रामवृक्ष बेनीपुरी की पत्रकारिता का स्वरूप
बिहार से पत्र-पत्रिकाओं के संपादन कला में निष्णात साहित्यकारों की सूची में 'रामवृक्ष बेनीपुरी' का नाम अग्रगण्य है। उन्होंने दर्जनों पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया और हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता को एक नई ऊंचाई दिलाई। उनके द्वारा संपादित पत्र-पत्रिकाओं में तद्युगीन राजनैतिक चेतना भी मौजूद है और साहित्यिक क्षेत्र के तो वे श्लाघा पुरुष ही माने जाते हैं। उनके द्वारा संपादित 'तरुण भारत', 'किसान मित्र', 'युवक', 'कैदी', 'तूफान', 'बालक', 'चुन्नू मुन्नू', 'हिमालय', 'नई धारा', 'गोलमाल' जैसी पत्रिकाओं ने हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में अपनी सार्थक पहचान कायम की है। 'नई धारा' जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से उन्होंने हिंदी साहित्य की सेवा की तो युवक, कैदी, तूफान जैसे पत्र-पत्रिकाओं से भारतीय स्वाधीनता की लड़ाई में योगदान भी दिया। जेल भी गए और 'किसान मित्र' जैसे पत्र के मार्फत कृषकों के हित की वकालत भी की। रामवृक्ष बेनीपुरी हिंदी साहित्य के साथ-साथ हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में भी विशिष्ट स्थान रखते हैं। यह शोध आलेख उनकी पत्रकारिता के स्वरूप को उजागर करने का एक प्रयत्न मात्र है।
साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के संपादन, प्रकाशन की दृष्टि से बिहार किसी भी प्रांत से पीछे नहीं रहा है। यहाँ से एक से बढ़कर एक पत्र-पात्रिकाओं का संपादन-प्रकाशन किया जाता रहा है। एक से एक जुझारू पत्रकार, संपादक बिहार से हुए हैं। बिहार में साहित्यिक पत्रकारिता की दृष्टि से आचार्य शिवपूजन सहाय और रामवृक्ष बेनीपुरी का कद सर्वाधिक बड़ा है। रामवृक्ष बेनीपुरी ने समय-समय पर अनेक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया। बिहार की पत्रकारिता के इतिहास में शीर्षासन के अधिकारी तो वे हैं ही हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में भी शीर्ष संपादकों में उनका नाम सम्मानपूर्वक लिया जाता है।
एक ओर तो बेनीपुरी जी ने 'तरुण भारत', 'किसान मित्र', 'युवक', 'कैदी', 'तूफान' जैसे सामाजिक और राजनैतिक सरोकार से जुड़ी पत्रिकाओं का संपादन किया तो वहीं 'बालक' और 'चुन्नू- मुन्नू' जैसे बालोपयोगी पत्रिकाओं का कुशल संपादन भी उन्होंने किया। 'गोलमाल' जैसे हास्य-व्यंग्य प्रधान 'मतवाला' की तर्ज पर निकलने वाली पत्रिका का संपादन भी किया तो हिंदी-साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास में सर्वमान्य 'हिमालय' और 'नई धारा' जैसी पत्रिकाओं का संपादन कार्य भी बेनीपुरी जी ने किया। 'कर्मवीर' और 'योगी' जैसे पत्रों के संपादकीय को भी उन्होंने अपनी जादुई संपादन कला से चमत्कृत किया। 'कर्मवीर' का संपादन माखनलाल चतुर्वेदी करते थे और 'योगी' का ब्रजशंकर वर्मा; दोनों ही विभूतियों के साथ बेनीपुरी जी ने अल्पसमय के लिए ही सही कार्य किया और अपने कार्य से इन पत्रों के मान में श्रीवृद्धि भी की और इसके द्वारा बेनीपुरी जी को अभूतपूर्व ख्याति भी मिली।
बतौर पत्रकार बेनीपुरी जी के जीवन की शुरुआत 'तरुण भारत' में सहयोगी संपादक के तौर पर हुई। उस समय तरुण भारत का संपादन 'मथुरा प्रसाद दीक्षित' करते थे जिन्हें रामवृक्ष बेनीपुरी अपने गुरु के रूप में स्वीकार करते हैं और स्वयं के साहित्य और पत्रकारिता की ओर उन्मुख होने का श्रेय भी वे 'मथुरा प्रसाद दीक्षित' को ही देते हैं। उन्होंने लिखा, "दीक्षित जी मेरे गुरु थे, साहित्य रसिक थे। मुझे साहित्य की ओर प्रवृत्त करने में उनका बड़ा हाथ था। दीक्षित जी ने मुझे देखते ही 'तरुण भारत' में चलने का आग्रह किया।" [१]
१९२२ ई• में पटना से प्रकाशित 'किसान मित्र' के संपादन का कार्य रामवृक्ष बेनीपुरी ने आरंभ किया लेकिन स्वास्थ्य ठीक नहीं रहने के कारण वहाँ वे कुछ ही समय तक बने रह सके।
१९२४ ई• में आचार्य शिवपूजन सहाय के अनुरोध पर उन्होंने 'गोलमाल' का संपादन आरंभ किया। गोलमाल का तेवर वही था जो आचार्य शिवपूजन सहाय और निराला के समय में मतवाला का था। गोलमाल का संपादन कार्य रामवृक्ष बेनीपुरी ने बड़े ही मनोयोग से किया। गोलमाल का प्रकाशन साप्ताहिक पत्रिका के रूप में होता था। गोलमाल को निकालने का दायित्व पटना सिटी के एक मारवाड़ी युवक 'दीनानाथ सिंगतिया' ने संभाला था। उन्होंने आचार्य शिवपूजन सहाय से गोलमाल का संपादन करने का अनुरोध किया। शिवपूजन सहाय उन दिनों इस कार्य को करने में समर्थ नहीं थे क्योंकि इन्हीं दिनों वे कई अन्य जिम्मेदारियों को संभालने में व्यस्त थे। १९२३ में वे 'मतवाला' के संपादन से जुड़े। १९२४ में कुछ समय के लिए मतवाला से अलग होने पर लखनऊ से प्रकाशित होने वाली 'माधुरी' में गए और उसके बाद पुनः मतवाला में उनकी वापसी भी हुई। इन सबों में व्यस्त रहते हुए समय निकाल पाना उनके लिए सहज नहीं था अतः उन्होंने समर्थ संपादक के रूप में 'रामवृक्ष बेनीपुरी' का नाम सुझाया और स्वयं आचार्य शिवपूजन सहाय के अनुरोध पर बेनीपुरी जी ने गोलमाल का संपादन करना स्वीकार किया था। यह पत्रिका आचार्य शिवपूजन सहाय के मार्गदर्शन में निकलती थी। बेनीपुरी जी ने स्वयं लिखा, "एक मारवाड़ी युवक दीनानाथ सिंगतिया व्यंग्य और हास्य प्रधान पत्र निकालने की फिक्र में हैं और उन्होंने शिवपूजन जी को एक आदमी देने के लिए आग्रह किया था, जिससे मेरी बुलाहट हुई थी। पत्र का नाम रखा गया 'गोलमाल' और पहले अंक के सभी शीर्षक और लेख शिवपूजन जीने ही ठीक किया।"[२]
१ वर्ष पूरा होते-होते प्रकाशक के द्वारा 'गोलमाल' का प्रकाशन बंद कर दिया गया। संभवतः उसका कुछ अंक कोलकाता से भी प्रकाशित हुआ था।
१९२६ ई• में लहेरियासराय से 'रामलोचन शरण' के प्रेस 'पुस्तक भंडार' से 'बालक' पत्रिका का प्रकाशन आरंभ हुआ जिसके संपादक हुए 'आचार्य शिवपूजन सहाय' और 'रामवृक्ष बेनीपुरी'। 'आचार्य रामलोचन शरण' और 'रामदयाल पांडे' ने भी बालक का संपादन किया। बाल-पत्रिका के रूप में 'बालक' को अतिशय ख्याति मिली। देखते-ही-देखते पूरे हिंदी जगत में बालक की प्रसिद्धि फैल गई।
१९२८-२९ ई• में 'रामवृक्ष बेनीपुरी' और 'गंगाचरण सिंह' के संपादन में 'युवक' का प्रकाशन आरंभ हुआ। उग्र तेवर और समाजवादी विचारधारा वाले इस मासिक पत्रिका के कार्यालय पर कई बार अंग्रेज सरकार का छापा पड़ा लेकिन इसके तेवर में तनिक भी नरमी नहीं आई। इसमें राष्ट्रीयता की भावना जगाने वाले लेखों-रचनाओं को प्रमुखता से प्रकाशित की जाती थी। जब तब इसके अंकों को देखकर सरकार की भृकुटि तन जाया करती थी। 'युवक' का मार्च १९३० वाला अंक 'विप्लव अंक' के नाम से निकला जिसमें सरकार के विरुद्ध बगावत का स्वर इतना तीव्र था कि सरकार ने युवक के इस अंक को जप्त कर लिया। ढूंढ-ढूंढ कर इसके अंक नष्ट किए जाने लगे और रामवृक्ष बेनीपुरी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। जेल में ६ महीने की सजा काटने के बाद बाहर निकलने पर उन्होंने पुनः 'युवक' का प्रकाशन आरंभ कर दिया। युवक की प्रसिद्धि बार-बार बेनीपुरी जी को बाध्य कर रही थी कि जैसे भी बन पड़े इस पत्रिका को वे जिलाए रखें।
यह पत्रिका लोकचेतना की आवाज बन चुकी थी। समाज में क्रांति लाने के लिए युवक में उस समय के जाने-माने राजनेता और साहित्यकार जनता का आह्वान कर रहे थे। सरकार और पुलिस निरंतर युवक के अंकों पर दृष्टि गड़ाए थी। जेल से छूटकर युवक निकालने के दौरान भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की तस्वीर के साथ एक और अंक निकला जिसमें पुनः राष्ट्रीय स्वाधीनता की भावना से ओतप्रोत लेख लिखे गए थे। इस अंक को भी 'विप्लव अंक' की तरह जब्त कर लिया गया और एक बार फिर से 'रामवृक्ष बेनीपुरी' को जेल में बंद कर दिया गया। रामवृक्ष बेनीपुरी के संपादक में निकलने वाले 'युवक' की ख्याति पूरे देश में फैल गई थी। बिहार की हिंदी पत्रकारिता शीर्षक अपने लेख में शैलेंद्र कुमार मोहन ने लिखा है, "ऐसी सामयिकतापूर्ण और युगानुकूल चेतना का प्रतिनिधि पत्र पहले कभी नहीं निकला था।"[३]
पहली बार जेल में बंद रहने के दौरान रामवृक्ष बेनीपुरी ने एक हस्तलिखित पत्रिका 'कैदी' निकाली थी जिसमें जेल की यातनापूर्ण जीवन एवं कैदियों के साथ की जा रही अंग्रेजी सरकार और पुलिस की बर्बरता का चित्रण किया जाता रहा था।
१९३५ ई. में पटना से 'योगी' का प्रकाशन आरंभ हुआ। यह एक साप्ताहिक पत्र था जिसका संपादन 'ब्रजशंकर वर्मा' और 'रामवृक्ष बेनीपुरी' करते थे। इस पत्र में एक स्थाई स्तंभ प्रकाशित होता था - 'गोलघर के मुंडेर से' इस स्तंभ को काफी लोकप्रियता मिली। योगी के संपादक के रूप में 'रामवृक्ष बेनीपुरी' के नाम का जिक्र करते हुए डॉ कल्याण कुमार झा ने लिखा है, "तत्पश्चात साप्ताहिक 'योगी' नामक पत्रिका प्रकाशित हुई। १९३३ ई• में प्रकाशित इस पत्रिका के संपादक श्री रामवृक्ष बेनीपुरी और ब्रजशंकर वर्मा थे।" [४]
डॉ• झा ने योगी का प्रकाशन वर्ष १९३३ ई• माना है जबकि डॉ• कृष्णानंद दिवेदी ने योगी का प्रकाशन वर्ष १९३४ ई• स्वीकारते हुए लिखा है, "२० जनवरी १९२४ ई• को बिहार का सर्वश्रेष्ठ राजनैतिक साप्ताहिक 'योगी' योगी प्रेस से प्रकाशित हुआ।" [५]
योगी का संपादन स्वीकारने से पहले बेनीपुरी जी का आगमन कुछ समय के लिए माखनलाल चतुर्वेदी के संपादन में निकलने वाले 'कर्मवीर' में भी हुआ लेकिन 'कर्मवीर' और 'योगी' दोनों ही जगह उन्हें उस आजादी से पत्र संपादन का अवसर नहीं मिला जिसकी चाहत वे रखते थे अतः कुछ-कुछ समय पर ही उन्हें यह दोनों स्थान छोड़ना पड़ा।
१९३७ ई. में जयप्रकाश नारायण के सहयोग से 'जन साहित्य संघ' की पत्रिका 'जनता' का प्रकाशन आरंभ हुआ। जनता मूल रूप से समाजवादी विचारधारा की पत्रिका थी। लोकनायक जयप्रकाश नारायण से रामवृक्ष बेनीपुरी बहुत अधिक प्रभावित थे और वे भी समाजवादी विचारधारा के पोषक थे। फलतः जनता उनकी रुचि का पत्र प्रमाणित हुआ। 'जनता' का प्रकाशन भी साप्ताहिक हुआ करता था। 'जनता' को भी 'युवक' की तरह ही अंग्रेजी सरकार के कोप का भाजन बनना पड़ा क्योंकि जनता में भी रामवृक्ष बेनीपुरी उतनी ही उग्रता से लिखते थे जितना कि वे पहले युवक में लिख चुके थे। इस पत्र ने जमींदारों के खिलाफ किसानों के आंदोलन को हवा देने का कार्य किया और इसका समर्थन पाकर कई किसान आंदोलन उभर कर सामने आए। बीच में काफी समय तक बंद रहने के बाद १९५१ ई• में जनता का प्रकाशन पुनः आरंभ हुआ जिसके प्रधान संपादक रामवृक्ष बेनीपुरी बनाए गए। इस बार जनता का प्रकाशन दैनिक रूप में आरंभ किया गया।
'जनता' में प्रकाशित उत्तेजक लेखों के आरोप में १९४२ ई• में रामवृक्ष बेनीपुरी को पुनः जेल भेज दिया गया। इस बार भी उन्होंने जेल से एक हस्तलिखित पत्र का प्रकाशन 'तूफान' नाम से किया।
१९४६ ई• में रामलोचन शरण के प्रेस 'पुस्तक भंडार' से 'हिमालय' पत्रिका का प्रकाशन आरंभ हुआ। इस समय तक पुस्तक भंडार प्रेस को रामलोचन शरण लहेरिया सराय से लाकर पटना में स्थापित कर चुके थे। 'हिमालय' के संपादन का दायित्व 'रामवृक्ष बेनीपुरी' और 'आचार्य शिवपूजन सहाय' ने संभाला। अधिकांश कामों की जिम्मेदारी रामवृक्ष बेनीपुरी के ऊपर ही थी क्योंकि इन दिनों आचार्य शिवपूजन सहाय राजेंद्र कॉलेज छपरा में प्राध्यापक के रूप में नियुक्त हो चुके थे और इन्हीं दिनों राजेंद्र प्रसाद की आत्मकथा का प्रूफ देखने का कार्य भी वे कर रहे थे।
'हिमालय' ने अत्यंत अल्प समय में ही हिंदी जगत में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया था। इस पत्रिका के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए गजानन चह्वाण ने लिखा है, "हिमालय ने साहित्यिक पत्रकारिता के कीर्तिमान स्थापित किए। उच्चकोटि का आलोचना बहुल मासिक पत्र कैसा होना चाहिए 'हिमालय' इसका आदर्श रहा। गद्य-लेखन के अनुपम सौंदर्य से युक्त इसकी संपादकीय टिप्पणी आकर्षक, रोचक, पठनीय और प्रभावकारी होती थी।" [६]
जैसे तैसे एक वर्ष प्रकाशित होने के बाद पुस्तक भंडार के मालिक की ओर से 'हिमालय' के प्रकाशन में अरुचि दिखाई पड़ने लगी जिसके परिणाम स्वरूप १३ अंक प्रकाशित होने के बाद १९४८ ई• में हिमालय का प्रकाशन बंद कर दिया गया। रामवृक्ष बेनीपुरी और आचार्य शिवपूजन सहाय के कुशल संपादन में निकलने वाले हिमालय को ख्याति अर्जित करने में समय नहीं लगा। मात्र १३ अंक प्रकाशित कर सकने वाले 'हिमालय' की ख्याति का अनुमान 'डॉ हंसराज' के शब्दों से लगाया जा सकता है "इसके संपादन का भार हिंदी जगत के भीष्मपितामह श्री शिवपूजन सहाय और श्री बेनीपुरी जी जैसे महारथी साहित्यिकों ने ग्रहण किया है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद और आचार्य नरेंद्र देव जैसे महान व्यक्तियों का इस पर वरदहस्त है। पहले ही अंक में 'होनहार बिरवान के होत चिकने पात' वाली उक्ति चरितार्थ हो रही है।"[७]
लेकिन अफसोस की इतनी महत्वपूर्ण पत्रिका भी अत्यंत अल्पायु ही सिद्ध हुई। पत्र-पत्रिकाओं का असमय निधन साहित्यकारों को सदैव खटकता रहा है। आचार्य शिवपूजन सहाय तो एक तरह से इन पत्र-पत्रिकाओं की अकाल मृत्यु से मर्माहत से हो उठे थे। इसी पीड़ा में उन्हें लिखना पड़ा, "हमारे मुखारविंद की ऐसी महिमा है कि जहाँ जो है चापड़ कर डालते हैं।"[८]
इसी पीड़ा को व्यक्त करते हुए 'बिहार की हिंदी पत्रकारिता' नामक अपनी पुस्तक में 'डॉ कृष्णानंद द्विवेदी' को लिखना पड़ा, "हिंदी पत्रकारिता के लिए बिहार को कब्रगाह की संज्ञा दी गई है क्योंकि यहाँ से एक-से-एक स्तरीय पत्रिकाएं निकली लेकिन साधन के अभाव के कारण असमय में ही मौत का शिकार बन गई।"[९]
रामवृक्ष बेनीपुरी के संपादन में निकलने वाली जिन पत्र-पत्रिकाओं का जिक्र ऊपर किया गया है वे सभी एक तरह से अल्पायु हीं प्रमाणित हुएं। यह दौर ही ऐसा था की अनेक कारणों से पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन थोड़े-थोड़े समय के लिए होकर बंद हो जाया करता था। रामवृक्ष बेनीपुरी के पत्रकार व्यक्तित्व को इन सबो के बाद एक स्थिरता तब मिली जब १९५० ई• में 'राजा राधिकारमन प्रसाद सिंह' ने अशोक प्रेस पटना से 'नई धारा' का प्रकाशन आरंभ किया जिसके संपादक 'रामवृक्ष बेनीपुरी' बनाए गए। १९५०-१९६६ ई• तक रामवृक्ष बेनीपुरी ने 'नई धारा' का संपादन किया। इस दौरान उन्होंने नई धारा को वह मुकाम दिलाया जिसकी अधिकारीनी हिंदी की कुछ गिनी चुनी पत्रिकाएं ही बन सकीं। 'नई धारा' के प्रवेशांक में ही राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर, केदारनाथ मिश्र प्रभात, जानकीवल्लभ शास्त्री, प्रभाकर माचवे, बनारसीदास चतुर्वेदी, हरिवंश राय बच्चन, नलिन विलोचन शर्मा, जगदीश चंद्र माथुर, देवेंद्र नाथ शर्मा, मोहनलाल महतो वियोगी जैसे सर्वमान्य रचनाकारों की रचनाएं प्रकाशित हुईं। आचार्य 'नरेंद्र देव' ने नई धारा के महत्व को स्वीकारते हुए जून १९५० में नई धारा को लिखे अपने पत्र में लिखा था, "प्रिय बेनीपुरी जी! नमस्कार। नई धारा के दो अंक मिले, धन्यवाद ऐसी पत्रिका की बड़ी आवश्यकता थी।"[१०]
'नई धारा' का संपादन कर रहे रामवृक्ष बेनीपुरी इस मासिक पत्रिका के संपादन के पूर्व कई ऐसे पत्र- पत्रिकाओं का संपादन कर चुके थे जिसने उनकी पत्रकारिता में आग की तेज भर दी थी। समाजवादी दृष्टिकोण से प्रेरित रामवृक्ष बेनीपुरी साहित्य और समाज के लिए विद्रोही रचनाकारों की फौज तैयार करने में लगे थे जो समाज की कुत्सित मानसिकता को भंग कर स्वस्थ समाज के निर्माण का जिम्मा अपने कांधे पर ले सके। वैसे तो 'नई धारा' का संबंध साहित्य विशेष से रहा लेकिन रामवृक्ष बेनीपुरी ने साहित्य और राजनीति को जोड़ने का कार्य भी पूर्व में ही संभव कर दिखलाया था। नई धारा के दृष्टिकोण और उसके प्रकाशन के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए रामवृक्ष बेनीपुरी ने लिखा, "समाज को विद्रोही चाहिए, उससे अधिक विद्रोही चाहिए साहित्य को, कला को। नई धारा ऐसे विद्रोहियों की वाणी कहकर जिस दिन बदनाम की जाएगी, हमारी चरम सफलता का दिन तब होगा। वह दिन निकट आए, यही आशीर्वाद दीजिए।" [११]
'नई धारा' का संपादन करने से पहले रामवृक्ष बेनीपुरी को संपादन कला का अच्छा खासा अनुभव प्राप्त हो चुका था। उन्होंने आजादी से ठीक पहले के विकट दौड़ में भी पत्रकारिता करने का जोखिम उठाया था। कई बार जेल भी जाना पड़ा था। इन सभी ने उनके पत्रकार व्यक्तित्व को मांझने का काम किया था। नई धारा पत्रिका समाजवादी राजनेता जयप्रकाश नारायण की भी कृपापात्र थी। बेनीपुरी जी पहले से ही जयप्रकाश नारायण से प्रभावित थे, उनके साथ काम कर चुके थे, इसका स्पष्ट प्रभाव बेनीपुरी जी के समय के नई धारा के अंकों पर लक्षित होता है। बेनीपुरी जी ने समाजवादी विचारधारा को सदैव जिलाए रखने का प्रयास किया लेकिन इसका मतलब यह कदाचित नहीं है कि वे 'नई धारा' का संपादन किसी वाद या विचारधारा से बंध कर करते थे। नई धारा के प्रकाशन के पीछे उनका एकमात्र उद्देश्य वाद और विचारधाराओं से मुक्त होकर अच्छे साहित्य का प्रकाशन मात्र था। "वह किसी गुट, किसी वाद और किसी दल की न होकर अकेली कला की होगी, साहित्य की आंखों की पुतली।"[१२] इसी दृष्टिकोण से नई धारा का संपादन बेनीपुरी जी ने किया। बेनीपुरी जी ने नई धारा को लोकप्रिय बनाने के लिए कई स्तंभों की शुरुआत की। नई धारा में समय-समय पर विदेशी रचनाकारों की रचनाओं का हिंदी अनुवाद प्रकाशित कर हिंदी जगत का परिचय विश्व-साहित्य से करवाने का काम भी किया गया। 'मैक्सिम गोर्की' जैसे प्रसिद्ध रचनाकार की रचनाओं को नई धारा ने प्रमुखता से प्रकाशित की। जून १९५१ ई. वाले अंक में मैक्सिम गोर्की का 'मैंने लिखना क्यों शुरू किया' प्रकाशित किया गया जिस का हिंदी अनुवाद श्रीकांत व्यास ने किया था। जनवरी १९५१ का अंक 'बर्नार्ड शाॅ' पर केंद्रित अंक के रूप में प्रकाशित किया गया। जिसमें बर्नार्ड शाॅ की रचनात्मक दृष्टिकोण, रचना शैली, रचनाधर्मिता आदि को उजागर किया गया। 'फूल और कलियाँ' नाम से एक स्थाई स्तंभ की शुरुआत बेनीपुरी जी ने नई धारा में की थी जिसमें फूल के रूप में लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकारों की कविताएं प्रकाशित की जाती थी और उसके साथ ही कली के रूप में नए एवं संघर्षशील रचनाकारों की कविताएं प्रकाशित की जाती थी। नई धारा का 'डायरी स्तंभ' भी काफी लोकप्रिय हुआ जिसमें रामवृक्ष बेनीपुरी अपनी डायरी के अंशों को प्रकाशित करते थे जिसके माध्यम से समाज, साहित्य, राजनीति, संस्कृति और तदयुगीन पत्रकारिता पर बेनीपुरी जी की पैनी दृष्टि बनी रहती थी। वे खुलकर उसकी अंतरवीक्षा किया करते थे।
"हिंदी में संपादन वैशिष्ट्य के कारण 'नई धारा' का महत्वपूर्ण योगदान रहा। छपाई, सज्जा, वस्तुपक्ष, नए-पुराने लेखकों का परिचय, संपादकीय लेख, विशेषांक, विविध आंदोलन आदि दृष्टियों से नई धारा नहीं बेनीपुरी जी को साहित्यिक पत्रकारिता में यशस्वी बनाया।"[१३]
हिंदी पत्रकारिता खास तौर पर बिहार कि हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में रामवृक्ष बेनीपुरी का महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने अपनी पत्रकारिता के द्वारा नवीन मापदंड स्थापित करते हुए अनेक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन एवं प्रकाशन किया। रामवृक्ष बेनीपुरी एक ही साथ श्रेष्ठ साहित्यकार एवं मंजे हुए पत्रकार और एक निर्भीक क्रांतिकारी भी थे। उन्हें जयप्रकाश नारायण, माखनलाल चतुर्वेदी, आचार्य शिवपूजन सहाय जैसे बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्तित्व का सानिध्य प्राप्त था। अंग्रेजी शासन के दौरान पत्रकारिता करते हुए जब उन्हें कैद में रखा गया तब भी उन्होंने 'जंजीरें और दीवार' जैसी पुस्तक का प्रणयन और 'कैदी' तथा 'तूफान' जैसे पत्रों का संपादन किया। बालकों को शिक्षा और संस्कार देने के निमित्त 'बालक' और 'चुन्नू मुन्नू' का संपादन किया। साहित्य सेवा के निमित्त 'हिमालय', 'नई धारा' जैसी पत्रिकाओं का कुशलतापूर्वक संपादन संभाला। राजनीति में गहरी दखल रखते हुए कई राजनैतिक पत्रों का संपादन किया। समग्रता में रामवृक्ष बेनीपुरी हिंदी साहित्य जगत में एक सिद्धहस्त साहित्यकार और कुशल पत्रकार के रूप में सर्वमान्य हैं।
संदर्भ सूची :
१. बेनीपुरी, रामवृक्ष, उद्धृत- कृष्णानंद द्विवेदी- 'बिहार की हिंदी पत्रकारिता', प्रवाल प्रकाशन, पटना, प्रथम संस्करण : १९९६, पृष्ठ - १८६-८७
२. बेनीपुरी, रामवृक्ष, उद्धृत, कल्याण कुमार झा, 'बिहार की हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता', साहित्य कला संगम, बेतिया, प्रथम प्रकाशन : १९९७, पृष्ठ - ६३
३. मोहन, शैलेंद्र कुमार, उद्धृत, कल्याण कुमार झा, 'बिहार की हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता', साहित्य कला संगम, बेतिया, प्रथम प्रकाशन : १९९७, पृष्ठ - ६६
४. झा, कल्याण कुमार, 'बिहार की हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता', साहित्य कला संगम, बेतिया, प्रथम प्रकाशन : १९९७ पृष्ठ - ६८
५. द्विवेदी, कृष्णानंद - 'बिहार की हिंदी पत्रकारिता', प्रवाल प्रकाशन, पटना, प्रथम संस्करण : १९९६, पृष्ठ - ९९
६. उद्धृत, विश्वनाथ प्रसाद - 'हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता को बेनीपुरी की देन', पत्रिका, 'मैत्रेयी', संपादक - प्रभाकर पाठक, शोध विशेषांक : २०१३, पृष्ठ - २३३
७ .हंसराज, उद्धृत, कल्याण कुमार झा, 'बिहार की हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता', साहित्य कला संगम, बेतिया, प्रथम प्रकाशन : १९९७, पृष्ठ - ७७
८. सहाय, शिवपूजन, उद्धृत, अमित कुमार मिश्रा-' साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में आचार्य शिवपूजन सहाय का योगदान', पत्रिका - 'The Perspective' International Journal of Social Science and Humanities, Vol. -1, Issue -3, August-October, Page-147
९. द्विवेदी, कृष्णानंद - 'बिहार की हिंदी पत्रकारिता', प्रवाल प्रकाशन, पटना, प्रथम संस्करण : १९९६, पृष्ठ - ११४
१०. देव, आचार्य नरेंद्र - पत्रिका, नई धारा, जून, १९५० (पुनर्प्रकाशन), पृष्ठ-०६
११. बेनीपुरी, रामवृक्ष, उद्धृत- द्विवेदी, डॉ कृष्णानंद - 'बिहार की हिंदी पत्रकारिता', प्रवाल प्रकाशन, पटना, प्रथम संस्करण : १९९६, पृष्ठ - १४४
१२. वही
१३. प्रसाद, विश्वनाथ- 'हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता को बेनीपुरी की देन', पत्रिका, 'मैत्रेयी', संपादक - प्रभाकर पाठक, शोध विशेषांक : १०१३, पृष्ठ - २३४
अमित कुमार मिश्रा
शोधार्थी, हिंदी विभाग, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा, बिहार
दूरभाष : 9304302308 ईमेल : amitraju532@gmail.com
डॉ अमरकांत कुमर
अध्यक्ष, हिंदी विभाग, महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह मेमोरियल महाविद्यालय, दरभंगा, बिहार संपर्क - 9430236078
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