हिंदी साहित्य में स्वच्छंदतावाद

 हिंदी साहित्य में स्वच्छंदतावाद

- अमित कुमार मिश्रा। 

हिंदी साहित्य में स्वच्छंदतावाद का प्रादुर्भाव यूरोपीय साहित्य की प्रेरणा से हुआ | डॉ० बच्चन सिंह का मानना है कि पूर्वी यूरोप में स्वच्छंदतावाद का उद्भव सामंतवाद और विदेशी शासन के विरुद्ध हुआ | भारतीय स्वच्छंदतावाद अंग्रेजी के स्वच्छंदतावाद से प्रेरित न होकर पूर्वी यूरोप के स्वच्छंदतावाद से प्रेरित है | भारतीय साहित्य में इसका प्रवेश द्वार बांग्ला साहित्य है | उल्लेख्य है कि हिंदी में स्वच्छंदतावाद का कलेवर विशुद्ध भारतीय है | स्वच्छंदतावाद, अंग्रेजी रोमैण्टिसिज्म (Romanticism) का हिंदी रूपांतरण है | हिंदी में इस शब्द का प्रयोग पहली बार संभवतः आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ही अपने हिंदी साहित्य के इतिहास में, पं० श्रीधर पाठक की आलोचना के क्रम में किया |

"इस प्रकार की स्वछंदता का आभास पहले पहल पं० श्रीधर पाठक ने ही दिया | उन्होंने प्रकृति के रूढ़िबद्ध रूपों तक ही न रहकर अपनी आंखों से भी उसके रूपों को देखा |" 1

यहां यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि आचार्य शुक्ल ने श्रीधर पाठक को ही सच्चे स्वच्छंदतावाद का प्रवर्तक माना है और इस दृष्टि से वे छायावाद को स्वाभाविक स्वच्छंदतावाद की कोटि में शामिल नहीं करते हैं | श्रीधर पाठक, रामनरेश त्रिपाठी आदि के साहित्य में ग्रामीण परिवेश और प्रकृति का रूप वर्णन, शुक्ल जी को सच्चे स्वच्छंदतावाद के रूप में ग्राह्य है |

"सच्चे और स्वाभाविक विशेषण से यह संकेत मिलता है कि छायावाद को वे स्वाभाविक स्वच्छंदतावाद की कोटि में रखने के लिए तैयार नहीं थे | " 2

मूलतः 'रोमैण्टिसिज्म' शब्द की व्युत्पत्ति रोमांटिक शब्द से हुई है | अंग्रेजी में रोमांटिक शब्द की व्युत्पत्ति रोमांस शब्द से हुई है | इस शब्द का चलन आरंभ में फ्रांस में हुआ | इसका चलन वहां लैटिन भाषा के विरोध में फ्रांस की देशी भाषा के साहित्य के लिए हुआ | यह विरोध सांस्कृतिक प्रतिरोध था | रोमैण्टिसिज्म शब्द का व्यवहार आलोचकों ने 'क्लासिसिज्म' में के विरोध में किया है | इसे एक काव्यांदोलन का रूप देने का श्रेय जर्मन आलोचक 'फेड्रिक श्लेगल' को जाता है | उन्होंने 1798 ई० के आस-पास इसको आलोचना के क्षेत्र में व्यवहार में लाया | स्वच्छंदतावाद काव्य की शुरुआत 1798 - 1805 ई० के बीच इंग्लैंड और जर्मनी में हुई जो अलग-अलग समय में अनुकूल परिस्थिति पाकर भिन्न-भिन्न साहित्य में प्रकट हुई | स्वच्छंदतावाद की प्रेरक भूमि के रूप में पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को स्वीकारा गया है | चूंकि अलग-अलग देशों में सामंतवाद का अंत और पूंजीवाद का उदय अलग-अलग कालखंड में हुआ है अतः वहां के साहित्य में स्वच्छंदतावाद के आगमन का समय भी अलग-अलग है | सामाजिक-सांस्कृतिक भिन्नता के कारण वहां के साहित्य में स्वच्छंदतावाद के स्वरूप में भी भिन्नता लक्षित होता है | फ्रांसीसी स्वच्छंदतावाद को उसके अविवेकी उच्छृंखलता के कारण जनता में 'जहर फैलाने वाला सिद्धांत' तक कहा गया है | यहां तक कि एक आलोचक ने स्वच्छंदतावाद को रोग और जिस क्लासिसिज्म के विरोध में यह पनपा था उसे स्वास्थ्य तक कह डाला | यह बात जर्मन और फ्रांस के साहित्य में भले हीं सटीक बैठता हो, अंग्रेजी या हिंदी साहित्य के लिए सर्वथा अनुचित है | स्वच्छंदतावाद को रोग कहने के पीछे आलोचक की मंशा संभवतः उसमें व्याप्त निराशा और असंतोष की ओर ध्यान आकृष्ट करना है | जर्मनी और फ्रांसीसी साहित्य में यह बहुधा सटीक भी बैठ जाता है लेकिन अंग्रेजी और हिंदी साहित्य का स्वच्छंदतावाद हताशा या असंतोष तक सीमित नहीं है | अंग्रेजी साहित्य में स्वच्छंदतावादी काव्य परंपरा को विलियम ब्लेक, वर्ड्सवर्थ, कॉलरिज, शैली, कीट्स, बायरन, जैसे कवियों ने अपनी विलक्षण प्रतिभा से समृद्ध किया है | हिंदी में स्वच्छंदतावाद, छायावाद जैसे दैदीप्यमान काव्यांदोलन के रूप में प्रतिष्ठित है | 

स्वच्छंदतावाद के उद्भव और स्वरूप की चर्चा करते हुए डॉ० कृष्णदत्त पालीवाल ने लिखा है-

"पश्चिम में अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में जो विशाल सृजन-आंदोलन पुराने रीतिवाद-आभिजात्यवाद के बंधनों को तोड़कर उठा था उसे रोमैण्टिसिज्म नाम दिया गया है | ठीक उसी ढंग का विशाल सृजन-आंदोलन भारतीय भाषाओं में बीसवीं शताब्दी में उठ खड़ा हुआ जिसमें साहित्य के पुराने रीतिवाद के प्रति खुला विद्रोह था | इसे विद्वानों ने उचित ही स्वच्छंदतावाद नाम दिया है |" 3

यूरोपीय साहित्य पर व्यापक प्रभाव डालने वाले स्वच्छंदतावाद (रोमैण्टिसिज्म) का स्वागत भारत में बांग्ला, मराठी, उर्दू, तमिल, कन्नड़, हिंदी जैसे प्रायः सभी समृद्ध भाषा के साहित्य में किया गया | इसमें स्वच्छंदतावाद के प्रथम दर्शन बांग्ला साहित्य में मिलते हैं | संपूर्ण भारत वर्ष में नवजागरण का आलोक फैलाने वाले स्वच्छंदतावाद का शुरुआती रूप 'माइकेल मधुसूदन दत्त' के साहित्य में दिखता है | यहां से होते हुए यह काव्यांदोलन अनेक भारतीय भाषाओं के साथ हिंदी साहित्य को भी व्यापक रूप से प्रभावित करता है | अलग-अलग भारतीय भाषाओं में रोमैण्टिसिज्म के लिए अलग-अलग संज्ञाओं का प्रयोग देखने को मिलता है | हिंदी और बांग्ला में स्वच्छंदतावाद, मलयालम में कल्पनाप्रधान काव्य, तेलुगु में भाव कविता आदि नामों का चलन मिलता है | हिंदी साहित्य में जन्मे स्वच्छंदतावाद का स्वरूप कहीं से भी यूरोपीय नहीं है, वह विशुद्ध भारतीय है | इस पर विदेशी रोमैण्टिसिज्म के बजाय कालिदास, उपनिषद, संत वाणी आदि का प्रभाव अधिक है | डॉ० कृष्णदत्त पालीवाल भारत में स्वच्छंदतावाद के मूल की समीक्षा करते हुए लिखते हैं-

"भारतीय नवजागरण के इस स्वच्छंदतावादी काव्य पर वाल्मीकि-कालिदास, वैष्णव-शैव परंपराओं की सीधी अनुगूंज थी | जयशंकर प्रसाद, केशवसुत, बल्लतोल, पुट्टप्पा आदि के सृजन साक्षी हैं कि ये कवि शुद्ध भारतीय स्रोतों से जुड़े रहे | विदेशी स्रोतों तथा उन स्रोतों से जुड़े बांग्ला स्वच्छंदतावादी काव्य की ओर इन कवियों ने कम मुड़कर देखा |" 4

आचार्य शुक्ल के द्वारा हिंदी स्वच्छंदतावाद को विदेशी-साहित्य से आयातित होने पर बल देने की समीक्षा करने पर आलोचकों ने यह निष्कर्ष निकाला की, हिंदी साहित्य में स्वच्छंदतावाद का पूर्व-रूप कहीं नहीं दिखता है, इसी बात को आधार बनाकर आचार्य शुक्ल इसे आयातित मानते हैं | 

हिंदी में स्वच्छंदतावाद ही प्रवृत्तियों के आगमन के संबंध में क्या तथ्य भी विचारणीय है कि परंपरागत (क्लासिक) परिपाटी से विरोध या नए रीतियों का चलन यहां भारतेंदु युग से ही परिलक्षित होने लगता है | यहां से स्वच्छंदतावाद के रेखांकित नहीं किए जाने का कारण सिर्फ इतना है कि इस युग में जो भी स्वच्छंद प्रवृतियां चलन में आयी वह सिर्फ गद्य में ही सिमट कर रह गई | कविता की भाषा के रूप में ब्रज भाषा को ही चलन में रहने दिया गया | आचार्य शुक्ल ने हिंदी में स्वच्छंदतावाद की शुरुआत पं० श्रीधर पाठक से माना, वही समीचीन भी जान पड़ता है | श्रीधर पाठक के बाद इस परंपरा को रायदेवी प्रसाद पूर्ण और रामनरेश त्रिपाठी ने आगे बढ़ाया | त्रिपाठी जी के काव्य स्वप्न, पथिक, मिलन, सभी स्वच्छंदतावादी प्रवृत्तियों से युक्त हैं | आगे चलकर जयशंकर प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी, माखनलाल चतुर्वेदी, हरिवंश राय बच्चन, नरेंद्र शर्मा, रामेश्वर शुक्ल 'अंचल' आदि के काव्य में स्वच्छंदतावाद का उन्मेष हुआ | जयशंकर प्रसाद का स्वच्छंद भाव-धारा तो अंग्रेजी के रोमैण्टिसिज्म से प्रेरित है न ही बांग्ला के | उन पर प्राचीन भारतीय पौराणिक काव्यों और कालिदास, माघ आदि का प्रभाव है | सुमित्रानंदन पंत पर अंग्रेजी और बांग्ला-रोमानी काव्य का प्रभाव कुछ-कुछ स्पष्ट जान पड़ता है | 'निराला' पर यह प्रभाव अपेक्षाकृत कुछ अधिक है | इसके बावजूद हिंदी कविता में जितना प्रयोग निराला ने किया है वह अन्यत्र दुर्लभ है | महादेवी वर्मा पर भी विदेशी या बांग्ला प्रभाव नगण्य है | माखनलाल चतुर्वेदी की कविताएं भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के परिदृश्य में नवीन उद्घोष है | बच्चन, नरेंद्र शर्मा, 'अंचल' आदि के गीतों में स्वच्छंद भावों को सर्वाधिक पराश्रय मिला है |

हिंदी साहित्य में स्वच्छंदतावाद और छायावाद को लेकर यह चर्चा बार-बार उठती रही है कि यह दोनों काव्यांदोलन एक ही है या अलग-अलग | हिंदी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली में डॉ० अमरनाथ ने दोनों की प्रवृत्ति के आधार पर इसमें साम्य होने का समर्थन किया है |

"छायावाद और स्वच्छंदतावाद में गहरा साम्य है | दोनों ही काव्यांदोलनों में प्रकृति-प्रेम, मानवीय दृष्टिकोण, आत्माभिव्यंजना, रहस्य-भावना, वैयक्तिक प्रेमाभिव्यक्ति, प्राचीन संस्कृति के प्रति व्यामोह, प्रतीक-योजना, निराशा, पलायन, अहं के उदात्तीकरण आदि के दर्शन होते हैं |" 5

यहां स्पष्टत: डॉ० अमरनाथ की मान्यता स्वच्छंदतावाद और छायावाद को प्रवृत्तिगत रूप में साम्य ठहराती है | 'आचार्य नंददुलारे वाजपेयी' ने स्वच्छंदतावाद से छायावाद के पृथक होने का समर्थन किया है तो वहीं 'डॉ० नामवर सिंह' ने स्वच्छंदतावाद को छायावादी कविता की एक प्रवृत्ति मात्र माना है | डॉ० जगदीश गुप्त स्वच्छंदतावाद और छायावाद के एक ही होने के समर्थक हैं |

"हिंदी में अभी तक जिसे छायावाद कहा जाता है, वह वस्तुत: अपने स्वरूपगत विशेषताओं के कारण स्वच्छंदतावाद ही है |" 6

'डॉ० बच्चन सिंह' का मानना है कि स्वच्छंदतावाद और छायावाद एक तो है हीं, छायावाद शब्द संपूर्ण स्वच्छतावादी प्रवृत्तियों को खुद में समाविष्ट भी नहीं कर पाता है अतः स्वच्छंदतावाद कहना ही उपयुक्त है |

"स्वच्छंदतावादी अपनी अर्थव्याप्ति में छायावाद को समाविष्ट कर लेता है | यह एक ओर भारतीय साहित्य से भी जुड़ जाता है और दूसरी ओर अंतर्राष्ट्रीय काव्यधारा 'रोमैंटिसिज्म' से भी | ऐसी स्थिति में इस युग का नामकरण स्वच्छंदतावाद युग अधिक संगत है |" 7

ध्यान देने वाली बात यह है कि सभी आलोचक इस काव्य-धारा के लिए 'स्वच्छंदतावाद' संज्ञा का समर्थन नहीं करते हैं | आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, कहीं इसके विरोधी मत प्रकट करते हैं तो कहीं समर्थन करते भी दिख जाते हैं | आचार्य द्विवेदी ने 'डॉ० देवराज उपाध्याय' की पुस्तक 'रोमांटिक साहित्यशास्त्र' की भूमिका लिखते हुए कहा है,

"कुछ विद्वानों ने इसे (रोमांटिसिज्म) हिंदी में स्वच्छंदतावाद कहा है, परंतु यह शब्द उस संपूर्ण साहित्य की आत्मा को प्रकट करने में समर्थ नहीं है |"

लेकिन यह भी ध्यान आकर्षित करता है कि 'हिंदी साहित्य: उद्भव और विकास' में उन्होंने रोमांटिसिज्म और छायावाद को समानार्थी रूप में प्रयुक्त किया है | वहीं कुछ अन्य नाम भी देखने में आते हैं जिसे स्वच्छंदतावाद के स्थान पर व्यवहार में लाने की कोशिश की गई है | रामधारी सिंह 'दिनकर' और डॉ० रामेश्वरलाल खंडेलवाल रोमांटिसिज्म के लिए हिंदी में 'रोमांसवाद' को प्रचलित करने की कोशिश की | श्याम किशोर मिश्र उन्मुक्तिवाद को रोमांटिसिज्म से ज्यादा करीब माना है |

स्वच्छंदतावाद के युग-चेतना को ध्यान में रखने से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि इस काव्यांदोलन का विकास-काल भारत में स्वाधीनता आंदोलन का उत्कर्ष काल था | फलत: स्वच्छंदतावादी काव्य में राष्ट्रीय भावधारा का चहुमुखी विकास हुआ | माखनलाल चतुर्वेदी, जयशंकर प्रसाद, निराला आदि के काव्यों ने जनजीवन में राष्ट्रीयता की भावना फूंक दी | अपने समग्र रूप में यह सांस्कृतिक जागरण का काव्यधारा है | इतना ही नहीं स्वच्छंदतावाद भारतीय-साहित्य में पहला काव्यांदोलन है जिसका फैलाव बिना किसी भाषा-भेद के संपूर्ण भारतीय-साहित्य में दिखाई पड़ता है | यह तो निश्चय है कि स्वच्छंदतावाद का जन्म रीतिवाद के विरोध में हुआ | यहां भाव-भाषा, अभिव्यंजना-शैली आदि के परंपरागत रीति को खंडित कर कविता में नवीनता का उन्मेष हुआ | आत्माभिव्यक्ति का स्वर तीव्र हुआ और कविता को नवीन भाव-भूमि प्राप्त हुई |

"स्वच्छंदतावाद का जन्म ही प्राचीन साहित्यिक परंपराओं, काव्यगत रीतिबद्धता और शास्त्रीय नियमों के विरुद्ध प्रतिक्रिया स्वरूप हुआ था, इसलिए इन कवियों में विद्रोह का स्वर मिलता है |" 8

हिंदी में यह विद्रोह काव्य में व्यक्त भाव के प्रति भी है और भावाभिव्यक्ति के प्रति भी | निराला जैसे कवियों ने मनुष्य की मुक्ति भी चाही और कविता की मुक्ति भी | निश्चय ही स्वच्छंदतावाद का जन्म काव्य रूढ़ियों को तोड़ने के क्रम में ही हुआ है | डॉ० विश्वनाथ त्रिपाठी ने लिखा है -

"जब जड़ शास्त्रीयता और प्रणालीबद्धता भावधारा को जड़-उबाऊ एवं गतकालिक बना देती है तब काव्यधारा का विकास स्वच्छंद मार्ग पर चलकर होता है | यह मार्ग लोकजीवन और प्रकृति के बीच से होकर जाता है | लोकजीवन काव्य को ताजगी देता है | इसमें थोड़ी बहुत रहस्य भावना भी आ जाती है | इस प्रवृत्ति को स्वच्छंदतावाद या रोमांटिसिज्म कहते हैं |" 9

इन विचारों से यह स्पष्ट हो जाता है कि साहित्य की परंपरा जब अपने रूढ़ियों के कारण जड़ होती जाती है तब उसके स्थान पर या उसके विरोध में स्वच्छंद प्रवृत्तियों का जन्म होता है | हिंदी साहित्य का 'छायावाद' पूर्णत: अपने पूर्व के साहित्य-धारा का विरोध करते हुए जन्मा और स्वच्छंद काव्य-प्रवृत्तियों एवं नवीन अभिव्यंजना-शैली का जन्मदाता बना |

हिंदी आलोचना के क्षेत्र में भी स्वच्छतावादी दृष्टिकोण का उदय छायावादी आलोचना के क्रम में हुआ | इस क्षेत्र में इलाहाबाद में गठित 'परिमल' संस्था का गठन महत्वपूर्ण है | इन आलोचकों में धर्मवीर भारती, केशवचंद्र वर्मा, लक्ष्मीकांत वर्मा, रघुवंश, विजयदेव नारायण साही, इलाचंद्र जोशी, अज्ञेय, देवराज आदि प्रमुख हैं | स्वच्छतावादी आलोचक साहित्य की आलोचना के क्रम में रूढ़ि प्रणाली का विरोध करते हैं | उन्होंने साहित्य को तत्कालीन विचारों से जोड़ते हुए उसकी आलोचना की |


संदर्भ सूची :

[1] शुक्ल, आचार्य रामचंद्र, हिन्दी साहित्य का इतिहास, जयभारती प्रकाशन, पृ०-399.

[2] सिंह, बच्चन, आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास, लोकभारती प्रकाशन, पृ०-137.

[3] पालीवाल, डॉ० कृष्णदत्त, भारतीय साहित्य का समेकित इतिहास, सं०- डॉ नगेंद्र, हिन्दी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय दिल्ली विश्वविद्यालय, पृ०-401.

[4] वहीं, पृ०-403.

[5] अमरनाथ, डॉ. , हिन्दी आलोचना के परिभाषिक शब्दावली, पृ०-389.

[6] गुप्त,  डॉ० जगदीश, स्वच्छंदतावादी काव्यधारा का दार्शनिक विवेचन, पृ०-37.

[7] सिंह, बच्चन, आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास, लोकभारती प्रकाशन, पृ०-137.

[8] डॉ० अमरनाथ, हिन्दी आलोचना के परिभाषिक शब्दावली, पृ०-390.

[9] त्रिपाठी, विश्वनाथ, हिन्दी साहित्य का सरल इतिहास, ओरियंट ब्लैकस्वॉन, पृ०-101.


- शोधार्थी, हिन्दी विभाग ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा। 

दूरभाष - 9304302308

ईमेल  - amitraju532@gmail.com 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

स्त्री अस्मिता और हिन्दी महाकाव्य (आलेख)

साहित्य की प्रासंगिकता. ( लेख.)

हिन्दी साहित्य में लघुमानव की अवधारणा, ( आलेख )