हिंदी साहित्य की पत्रकारिता के शिखर पुरुष : आचार्य शिवपूजन सहाय (आलेख)

-अमित कुमार मिश्रा                                      

'आचार्य शिवपूजन सहाय' हिंदी साहित्य में तो अपना विशेष महत्व रखते ही हैं, हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता को पहचान दिलाने में भी उनका विशिष्ट स्थान है | बिहार की साहित्यिक पत्रकारिता को प्रतिष्ठित करने वाले पत्रकारों में उनका सर्वश्रेष्ठ स्थान है | जिस समय आचार्य शिवपूजन सहाय का पदार्पण पत्रकारिता जगत में हुआ, उस समय हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता अपना शैशवावस्था पूर्ण कर चुकी थी | 20 वीं सदी का आरंभिक चरण हीं सरस्वती, हंस, जागरण, मतवाला, माधुरी जैसी प्रौढ़ पत्रिकाओं से सुशोभित हो चुका था | इस दौर में हिंदी साहित्य से अनेक कोंपले फूट रही थी | हिंदी साहित्य के स्वरूप निर्धारण, भाषा का परिमार्जित रूप, साहित्य लेखन की दिशा निर्धारण, सभी का उत्तरदायित्व प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के संपादकों के कंधों पर था | ऐसे ही दौर में पत्रकारिता जगत में आचार्य शिवपूजन सहाय ने कदम रखा | संभवतः उन्होंने 'मारवाड़ी-सुधार' से 1921 ई० में पत्रकारिता की शुरुआत की | उन्होंने स्वयं लिखा है -

"लेखक तो मैं 1910 से ही बन गया था, पर 1921 से संपादक भी बन गया |" 1

मारवाड़ी-सुधार वैसे तो एक जातीय पत्रिका थी, लेकिन इस पत्रिका का स्वरूप उच्चकोटि के साहित्यिक पत्रिका का था | मारवाड़ी पत्रिका की शुरुआत होने और स्वयं उसके संपादक का दायित्व संभालने के विषय में उन्होंने लिखा है -

"स्कूल के मेरे होनहार छात्रों में एक हरद्वार प्रसाद जालान भी थे |      ×     ×     ×     ×      उनको पढ़ाने के लिए जब मैं उनके घर जाता था, तब स्कूल की पाठ्य पुस्तकें ही पढ़ा करते थे | साथ हीं, अपने मारवाड़ी-समाज को सुधारने की चिंता और चर्चा भी प्रायः किया करते थे | उनके दो स्वजातीय बंधु और भी थे - श्रीनवरंगलाल तुलस्यान और श्रीदुर्गाप्रसाद पोद्दार | इन्हीं तीन साथियों ने आरा नगर में 'मारवाड़ी-सुधार समिति' नामक संस्था कायम की | इसी संस्था का मासिक मुखपत्र हुआ - मारवाड़ी-सुधार और मैं बना उसका संपादक - नया रंग रूप |" 2

यह पत्रिका कलकत्ता के 'बालकृष्ण प्रेस' से छपती थी | इस बाबत भी उन्होंने स्वयं उल्लेख किया है -

"पंडित ईश्वरी प्रसाद जी शर्मा ने पत्र के छपने के लिए एक प्रेस ठीक किया | शर्मा जी मेरे साहित्यिक गुरु थे | तत्कालीन कलकत्ता के सर्वश्रेष्ठ हिंदी प्रकाशक श्री रामलाल वर्मा के बर्मन प्रेस में काम करते थे | किंतु 'मारवाड़ी-सुधार' की छपाई के लिए उन्होंने 'बालकृष्ण प्रेस' से सब कुछ पहले ही तय कर लिया था | उस प्रेस के मालिक बाबू महादेव प्रसाद सेठ से उन्हीं के मार्फत जान-पहचान हुई |" 3

ऊपर चर्चा में आए इन्हीं महादेव प्रसाद सेठ ने निराला और शिवपूजन सहाय के संगत में हिंदी की कालजयी पत्रिका 'मतवाला' के प्रकाशन की शुरुआत की | वस्तुतः शिवपूजन सहाय 'बालकृष्ण प्रेस' के जिस दफ्तर से मारवाड़ी-सुधार निकाला करते थे, उसी के ऊपरी हिस्से में 'निराला' रहते थे | -

"नीचे के हिस्से में प्रेस था और ऊपर के तल्ले में 'रामकृष्ण मिशन' के कुछ कर्मयोगियों का निवास | उन्हीं न्यासियों के साथ कविवर निराला जी रहा करते थे |" 4

इस तरह से 'मतवाला' के तीनों कर्मयोगी बाबू महादेव प्रसाद सेठ, निराला और आचार्य शिवपूजन सहाय का मेल हुआ और 1923 ई० में 'मतवाला' का सफर शुरू हुआ | Wikibooks.org ने उल्लेख किया है -

"यद्यपि इसके संस्थापक महादेव प्रसाद सेठ थे तथापि इस पत्र की पूर्ण जिम्मेदारी शिवपूजन सहाय, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' व पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र' की ही थी |" 5

सन् 1924 ई० में शिवपूजन सहाय 'मतवाला' से अलग हो गए | संभवतः वे उसी समय या कुछ समय बाद लखनऊ से प्रकाशित होने वाली 'माधुरी' में चले गए, जिसका संपादन दुलारेलाल भार्गव किया करते थे | 'माधुरी' में जाने के कारणों के बिषय में यह जानकारी मिलती है कि शिवपूजन सहाय जी पर पारिवारिक खर्च का दबाव ज्यादा था और वहां उन्हें इतना पैसा नहीं मिलता था कि वे अपनी जिम्मेदारियों को निभा पाते; इसके बावजूद की 'मतवाला' से पत्र के मालिक महादेव प्रसाद सेठ को अच्छा मुनाफा मिल रहा था | इन्हीं बातों का फायदा उठाकर शिवपूजन सहाय को दुलारेलाल भार्गव ने 'माधुरी' में बुला लिया ; बल्कि यह कहें कि जबरन बुला लिया गया| इसके लिए दुलारे लाल भार्गव को अपने मुंशी को शिव जी के गांव तक भेजना पड़ा। दुलारेलाल भार्गव 'मतवाला' के मार्फत आचार्य शिवपूजन सहाय के लेखनी की महत्ता को जान चुके थे| 1925 में कुछ समय तक आचार्य शिवपूजन सहाय ने 'माधुरी' का संपादन कार्य संभाला | 'माधुरी' में शिवपूजन सहाय काम तो कर रहे थे लेकिन एक तो 'मतवाला' में मिला अपूर्व स्नेह और दूसरा 'माधुरी' के कार्यालय में सदैव बना रहने वाले दबाव के कारण वे 'माधुरी' में टिक नहीं सके | लखनऊ में हुए दंगे के समय जब उन्हें जान बचाकर घर भागना पड़ा तब वे दुलारे लाल भार्गव के कई पत्र लिखने के बावजूद  पुनः लौटकर नहीं गए | 

जनवरी 1925 में पुनः कोलकाता चले गए और एक बार फिर से 'मतवाला' को उसका खोया हुआ रत्न मिल गया | दैवयोग से इस बार भी वे 'मतवाला' में तीन महीने से ज्यादा नहीं रुक सके | इस दौरान वे कुछ समय तक कोलकाता में रुके भी रहे और थोड़े-थोड़े समय के लिए गोलमाल, मौजी, समन्वय, उपन्यास-तरंग आदि का भी संपादन किया |

सन् 1930 ई० में सुल्तानगंज से कुमार कृष्णानंद सिंह ने 'गंगा' नामक साहित्यिक पत्रिका की शुरुआत की | इस पत्रिका के संपादक का कार्य आचार्य शिवपूजन सहाय ने संभाला | 'गंगा' पत्रिका ने हिंदी साहित्य में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया | यह उल्लेख भी मिलता है कि पत्रिका के मुख्य संपादक आचार्य शिवपूजन सहाय और संपादक पंडित राम गोविंद त्रिवेदी थे | इस पत्रिका के विशेषांकों का अपूर्व महत्व रहा | इसके कुछ प्रमुख विशेषांक हैं - गंगांक, विज्ञानांक, चरित्रांक, वेदांक, पुरातत्वांक इत्यादि | साहित्य जगत में 'गंगा' अल्पजीवी प्रमाणित हुई |

'गंगा' और शिवपूजन सहाय के संबंध को लेकर इस विषय में मतभेद पाया जाता है कि आचार्य शिवपूजन सहाय ने 'गंगा' में प्रधान संपादक का दायित्व निभाया था अथवा संपादक का | कल्याण कुमार झा ने लिखा है -

"पंडित रामगोविंद त्रिवेदी इसके प्रधान संपादक थे और पंडित गौरीनाथ झा तथा शिवपूजन सहाय ने इसका संपादन किया |" 6

पुस्तक मंदिर प्रकाशन की ओर से 1932 में 'जागरण' नाम से एक साहित्यिक पाक्षिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया गया | जिसके संपादक आचार्य शिवपूजन सहाय बनाए गए | 11 फरवरी 1932 को इसका पहला अंक निकला था | यह पत्रिका अल्पजीवी प्रमाणित हुई और 17 जुलाई 1932 को निकलने वाले अंक के साथ यह बंद भी हो गयी | 'जागरण' के इतनी जल्दी बंद हो जाने से शिवपूजन सहाय काफी दुःखी थे और इसके लिए वे स्वयं को और अपने भाग्य को हीं दोषी मानते थे | निराशा की उसी अवस्था में उन्होंने लिखा -

"हमारे मुखारविंद की ऐसी महिमा है कि जहां जो हैं, चापड़ कर डालते हैं | पहले पहल मारवाड़ी-सुधार का बंटाढ़ार किया फिर आदर्श और उपन्यास-तरंग का छत्रभंग किया | यदि बालक और गंगा को न छोड़ते, तो उन्हें भी ले बीतते | और यदि जागरण को प्रेमचंद जी अपना पोसपुत्तर न बना लेते, तो शायद इसकी भी खैर न थी |" 7

1946 में जब वे राजेंद्र कॉलेज, छपरा में प्राध्यापक के रूप में नियुक्त हो चुके थे | उन्हीं दिनों पुस्तक भंडार प्रकाशन से 'हिमालय' नामक मासिक पत्रिका के संपादन की योजना बनी | इस समय तक पुस्तक भंडार के मालिक रामलोचन शरण पुस्तक भंडार का प्रेस पटना में स्थापित कर चुके थे | 'हिमालय' का पहला अंक 1946 के फरवरी या मार्च महीने में छपा | इन दिनों आचार्य शिवपूजन सहाय को अपने घर उनांव, छपरा और पटना से 'हिमालय' की प्रेस तीनों जगह आना-जाना पड़ता था | इसी बीच में डॉ० राजेंद्र प्रसाद के आत्मकथा के प्रूफ देखने और छपवाने के सिलसिले में इलाहाबाद भी जाना पड़ा | दूसरी ओर पुस्तक भंडार के मालिक की ओर से भी 'हिमालय' के प्रकाशन में अरुचि दिखाई जाने लगी और अंततः 1948 में 'हिमालय' का प्रकाशन बंद कर दिया गया | इस दौरान उसके लगभग 13 अंक प्रकाशित हुए थे | यह एक उच्चकोटि की साहित्यिक पत्रिका थी | जिसका संपादन आचार्य शिवपूजन सहाय और रामवृक्ष बेनीपुरी संयुक्त रूप से करते थे | इस पत्रिका के विषय में डॉ० हंसराज के विचारों को डॉ० कल्याण कुमार झा ने बिहार की हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता में उद्धृत किया है -

"इसके संपादन का भार हिंदी जगत के भीष्म पितामह श्री शिवपूजन सहाय और श्री बेनीपुरी जी जैसे महारथी साहित्यकारों ने ग्रहण किया है | डॉ० राजेंद्र प्रसाद और आचार्य नरेंद्र देव जैसे महान व्यक्तियों का इस पर वरदहस्त है | पहले ही अंक में 'होनहार वीरबान के होत चिकने पात' वाली उक्ति चरितार्थ हो रही है |" 8

बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन, पटना ने 1936 ई० में 'साहित्य' नामक त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया | यह पत्रिका आरंभ में संभवतः 1936 से 1938 तक ही प्रकाशित हो सकी | दूसरी बार इसका प्रकाशन 1950 ई० में शुरू किया गया जो 1962 तक चला | इस दौरान इस पत्रिका के संपादन का दायित्व जनार्दन प्रसाद झा 'द्विज',  लक्ष्मीनारायण सुधांशु, आचार्य शिवपूजन सहाय, केसरी कुमार, नलिन विलोचन शर्मा आदि ने किया | 'साहित्य' को हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं में अपूर्व ख्याति मिली | इसके सभी संपादक विद्वान आचार्य थे | आचार्य शिवपूजन सहाय ने इस पत्रिका को अपूर्ण ऊंचाई दी | इस पत्रिका में आचार्य शिवपूजन सहाय द्वारा लिखे गए संपादकीय का विशेष महत्व है | यह संपादकीय लेख रूप में लिखे जाते थे | कुछ प्रमुख लेख हैं - राष्ट्रभाषा का विरोध, राष्ट्रभाषा का स्वरूप, महाकवि निराला की अस्वस्थता, हिंदी में पत्र साहित्य की कमी, हिंदी में साहित्यिक शोध साधनों की कमी, हिंदी का विरोध आदि | यह संपादकीय लेख दीर्घकाल तक चर्चा के केंद्र में बने रहे |

1924 ई० में पटना से 'गोलमाल' नामक एक हास्य व्यंग प्रधान पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया गया | यह एक साप्ताहिक पत्रिका थी | इस पत्रिका का संपादन तो रामवृक्ष बेनीपुरी करते थे किंतु स्वयं बेनीपुरी जी ने स्वीकारा है कि यह पत्रिका आचार्य शिवपूजन सहाय के मार्गदर्शन में निकलती थी |

"एक मारवाड़ी युवक दीनानाथ सिंगतिया व्यंग्य और हास्य प्रधान पत्र निकालने की फिक्र में हैं और उन्होंने शिवपूजन जी को एक आदमी देने के लिए आग्रह किया था, जिससे मेरी बुलाहट हुई थी | पत्र का नाम रखा गया 'गोलमाल' और पहले अंक के सभी शीर्षक और लेख शिवपूजन जी ने ही ठीक किया |" 9

सन् 1938 ई० में रामदहीन मिश्र के संपादन में निकलने वाली 'किशोर' पत्रिका से भी शिवपूजन सहाय का गहरा संबंध रहा | आचार्य शिवपूजन सहाय ने इस पत्रिका का संपादन तो नहीं किया लेकिन रचनात्मक सहयोग और परामर्श निरंतर देते रहें |

"आचार्य शिवपूजन सहाय का रचनात्मक सहयोग और परामर्श इस पत्रिका को सहज ही उपलब्ध था | इसमें आचार्य शिवपूजन सहाय ने महत्वपूर्ण विषयों पर कई रचनाएं लिखी |" 10

अभी तक जिन बातों पर विमर्श की गई, वे मूलतः आचार्य शिवपूजन सहाय के पत्रकारिता-कर्म पर आधारित है | यहां यह देख लेना भी विशेष संदर्भित ही होगा कि साहित्यिक पत्रकारिता को आचार्य शिवपूजन सहाय किस दृष्टि से देखते हैं या फिर पत्रकारिता से उनकी क्या अपेक्षाएं थी | अपने युग की बिहार की प्रतिष्ठित पत्रिका 'शिक्षा', 'देश' और 'महावीर' आदि को लक्ष्य करते हुए उन्होंने जो बातें कही वे पत्रकारिता के संबंध में उनके मत को स्पष्ट करती हैं |

"........खूब शुद्धता के साथ स्वच्छ-सुंदर टाइप में अच्छे कागज पर छपें, भाषा की सुगमता और सरसता के साथ-साथ विराम-चिन्हों की शुद्धता तक पर पूरा ध्यान दें, जनता के नितनूतन ज्ञानवृद्धि और विविध सुविधाओं का भली-भांति ख्याल रखें, एक लाइन की जगह में भी खोगीर की भर्ती न करें, खूब गढ़ा हुआ सुपाठ्य एवं शिक्षाप्रद तथा मनोरंजक मैटर यथा स्थान क्रमबद्ध सजाया करें, तो बिहार की लाज रह सकती है ; अन्यथा नहीं |" 11

शिवपूजन सहाय के विचारों से यह भली प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि वे हिंदी पत्रकारिता के स्वरूप को लेकर काफी सजग थें | खास तौर पर बिहार से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिकाओं के स्तर को लेकर उनकी चिंता निरंतर प्रकट होती रही है | अपने संपादकीय और निबंधों में उन्होंने निरंतर इन तथ्यों की ओर इशारा भी किया है और कठोरता से अपनी बातों को रखते हुए पत्रिका के संपादकों और प्रकाशकों से उसकी दशा को सुधारने के लिए नम्र निवेदन भी किया और कठोरता से बात भी की | यहां तक कि वे उनके विषय में भी लिखने से नहीं चूके, जो उनके विशेष करीबी थे या जिनके वेकृपापात्र थे |

" 'शिक्षा' के बाद 'देश' पर दृष्टि डाली गई ; क्योंकि उसके समपोषक हैं बिहार के गांधी परम आदरणीय श्रीमान बाबू राजेंद्र प्रसाद जी, एम•ए, एम•एल | राजेंद्र बाबू की चरणरेणु-कण भी शिरोधार्य करने की पात्रता मुझमें नहीं है, फिर भी निर्भय होकर कहे बिना रहा नहीं जाता कि 'देश' के संपादन से बिहार के साहित्यिक गौरव की रक्षा नहीं हो रही है और राजनीतिक जागृति के काम में भी वह अपनी श्रेणी के प्रतिष्ठित पत्रों से पिछड़ा हुआ है |" 12

शिवपूजन सहाय के इस मत से भली प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि पत्रिकाओं के स्वरूप में सुधार के लिए वे इस हद तक कटिबद्ध थे कि वे डॉ राजेंद्र प्रसाद जैसे महान विभूति की आलोचना करने से भी नहीं चूके | अपने समय में बिहार से निकलने वाले पत्रिकाओं के विषय में वे लिखते हैं कि -

"बिहार के हिंदी पत्रों की दशा किसको मालूम नहीं है | सब लोग जानते हैं कि बिहार के हिंदी पत्र कैसे अच्छे निकलते हैं | दुनिया में देखा-देखी उन्नति भी होती है- प्रतिद्वंदिता का भाव जोर पकड़ता है ; पर बिहार के पत्र तो दूसरे को सरपट दौड़ते देख दुलकी भी नहीं | न टाइप साफ, न छपाई शुद्ध, न भाषा आकर्षक, न विराम-चिन्हों का ठिकाना, न विषयों का चुनाव ठीक, न सामग्री-संकलन सुंदर - यूं हीं यत्र-तत्र लेख और संवाद बिखरे पड़े हैं, मानो इधर-उधर का कूड़ा बटोरकर एक जगह रख दिया हो |" 13

पत्रकारिता से जुड़ी इन महत्वपूर्ण कार्यों के साथ आचार्य शिवपूजन सहाय ने अनेक ग्रंथों का संशोधन, संपादन कार्य भी किया | इन्हीं कार्यों में रमे रहने के कारण बाद में उनकी आंखें भी काफी कमजोर हो चली थी जिसका जिक्र करते हुए उन्होंने एक जगह लिखा -

"अब आंखें ठीक काम नहीं करती | प्रूफ देखते-देखते आंखे चौपट हो गई | असंख्य फार्मो के प्रूफ मैंने देखें और शोधे होंगे | जीवन नष्ट हो गया | जितना प्रूफ देखा उतना लिख डालता तो दस हजार पृष्ठों से कम नहीं होता |" 14


संदर्भ सूची :

1. सहाय, शिवपूजन - कलकत्ता प्रवास के संस्मरण, नई धारा- सं.- उदयराज सिंह, अर्द्धशती अंक, पृ.- 119

2. वहीं       3. वहीं          4. वहीं, पृ.- 120

5. अंतरजाल के wikibooka पृष्ठ से । 

6. झा, कल्याण कुमार, बिहार की हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता, साहित्य कला संगम, प्रथम प्रकाशन-1997, पृ- 66

7. वहीं, पृ.- 77

8. शिशिर, कर्मेंदु पत्रकारिता के युग निर्माता : शिवपूजन सहाय, प्रभात प्रकाशन, 2010 संस्करण, पृ.-

9. झा, कल्याण कुमार, बिहार की हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता, साहित्य कला संगम, प्रथम प्रकाशन-1997, पृ- 63

10. वहीं, पृ.- 74

11. सहाय, शिवपूजन - शिवपूजन रचनावली, तीसरा खण्ड, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद (पटना), नवीन संस्करण - 2014 विक्रमाब्द, पृ.- 317.

12. वहीं, पृ.- 316.         13. वहीं, पृ.- 315.

14. शिशिर, कर्मेंदु - पत्रकारिता के युग निर्माता : शिवपूजन सहाय, प्रभात प्रकाशन, 2010 संस्करण, पृ.- 35

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