हुजूर गजब ढ़ाते हो
मतलब निकलते ही हमारे वजूद को ऐसे मिटाते हो
जैसे सिलेट पर खड़िया से लिखे म, ज, दू, र मिटाते हो
हमारे हाथ तराशते हैं ताजमहल की नक्काशी
बन जाने पर दीवारों से हमारे पसीने की गंध मिटाते हो
आपके बेघर भगवान के घर तक हमने बनाये हैं
हमारे कदमों के निशान गंगाजल से धुलवाते हो
हमसे ज्यादा बदनसीब कौन है जमाने में हुजूर
हमारे ही बनाये संसद में हमारी होली जलाते हो
हम तो कैसे भी अपनी जिन्दगी जी लेते गांव में
आप हीं शहर बसाने को बार-बार बुलाते हो
यह गजब की रीति है आपकी दुनिया की हुजूर
हमारे बसाये शहर में हमें ही जाहिल बताते हो
सब कुछ भूला दिया मगर यह याद रखेंगे 'अमित'
हमारे घर में लगी आग से आप दीया जलाते हो
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें