हसरतों की नाव ( ग़ज़ल ).

हसरतों की नाव.       - अमित कुमार मिश्रा.

अपने कातिल को आज मैं मुआफ कर आया
दुश्मन को अपने, घर का पता दे आया ।

मुहब्बत तो उन्हें पहले भी न थी मुझसे
आज नफरत करने का हक भी छीन आया।

वक्त से न सुनाई जाएगी, मेरी बर्बादी का सबब
मैं खुद ही जमाने को हकीकत बता आया।

उसके कदमों की मिट्टी बंद है मेरी मुट्ठी में
मैं शहर से जाते-जाते यह सौगात ले आया।

अभी हौसला न टूटा है ‘अमित’ रिश्वतों के
टूट कर बिखरने से
लो मैं फिर से हसरतों की नाव बना लाया।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

स्त्री अस्मिता और हिन्दी महाकाव्य (आलेख)

साहित्य की प्रासंगिकता. ( लेख.)

हिन्दी साहित्य में लघुमानव की अवधारणा, ( आलेख )