डॉ. रामशोभित प्रसाद सिंह का साहित्यिक अवदान (आलेख)

साहित्य सतत विकास पथ पर चलते रहने वाली एक प्रक्रिया है। किसी भी जीवित भाषा का साहित्य निरंतर गतिमान होता है। साहित्य के विकास में अनेक साहित्यकारों का श्रम रेखांकन योग्य पाया जाता है, बहुधा अनेक रचनाकारों ने तो अपना संपूर्ण जीवन ही साहित्य की श्रीवृद्धि में अर्पण कर दिया। डॉ. रामशोभित प्रसाद सिंह एक ऐसे ही व्यक्तित्व रहे हैं जिनका संपूर्ण जीवन, साहित्य सेवा को समर्पित रहा। हिंदी जगत में उन्हें साहित्य के सच्चे सेवक और एक महान पुस्तकालय विज्ञानवेत्ता के रूप में स्मरण किया जाता है। ध्यातव्य है कि साहित्य सेवा का दायित्व कई रूपों में निर्वाहित किया जाता है, गद्य-पद्य विधाओं में लेखन के अलावे भी साहित्य साधना के विभिन्न आयाम हैं। यथा, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का हिंदी साहित्य के स्वरूप निर्धारण में योगदान, कामता प्रसाद गुरु का हिंदी भाषा को व्याकरण सम्मत रूप प्रदान करना इत्यादि।

डॉ. रामशोभित प्रसाद सिंह के साहित्यिक सेवा का स्वरूप सर्वाधिक मुखरित हुआ है साहित्यिक विधाओं यथा, उपन्यास, कहानी, नाटक, काव्य आदि के समालोचना संदर्भ के प्रणयन में।

 राम शोभित प्रसाद सिंह प्रणीत ग्रंथों में 'पुस्तकालय संगठन एवं प्रशासन', 'उपन्यास समालोचना संदर्भ', 'नाटक समालोचना संदर्भ', 'कहानी समालोचना संदर्भ', 'काव्य समालोचना संदर्भ', 'हिंदी उपन्यास : प्रेमचंदोत्तर काल', 'पुस्तकालय विज्ञान की रूपरेखा', 'कहानी कोश', 'काव्य कोश' आदि हिंदी साहित्य के अक्षय कोश को सुसज्जित करते हैं। इसके अलावा भी हिंदी एवं अंग्रेजी में उनके कई आलेख एवं शोध पत्र, पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। 1974 ई. से 1979 ई. के मध्य उन्होंने 'पुस्तकालय' नामक मासिक पत्रिका का कुशल संपादन भी किया। 

डॉ. सिंह पटना के प्रसिद्ध पुस्तकालय, सिन्हा लाइब्रेरी के पुस्तकालयाध्यक्ष के पद पर सुशोभित रहे। इस पद पर रहते हुए उन्होंने अपने कार्य के अलावे साहित्य सेवा का जो मार्ग खोज निकाला वह विरल ही देखने को मिलता है। मसलन उन्होंने देखा कि पुस्तकालय में आने वाले शोधकर्ताओं को या अन्यत्र भी शोधार्थियों, विद्वानों को किसी उपन्यास (उदाहरणार्थ, 'अपने अपने अजनबी' -अज्ञेय) पर लिखे गए समालोचना ग्रंथों की तलाश है ऐसे में वह व्यक्ति बहुत समय खर्च करने पर किसी एक-दो पुस्तक का पता लगा पाता है। वहीं डॉ सिंह ने इस समस्या के समाधनार्थ 'उपन्यास समालोचना संदर्भ' का प्रनयन किया जिसके सहारे उपयोगकर्ता उक्त या किसी भी उपन्यास पर लिखे गए सभी समालोचनात्मक पुस्तकों की जानकारी प्राप्त कर लेता है। वहीं उस पुस्तक से संबंधित संक्षिप्त विवरण भी प्राप्त हो जाता है। यह सहज ही अनुमान किया जा सकता है कि इस ग्रंथ के प्रणयन से साहित्य का कितना बड़ा हित साध्य होता है। 

विश्लेषणात्मक संदर्भ सूची की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए 'डॉ. नवल किशोर गौड़' ने लिखा है, "विशिष्टीकरण के इस युग में साहित्य की इतनी विशिष्ट विधाएं हमारे सामने आ गई हैं कि किसी एक साहित्यिक विधा के संबंध में समस्त आलोचनात्मक साहित्य की विवरणात्मक एवं विश्लेषणात्मक संदर्भ सूची के अभाव में हम उस विशेष साहित्यिक विधा के संबंध में उपलब्ध सारी आलोचनात्मक सामग्रियों का आकलन करने में सर्वथा असमर्थ रह जाते हैं।"[1] 

डॉ.गौड़ के उक्त कथन से स्पष्ट हो जाता है कि इस तरह के संदर्भ-ग्रंथ किसी भी साहित्य के लिए कितना उपयोगी और अनिवार्य है। और उस समय तो इन पुस्तकों की महत्ता कई गुना बढ़ जाती है जबकि इसके पूर्व उसका सर्वथा अभाव रहा हो। 'उपन्यास समालोचना संदर्भ' के विषय में डॉ. गौड़ की यह उक्ति रेखांकन योग्य है, "बिहार के राज्य केंद्रीय पुस्तकालय (सिन्हा लाइब्रेरी) के पुस्तकालयाध्यक्ष एवं हिंदी साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान रामशोभित प्रसाद सिंह की पुस्तक अपने क्षेत्र में पहला प्रमाणिक ग्रंथ है।" [2] 

इसी तरह की उपयोगी अन्य पुस्तकों में अगला नाम आता है 'कहानी समालोचना संदर्भ' का इस पुस्तक में डॉ. सिंह ने हिंदी कहानियों की समालोचना प्रस्तुत करने वाले आलोचना-ग्रंथों के साथ-साथ पत्रिकाओं में प्रकाशित कहानी संबंधी लेखों की सूची भी शामिल की है। प्रसिद्ध आलोचक डॉ. शोभाकांत मिश्र ने लिखा है, वर्णानुक्रम से कहानी समालोचना ग्रंथों की यह सूची कहानी साहित्य पर शोध करने वाले शोधकों तथा कहानी साहित्य के समीक्षकों का श्रमभार हल्का करेगा।" [3] 

निःसंदेह यह ग्रंथ शोधार्थियों एवं समीक्षकों का श्रमभार अवश्य हल्का करेगा किंतु ग्रंथकार के लिए यह कार्य कितना दुस्सकर कर रहा होगा यह विचारने योग्य है। कहानी समालोचना से संबंधी पुस्तकों को तलाशना साथ ही संबंधित पत्र-पत्रिकाओं की सूची तैयार करना कितना कठिन कार्य है। निश्चित तौर पर उन्होंने अपने जीवन का एक-एक लम्हा इस श्रम में झोंक दिया होगा। उपन्यास समालोचना संदर्भ और कहानी समालोचना संदर्भ की भांति ही डॉ. सिंह ने 'नाटक समालोचना संदर्भ' और 'काव्य समालोचना संदर्भ' का प्रणयन भी किया है। नाटक समालोचना संदर्भ में लेखक ने हिंदी नाटक पर आधारित तीन सौ से अधिक आलोचना ग्रंथों की सूची संपूर्ण विवरण के साथ प्रस्तुत की है। इस समालोचना संदर्भ की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए 'प्रोफेसर मटुकनाथ चौधरी' ने लिखा है, "इसमें हिंदी साहित्य में प्रकाशित नाटकों से संबंधित समस्त आलोचनाओं एवं शोध प्रबंधों की प्रमाणिक परिचयात्मक सूचनाएं दी गई हैं। इसके लिए वैज्ञानिक पद्धति अपनाई गई है।" [4]

 'काव्य समालोचना संदर्भ' के दो खंडों में लगभग सत्रह सौ पुस्तकों का विवरण है जो काव्य से संबंधित हिंदी में लिखित समालोचना ग्रंथों का विवरण प्रस्तुत करते हैं। इस ग्रंथ की सहायता से काव्य समालोचना से संबंधित पुस्तकों को तलाशना वैसा ही है जैसे शब्दकोश से शब्दों को तलाशने का कार्य। इस तरह के काम हिंदी साहित्य को समृद्ध बनाने के साथ उसे वैज्ञानिकता दिलाने में भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। 'काव्य समालोचना संदर्भ' के संबंध में डॉ. हरदयाल ने लिखा है, "काव्य समालोचना संदर्भ से अनुसंधानकर्ताओं, अध्यापकों एवं कवियों को हिंदी काव्य की विशेष प्रवृत्ति, विशेष काल या विशेष कवि या काव्य से संबंधित आलोचनात्मक पुस्तकों की सूचना एक साथ, इस स्थान पर मिल जाएगी।" [5]

 रामशोभित प्रसाद सिंह उन साहित्य-सेवियों की श्रेणी में आते हैं जिन्होंने हिंदी साहित्य में एक बड़ी कमी को पूरा करने का कार्य किया। पुस्तकालय और साहित्य के अन्योन्याश्रित संबंध को प्रमाणित करने में डॉ. सिंह की महती भूमिका है। उक्त ग्रंथों के अलावे डॉ. सिंह की 'हिंदी उपन्यास : प्रेमचंदोत्तर काल' नामक हिंदी उपन्यास की आलोचनात्मक पुस्तक भी काफी चर्चित रही है। 

यह आलेख डॉ. सिंह के साहित्यिक अवदानों का एक संक्षिप्त परिचय मात्र उपस्थित करने में सक्षम है। उनकी साहित्य-साधना एवं उनका व्यक्तित्व खुद में इतना विराट है कि उसे एक आलेख तो क्या पुस्तक में भी समेट पाना संभव नहीं है। उन की साहित्य साधना से हिंदी साहित्य को कितना लाभ हुआ है इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने चार विधाओं से संबंधित समालोचना संदर्भों का सृजन किया है और साहित्य में समालोचना संदर्भ की महत्ता बतलाते हुए प्रोफेसर मटुकनाथ चौधरी ने लिखा है, "सच तो यह है कि किसी भाषा की साहित्यिक समृद्धि की अन्यतम मानदंड उस में प्रकाशित विविध संदर्भ ग्रंथ हैं।" [6]


संदर्भ :

1. 

2. वहीं, पृ.- 151.

3. वहीं, पृ. -156.

4. वहीं, पृ. -158.

5. वहीं, पृ. -160.

6. वहीं, पृ. -159.

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