिंदी साहित्य में कथा सम्राट के रूप में स्मरण किया जाता है। किसी भी रचनाकार को सम्राट की उपाधि यूं ही नहीं मिल जाती है। सम्राट अपने क्षेत्र का एकछत्र राजा होता है। प्रेमचंद के साहित्य का जब हम अवलोकन करते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रेमचंद ने हिंदी साहित्य को मनोरंजन और तिलस्म के दलदल से उबार कर यथार्थ की उस भूमि पर स्थापित किया जहां से भारतीय साहित्य को एक नवीन उत्कर्ष प्राप्त हुआ।  आज जिस हिंदी साहित्य का डंका पूरे विश्व में बज रहा है उस हिंदी का स्वरूप खासकर गद्य का स्वरूप मनोरंजन के अलावे पाठकों को कुछ भी देने में असमर्थ था। हां कुछ उपदेश अवश्य मिल जाते थे लेकिन वे साहित्य समाज सापेक्ष नहीं थे। भारत के सामने जितनी बड़ी समस्या यह थी कि वह अंग्रेजों की पराधीनता से स्वतंत्रता अविलंब प्राप्त करें उससे बड़ी समस्या यह थी कि भारतीय जनमानस में व्याप्त कुरीतियों का निवारण जल्द से जल्द हो। शासन से त्रस्त लोगों की संख्या उतनी नहीं थी जितनी संख्या में लोग कुरीतियों और सामाजिक विडंबनाओं के कारण त्रस्त थे। कबीरदास के बाद ऐसा लगता था शायद भारतीय साहित्य में ऐसे व्यक्तित्व का जन्म अवरुद्ध हो गया हो जो समाज से सीधे साक्षात्कार कर सके। प्रेमचंद ने उस कमी को पूरा किया। प्रेमचंद का साहित्य किसानों-मजदूरों की समस्याओं को जन-जन तक पहुंचाती है। यह साहित्य ही वह दर्पण है जिसमें हम देख पाते हैं कि किस तरह से हमारे किसान, जिसे धरती का भगवान कहा जाता है; अपने चारों तरफ समस्याओं से ऐसे घिरा हुआ था कि उसका सांस लेना भी दूभर था। एक ओर रक्त चूसने वाली सामंती-प्रथा उसपर से सूदखोर महाजनी सभ्यता। आर्थिक विषमता के साथ-साथ समाज में जातिगत और धार्मिक ऊंच-नीच, सभी मिलकर किसानों-मजदूरों को निचोड़ने का काम कर रहे थे। किसानों के शरीर से सामंती-सभ्यता बूंद-बूंद रक्त निचोड़ने पर आमादा थी तो वहीं सामाजिक कुरीतियहां, जाति-भेद, उसकी हड्डियों को तोड़ देने पर उतारू हो गया था। प्रेमचंद का साहित्य, अपने समाज की सभी समस्याओं से सीधे टकराता है। तत्कालीन युग में स्त्रियों के साथ जिस प्रकार की समस्याएं बढ़ती जा रही थी, अनमेल विवाह, बाल विवाह, वह न सिर्फ स्त्री वर्ग को कमजोर कर रहा था बल्कि पूरा समाज ही बीमार होता जा रहा था। जिस बच्चे की माँ ही स्वस्थ नहीं होगी। मानसिक-शारीरिक तौर पर बीमार होगी उस बच्चे के स्वस्थ पैदा होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। ऐसे समय में स्त्रियों की इन समस्याओं को प्रेमचंद ने साहित्य के मार्फत समाज के सामने परोसने का काम किया। भारतीय समाज का कोई ऐसा वर्ग नहीं है जिसकी समस्याओं को प्रेमचंद ने नहीं छुआ हो। प्रेमचंद ने अपने 12 उपन्यास और 300 के लगभग कहानियों से हिंदी साहित्य के कोष को इस तरह लबालब भर दिया कि वर्षों तक हिंदी साहित्य विश्व के किसी भी साहित्य के समक्ष आंख मिलाने से झेपने वाली नहीं है। समाज की इतनी सारी विसंगतियों को एक साथ समाज में, साहित्य में निरूपित कर देना यह किसी भी रचनाकार की महानता को स्वयं सिद्ध कर देता है। प्रेमचंद के साहित्य की विपुलता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा है, 'यदि उत्तर भारत की सभ्यता-संस्कृति, रहन-सहन का परिचय आपको पाना हो तो प्रेमचंद से बड़ा परिचायक कोई हो ही नहीं सकता है।'
 प्रेमचंद के साहित्य की इन खूबियों के साथ एक बात जो सबसे अधिक ध्यान आकर्षित करती है वह है प्रेमचंद की भाषा-शैली। एक रूढ़ि रही है कि साहित्य की भाषा एक विशिष्ट भाषा होती है जो बोलचाल की भाषा से परिष्कृत, व्याकरणनिष्ठ और संस्कृतनिष्ठ समझी जाती है। प्रेमचंद ने पहली बार यह महसूस किया कि जिस साहित्य का उद्देश्य जनमानस की समस्याओं को निरूपित करना है उस साहित्य के शब्दों को, भाषा को, यदि वही वर्ग नहीं समझ पा रहा है तो ऐसे साहित्य का क्या महत्व है ? उन्होंने अपने साहित्य की भाषा के रूप में जनमानस की बोली को लिया। यही कारण है कि जिस प्रकार तुलसीदास के रामचरितमानस को जन-जन ने सर-आंखों पर धारण किया उसी तरह प्रेमचंद के साहित्य भी जनमानस में शिरोधार्य है। शिक्षित-अशिक्षित कोई ऐसा हिंदी भाषी वर्ग नहीं था जिसने प्रेमचंद की कहानियों को पढ़ा-सुना नहीं हो। आज भी प्रेमचंद की कहानियों से ही बच्चों में हिंदी साहित्य के प्रति रुझान जगाई जाती है। ईदगाह, बुढ़ी काकी, पंच परमेश्वर, जैसी कहानियों ने बच्चे, बुड्ढे, स्त्रियों, सभी को एक आकर्षण में बांध लिया। वहीं दूसरी ओर 'सवा सेर गेहूं', 'कफन',  'ठाकुर का कुआं', 'सद्गति जैसी कहानियां और 'गोदान', 'निर्मला', 'रंगभूमि', 'कर्मभूमि' जैसे उपन्यास भी हैं जिसने शिक्षित और सभ्य कही जाने वाली जनता को झकझोर कर रख दिया। यह सोचने पर विवश किया कि हम जिस समाज का निर्माण कर रहे हैं या जिस समाज के निर्माण की कल्पना कर रहे हैं उसमें समाज के बहुलांश को उपेक्षित रखकर कितनी बड़ी गलती की जा रही है।
आज के जनमानस की समस्या यह है कि यह धीरे-धीरे साहित्य से कटता जा रहा है। जो साहित्य लिखा-पढ़ा जा रहा है उसका दायरा सिमटकर साहित्यकारों तक संकुचित होता जा रहा है। साहित्य अपने में निहित अर्थ को तब तक व्यक्त नहीं कर सकता है जब तक इसका जुड़ाव सीधे-सीधे जनता से न हो। प्रेमचंद के समय की जो समस्याएं हैं वह आज भी पूरी तरह से समाप्त नहीं हुई है। आज भी प्रेमचंद की प्रासंगिकता जस-की-तस बरकरार है। बल्कि प्रेमचंद का साहित्य ही ऐसा है कि उसकी प्रासंगिकता किसी युग में समाप्त नहीं होगी। आज भी किसान अपनी समस्याओं से जूझते हुए फांसी लगा रहे हैं। जातिगत विवाद, जमीनी विवाद, समाज में बढ़ता जा रहा है। लोग शासन के अत्याचार से त्रस्त हैं। धार्मिक आडंबर और भी विकराल होता जा रहा है। धर्म और संप्रदाय की लपट तो इतनी भड़क उठी है कि कभी भी किसी भी निर्दोष को मार कर भीड़ अपने धर्म के नाम की चादर ओढ़ कर कानून से बच निकलती है और प्रशासन देखती रह जाती है। आज भी समाज में दहेज प्रथा को बहिष्कृत नहीं किया गया है, लोग दहेज के लोभियों को सम्मान की नजर से देखते हैं। दहेज के कारण, जाति-विभेद के कारण, कई लड़कियों के स्वप्न बलि चढ़ जाते हैं। आवश्यक है कि प्रेमचंद के साहित्य का व्यापक प्रचार-प्रसार हो जिससे लोगों की स्मृति से विस्मृत होता हुआ साहित्य फिर से लोगों को खुद से जोड़ सके। लोग उसे पढ़ें, लोगों के हृदय में समस्याओं से जूझने के लिए आत्मविश्वास जगे तभी प्रेमचंद के साहित्य को उसका वास्तविक सम्मान प्राप्त होगा। यही हिंदी समाज का वास्तविक रूप में प्रेमचंद के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

✍  अमित कुमार मिश्रा, अतिथि सहायक प्राध्यापक (तदर्थ) हिंदी, नंदलाल सिंह कॉलेज, दाउदपुर, जैतपुर, छपरा।

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