रेणु की पत्रकारिता में मानवीय संवेदना

रेणु की पत्रकारिता में मानवीय संवेदना 

अमित कुमार मिश्रा 

फणीश्वरनाथ रेणु का नाम हिंदी कथा साहित्य में जितने सम्मान से लिया जाता है उतने ही सम्मान से पत्रकारिता के क्षेत्र में भी लिया जाता है । उन्होंने कथा साहित्य में भी नवीन शैली (आंचलिकता) का प्रतिपादन किया और पत्रकारिता में भी नवीन शैली (रिपोर्ताज) की स्थापना की । हिंदी पत्रकारिता में रेणु ने रिपोर्ताज के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किए हैं । वैसे हिंदी रिपोर्ताज रेणु के लिखने से पहले ही विकसित हो चुका था लेकिन रेणु ने इस विधा को एक अलग पहचान दिलायी । रेणु के रिपोर्ताज की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए डॉ० अमरनाथ ने लिखा है-

”रेणु के रिपोर्ताज में भाव जगत का एक नया संदर्भ है, जिसमें अनेक क्रांतिकथाएं उभर कर आई हैं ।“

सच्चे अर्थों में रेणु ने पत्रकारिता की हीं नहीं, हिंदी जगत को वास्तविक पत्रकारिता से परिचय भी करवाया । आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने जब कहा कि ‘आरंभ में साहित्य और पत्रकारिता एक-दूसरे से घुले-मिले थे ।’ तब शायद पत्रकारिता और साहित्य विलग हो चुके थे लेकिन रेणु ने पुनः यह प्रमाणित कर दिया कि साहित्य और पत्रकारिता अब भी घुले-मिले हैं । रेणु के रिपोर्ताज मुख्य रूप से पटना से प्रकाशित ‘जनता’ में प्रकाशित होते थे । ‘जै गंगा’, ‘डायन कोशी’, ‘हिल रहा हिमालय’ आदि रिपोर्ताज अपने समय में काफी चर्चित हुए थे । ‘बिदापन नाच’ रेणु का पहला रिपोर्ताज है । उसके बाद 1947 के मार्च में (जनता में) ‘सरहद के उस पार’ छपा । उनके रिपोर्ताज की बानगी 1949 में किसान आंदोलन की रिपोर्ताज में देखी जा सकती है -

”गांधी जी का नाम लो, क्या सुबह-सुबह रोटी की रट लगा रखी है तुमने । नेहरू जी की बात सुनो, टबों में खेती करो, गमलों में अन्न ऊपजाओ, शकरकंद खाओ ।“

आज भी पूरे भारतवर्ष में किसान आंदोलन पर हैं। सरकार और किसानों के बीच ठनी पड़ी है। लेकिन रेणु जैसे किसी पत्रकार का होना मुश्किल है जो किसानों के बीच जाकर उनकी समस्या को, उनके बीच में रहकर महसूस करें। उस पर रिपोर्ट तैयार करें, लिखें।

फणीश्वरनाथ रेणु सच्चे अर्थों में पत्रकारिता का अर्थ जानते थे । उन्होंने अपने स्वभाव के अनुरूप ही इसका पालन किया । वे पत्र-संपादन मात्र का दायित्व निभाने वाले पत्रकार न होकर, लोगों के बीच काम करने वाले (थ्पमसक ूवता) पत्रकार थे । उनकी पत्रकारिता वास्तविक अर्थों में साहित्यिक पत्रकारिता थी । उन्होंने यातना के लम्हों में खुद को पीड़ित समाज के बीच डाला । बाढ़ के समय स्टूडियो में बैठकर पानी..पानी.. बाढ़.. बाढ़.., चिल्लाने के बजाय लोगों के बीच गएं और वहां लोगों की हर संभव मदद भी की और सच्ची खबरों को मानवीय संवेदना में लपेटकर प्रस्तुत भी की ।

”सारा शहर जगा हुआ है, पच्छिम की ओर कान लगाकर सुनने की चेष्टा करता हूं... हां, पीरमुहानी या सालिमपुर-अहरा अथवा जनककिशोर - नवलकिशोर रोड की ओर से कुछ हलचल की आवाज आ रही है । लगता है, एक-डेढ़ बजे रात तक पानी राजेन्द्र नगर पहुंचेगा ।“1

जलप्रलय के समय लोगों की जान सांसत में पड़ी रहती है मगर ऐसे समय में भी बहुधा लोग खुद को सुरक्षित पाकर मुश्किल में पड़े लोगों की मदद करने के बजाय अपने आमोद-प्रमोद के साधन के रूप में उस परिस्थित को शामिल कर लेते हैं । वहां जबकि लोगों की जान संकट में पड़ी हो किसी का विनोद करना हास्यास्पद और अमानवीय हो उठता है ।

”1967 में जब पुनपुन का पानी राजेंद्र नगर में घुस आया था, एक नाव पर कुछ सजे-धजे युवक और युवतियों की टोली किसी फिल्म में देखे हुए कश्मीर का आनंद घर-बैठे लेने के लिए निकली थी । नाव पर स्टोव जल रहा था - केतली चढ़ी हुई थी, बिस्कुट के डिब्बे खुले हुए थे, एक लड़की प्याली में चम्मच डालकर एक अनोखी अदा से नेस्कैफे के पाउडर को मथ रही थी - एस्प्रेसो बना रही थी, शायद।“2

इस दृश्य को देखकर लोगों में आक्रोश उत्पन्न होता है जो स्वाभाविक है । एक तरफ वहां के स्थानीय निवासी मुसीबत में पड़े हैं, मदद की आस लगा रखी है और वहीं दूसरी ओर कोई ऐय्यासी पूर्ण जीवन का चित्र प्रस्तुत कर रहा है । इस परिस्थितियों में मानवीय संवेदना की अत्याधिक आवश्यकता होती है । रेणु अपने रिपोर्ताजों में सदैव मानवीय संवेदना को प्रमुखता देते हैं । अनेक स्थलों पर उनके पात्रों के द्वारा मानवीयता के अनोखे एवं मनभावन दृश्य उपस्थित किए जाते हैं । रिपोर्ताजों के चित्रित ये पात्र और घटनाएं तो बिल्कुल यथार्थ ही हैं । यहां मानव का मानव से संबंध तो मनोहर है ही, मानव और मानवेत्तर प्राणियों के संबंध की मधुरता आंखें सजल कर देती हैं -

”1949...उस बार महानन्दा की बाढ़ से घिरे बापसी थाना के एक गांव में हम पहुंचे । हमारी नाव पर रिलीफ के डॉक्टर साहब थे । गांव के कई बीमारों को नाव पर चढ़ाकर कैंप में ले जाता था । एक बीमार नौजवान के साथ उसका कुत्ता भी कुंई-कुंई करता हुआ नाव पर चढ़ आया । डॉक्टर साहब कुत्ते को देखकर भीषण भयभीत हो गए और चिल्लाने लगे - ‘आ रे ! कुकुर नहीं, कुकुर नहीं... कुकुर को भगाओ !’

बीमार नौजवान छप-से पानी में उतार गया - ‘हमारा कुकुर नहीं जाएगा तो हम हुं नहीं जाएगा ।’ फिर कुत्ता भी छपाक् पानी में गिरा - ‘हमारा आदमी नहीं जाएगा तो हम हुं नहीं जाएगा ।“3

रेणु की पत्रकारिता सदैव निष्पक्ष रुप से जनहित में गतिमान रही । उन्होंने पत्रकारिता (रिपोर्ताज) में उन्हीं घटनाओं का वर्णन किया जो सच होने के साथ जीवंत भी थे । सच तो वे सभी घटनाएं हैं जो दिन भर हमारी आंखों के सामने घटित होते हैं लेकिन इसमें कौन कितना महत्वपूर्ण है यह निर्णय कर पाना सहज नहीं होता । आज की पत्रकारिता तथ्यों को इकट्ठा कर परोस देने मात्र को पत्रकारिता का धर्म मानती है यही कारण है कि आज की पत्रकारिता को साहित्य के समक्ष नहीं माना गया और आचार्य द्विवेदी को लिखना पड़ा कि ‘आरंभ में साहित्य और पत्रकारिता एक-दूसरे से घुले-मिले थे ।’ साहित्य का संबंध मानवीयता से है जबकि पत्रकारिता को तथ्यात्मक मात्र बना दिया गया है । रेणु अपने रिपोर्ताज में उन पात्रों एवं घटनाओं का वर्णन करते हैं जो संवेदनशील एवं जीवंत हैं । ‘ऋणजल-धनजल’ में ‘जो बोले सो निहाल’ शीर्षक रिपोर्ताज का एक दृश्य द्रष्टव्य है -

”रिक्शावालों का साहस और उत्साह दुगुना हो गया है । तेज धारा के बावजूद, कमर-भर पानी में नीचे उतरकर रिक्शा को खींच रहे हैं । जलकेलि करने वाले लड़के हर रिक्शावाले को बिना मांग मदद दे रहे हैं ।“4

आधुनिकता ने मानव को मशीनी बना दिया है जहां मदद जैसे कार्य में कोई अपना समय नहीं गंवाना चाहता है । ऐसे में बच्चों के द्वारा बिना मांगे मदद देना मानवीयता के जीवित होने का प्रमाण है और ऐसी घटनाओं को रेणु खूबसूरती से मन में कैदकर मनोहारी रिपोर्ट (रिपोर्ताज) बना लेते हैं ।

रेणु जी ऋणजल धनजल में पटना के जलप्रलय की घटनाओं पर आधारित रिपोर्ताज जब लिखते हैं तब उसमें उन लोगों का बड़ी संजीदगी से चित्रण करते हैं जो मुसीबत के समय में लोगों की मदद करने के लिए आगे बढ़ें। अपनी जान की चिंता नहीं करते हुए मुसीबत में फंसे लोगों को मदद पहुंचाते रहें। सिखों का दल ऐसे समय में सबसे आगे रहा। रेणु जी पटना में दिनकर गोलंबर के आसपास जहां रहते थे उधर सिखों का बसेरा अधिक था और वे लोगों की मदद के लिए सदैव आगे रहते थे। रेणु लिखते हैं ”सरदार जी लोगों का दल जलविहार करने नहीं, रिलीफ बांटने आया है। सामनेवाले पंचमंजिला इमारत के मुंडेर पर पनाह लेनेवालों को वे बुला रहे हैं।“5

बुला बुला कर लोगों को खाने-पीने का सामान दिया जा रहा है। जिन लोगों के हृदय में यह भाव जगा कि पानी में फंसे हुए लोगों के लिए खाने-पीने की चीजें उपलब्ध करना कितना मुश्किल होगा ? वे दया भाव से भरकर मुसीबत में फंसे लोगों की मदद को आगे आयें। यही भाव मानवीयता का प्रमाण है। वे जिन लोगों की मदद कर रहे थे वे निश्चित रूप से सामान्य दिनों में भी कष्ट पूर्ण जीवन ही जीते हैं जलप्रलय तो उनके लिए और भी कष्टकारी बनकर आया। ”हमारे ब्लॉक के बाएँ जो मकान बनकर तैयार हुए हैं, उनमें अब तक चालीस-पचास बाढ़ पीड़ित परिवार आकर डेरा डाल चुके थे- रिक्शावाले, खोमचावाले, रद्दी कागज-शीशे-बोतल खरीदनेवाले। सभी रोटियां लेने उतरे। सरदार स्वयंसेवकों ने चिल्लाकर कहा- पानी में मत उतरो। हम वहीं आ रहे हैं ।“6 

मुसीबत के समय इन लोगों का मददगार बनकर जो टोली बाढ़ में नाव खेते हुए पहुंची थी वह रेणु को अपनी पत्रकारिता में चित्रित करने के लिए आकर्षित कर गएँ निश्चय ही यह रेणु की पत्रकारिता में मानवीय संवेदना का परिचायक है।

ऐसे समय में कुछ लोग तो मदद के लिए प्रस्तुत होते हैं और कुछ लोग पत्रकारिता का धर्म सिर्फ रिपोर्टिंग करना और चुपचाप अपने दफ्तर में बैठे रहना ही मान लेते हैं। उन पर रेणु ने एक तरह से व्यंग पूर्ण कटाक्ष किया है। बाढ़ के उन दिनों में रेडियो के दिल्ली केंद्र से जब कहा जाता है कि ‘पटना के लोग मौत से जूझ रहे हैं’ तो वहां पात्र के द्वारा उनका मजाक तक उड़ाया जाता है कि वे मैदान में उतर कर मदद तो कर नहीं सकते हैं बस अपने दफ्तर में बैठे बैठे घोषणा मात्र कर रहे हैं। रेणु जी की पत्नी लतिका जी पानी में भीगते हुए आईं और कहती हैं कि ‘मैं उन्हें खिला आइ’, रेणु पूछते हैं कि किसे खिला आई हो ? तब वे कहती हंै कि उन बेचारों कुत्तों को जो पानी से बचकर चायवाले की झोपड़ी में, ईंट के ढेर पर और खाली दुकान के रैक पर बैठे हुए हैं। वे न तो पानी में उतर कर कहीं जा सकते हैं और न ही उसके भोजन का कोई उपाय है। यह दृश्य मानवीय संवेदना को दर्शाने वाला है कि लतिका जी मानवेतर प्राणियों को भी इस मुसीबत में नजरअंदाज नहीं करती हैं और खुद भींगती हुई जाकर उन्हें रोटी खिला आती हैं। यह मानवीय संवेदना सिर्फ लतिका जी ही नहीं दिखलाती हैं बल्कि उस घटना के वर्णन में आस-पड़ोस के बालकों और युवकों के कृत्यों में भी मानवीय संवेदना की झलक स्पष्ट दिखाई दे जाती है। लतिका जी बतलाती हैं कि जिस दुकान के छप्पर पर कुत्ते ने शरण ले रखी है उसका मालिक डंडे से कोच-कोच कर उसे भगा रहा था तब लड़कों ने उसे धमकाते हुए कहा कि कुत्ते को अगर भगाया तो तुम्हारी झोपड़ी भी पानी में बहा दी जाएगी।

रेणु जी जिस दृष्टि से पत्रकारिता को देखते थे वह आज कहीं देखने को नहीं मिलती है। वे तथ्यात्मक पत्रकारिता से कहीं अधिक संवेदनात्मक पत्रकारिता के पक्षधर थे। उनकी पत्रकारिता सदैव परोपकार की भावना से भरी रही है। जनसेवा से वे कभी पीछे नहीं हटते थे। कोशी के द्वारा फैलाया गया आतंक हो या आपातकाल और बाढ़ से शहरी क्षेत्रों के जनजीवन के त्रस्त होने का समय रहा हो रेणु ने पत्रकारिता के साथ-साथ लोगों की मदद भी की। वे स्वयंसेवक की तरह लोगों के बीच दिन-रात कार्य करते रहें और फिर उस बीच में देखे गए घटनाओं, मिलने-जुलने वाले पात्रों, भोगे हुए यथार्थ आदि को समेट कर रिपोर्ट तैयार करते हैं। यह उनकी पत्रकारिता के आयाम रहे हैं। साकेत सूर्येश ने रेणु की पत्रकारिता की भावभूमि का वर्णन करते हुए आधुनिक संदर्भ में उसकी कमी को रेखांकित करते हुए लिखा है-

”आज जब लेखक, पत्रकार, साहित्यकार एक महत्वाकांक्षी विक्षिप्तता में डूबकर स्वयं को सत्ता के निर्माता मान बैठे हैं और जनता के विचारों, मनोभावों को स्वर देने के स्थान पर जनता को हेय मान बैठे हैं, साहित्य और पाठक के मध्य संवाद के स्थान पर परस्पर अविश्वास का कलुष घोले बैठे हैं, आवश्यक है कि वे भी रेणु की भाँति स्वयं से यह प्रश्न पूछ सकें। इसी प्रश्न से और इसके उत्तर से ही साहित्य और पत्रकारिता प्रासंगिक हो सकेगी। इसीलिए आज हमें रेणु की आवश्यकता पड़ी है।”7

रेणु के जैसे कम ही साहित्यकार होते हैं जो अपने आप को सामाजिक संघर्षों में सायास डालकर, खुद को उसका अंग बनाता है और तब फिर अपनी अनुभूति के आधार पर लेखन कार्य करता है। पृष्ठभूमि चाहे युद्ध की हो, चाहे बाढ़ की, चाहे सूखे की या फिर किसी और तरह की रेणु ने दूर बैठकर पत्रकारिता करने का काम नहीं किया। वे सदैव घटना और पात्रों के बीच मौजूद रहे, उसे खुलकर भोगा, खुद को उसके बीचो-बीच खड़ा किया और तब कहीं जाकर कलम चलाई। कलम चलाना उनके लिए एक अलग तरह का शौक था जहां वे कल्पना से अधिक भोगे हुए यथार्थ को महत्व देते थे। उन्होंने कहानी और उपन्यासों में जिन पात्रों को चित्रित किया वे रेणु के देखे हुए और आसपास के पात्र थे। पत्रकारिता भी उन्होंने उसी धरातल पर उतरकर की। उनकी पत्रकारिता के विषय में यह उक्ति सटीक बैठती प्रमाणित होती है-

“रेणु मानवीय भावनाओं के अप्रतिम चितेरे हैं, लेकिन उनका रचनाकार मन उन सामाजिक, राजनीतिक और प्राकृतिक त्रासदियों को अनदेखा नहीं करता, जो किसी भी भावना-लोक को प्रभावित करती हैं । एक योद्धा रचनाकार के नाते रेणु ने स्वयं ऐसी त्रासदियों का सामना किया था । यही कारण है कि उनके अनेक कथा-रिपोर्ताज जिन्होंने हिंदी पत्रकारिता को भी समृद्ध किया, विभिन्न त्रासद स्थितियों का अत्यंत रचनात्मक साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं ।“8

फणीश्वरनाथ रेणु की पत्रकारिता का स्वरूप रिपोर्ताजों में फलित है । उनके रिपोर्ताज में मानवीयता के अनेक आयाम हैं । यहां मानव का मानव के प्रति स्नेह भाव तो दिखता ही है मानवेत्तर प्राणियों के प्रति भी अगाध प्रेम दिखता है । रेणु पत्रकार के साथ-साथ एक कुशल सामाजिक कार्यकर्त्ता भी थे । 

आलोचकों ने सटीक वर्णन किया है कि आधुनिक हिंदी पत्रकारिता में अब मानवीय दृष्टि नहीं रही । आज के पत्रकारों को रेणु से सीखने की आवश्यकता है कि मुसीबत में फंसे प्राणी की तस्वीर लेना और उसे चटपटा बनाकर परोस देना पत्रकारिता नहीं है बल्कि मुसीबत के वक्त समाज के काम आना और तब उसका वर्णन करना वास्तविक पत्रकारिता है ।


संदभ सूची

1 रेणु, फणीष्वरनाथ - ऋणजल धनजल, राजकमल प्रकाषन, दूसरी आवृति 2011, पृ - 27

2 वही, पृ - 29

3 वही

4 वही, पृ - 35

5 वही, पृ - 40

6 वही

7 ीजजचेरूध्ध्ीपदकपण्ेूंतंरलंउंहण्बवउध्पकमंेध्ेमदेपजपअपजल.जतनजी.ंिदपेीूंतदंजी.तमदनध्

8 रेणु, फणीष्वरनाथ - समय की षिला पर, राजकमल प्रकाषन, 2018 संस्करण


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