निर्भीकता का कवि: नागार्जुन
निर्भीकता
का कवि: नागार्जुन
नागार्जुन
की कविता के जितने सोपान हैं उन सभी को जानने समझने के लिए मनुष्य की उम्र भर का
अध्ययन भी कम पड़ जाएगा किंतु मुझे नागार्जुन की कविता के जिस पक्ष ने सर्वाधिक
आकर्षित किया है वह है उनकी निर्भीक बयानबाजी। शासन से सीधे-सीधे टकरा जाने का जो जोखिम नागार्जुन
ने उठाया वह कबीर जैसे कुछ बिरले कवियों में ही देखने को मिलता है। नागार्जुन ना
सिर्फ व्यवस्था से टकराते हैं अपितु समाज की बुराइयों से भी लोहा लेते सहज ही दिख
पड़ते हैं । हरिजन गाथा जैसी कविता इसकी जीवंत उदाहरण है। आज के कवियों का एक बड़ा
भाग जहां एक ओर शासन व्यवस्था से जुड़ें मंत्रियों और अधिकारियों की चाटुकारिता
में कविता पढ़ते दिख पड़ता है तो दूसरी ओर ऐसा भाग भी हैं जो शासन के विरोध में
लिखता तो है लेकिन यहां भी यदि सूक्ष्मता से देखी जाए तो उनका विरोध सर्वजन हिताय
ना होकर स्वांत सुखाय होता है । आज का हर एक कवि अपने अंतरात्मा से किसी ना किसी
राजनीतिक दल का समर्थक है और इस नाते उसके विरोधी दल का आलोचक है, यहां राजनीतिक दल की आलोचना विशुद्ध
सामाजिक दृष्टि से उत्थानपरक न होकर व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से अधिक जुड़ा होता है।
साहित्यकारों का अधिकांश भाग
प्रोत्साहन में मिलने वाली राशियों, पुरस्कारों के लालच में गाथा साहित्य
लिखने में व्यस्त है। और जो बच जाते हैं वह प्रेम की कविता, गीत,
गजल आदि के माध्यम से पाठकों को
आकर्षित करने में लीन हैं। जनता की आवाज बनने को कोई तैयार नहीं है क्योंकि वहां
लाभ के मोती नहीं जगमगाते हैं, इन परिस्थितियों में नागार्जुन जैसे
कवियों की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है जो खुद को जनता का कवि मानकर उसकी जुबान
बोलता है, जिसकी कविता में जनता के सुख-दुख,
हर्ष-विषाद का स्वर तीव्र होता है-
जनता
मुझसे पूछ रही है
क्या
बतलाऊं
जनकवि
हूं मैं साफ कहूंगा
क्यों
हकलाऊं।
नागार्जुन
सिर्फ
इसलिए
जनकवि
नहीं
हैं
क्योंकि
उन्होंने
खुद
को
जनकवि
कहा
है
उनका
कवि-कर्म
स्वयं
चीख-चीखकर
इस
बात
की
गवाही
देता
है कि वे जनता की आवाज बुलंद करते हैं। नागार्जुन
उन कवियों
में
से
हैं
जो
सीधे-सीधे
व्यवस्था
से
टकराने
की
साहस
रखता
है| ब्रिटेन
की
महारानी
के
स्वागत
में
पलके
बिछानेवाला
स्वयं
जवाहर
लाल
नेहरू
जैसा
प्रभावशाली
नेता
ही
क्यों
ना
हो
वह
यदि
जन
उपेक्षा
का
कार्य
करेगा, जनमत
को
अनदेखा
करेगा
तब
नागार्जुन
जैसा
जनकवि
चुप
नहीं
रह
सकता
परिणाम
चाहे
कुछ
भी
भुगतना
पड़े | उनका
विरोध
तब
और
भी
पैना
हो
उठता
है
जब
उनकी
अभिव्यक्ति
में
व्यंग्य
का
पुट
मिल
जाता
है-
आओ
रानी
हम
ढोएंगे
पालकी
यही
हुई
है
राय
जवाहर
लाल
की
|1
भले
ही
शासन
बंदूक
तानकर
खड़ी
रहे
उन्हें
जो
असंगत
लगेगा
उसका
विरोध
वे
करेंगे
ही
| इंदिरा
गांधी
के
द्वारा
की
गई
आपातकाल
की
घोषणा
जनमत
की
हत्या
थी, इस
समय
जय
प्रकाश
नारायण
जैसे
अनगिनत
जनता
की
आवाज
उठाने
वाले
नेताओं
को
हवालात
में डाल
दिया
गया | जनता
विद्रोह
न
करें
इसलिए
उनके
सीनेपर
बंदूक
तान
दी
गई
लेकिन
नागार्जुन
जैसा
हरफनमौला
कवि
सदैव
उसी
प्रकार
अपनी
वाणी
को
स्वाधीन
रखता
है
जैसे
कि
कोयल | और
जिस
प्रकार
कोयल
को
कूकने
से
कोई
शक्ति
नहीं
रोक
पाती
है
वैसे
ही
नागार्जुन
की
अभिव्यक्ति
पर
भी
कोई
पाबंदी
नहीं
लगा
सका-
जली
ठूंठ
पर
बैठकर
गई
कोकिला
कूक
बाल
न
बांका
कर
सकी
शासन
की
बंदूक
|2
लंबे
और
थकान
संघर्ष
के
बाद
आजादी
तो
मिल
गई
लेकिन
यह
आजादी
चंद
नेताओं
और
अफसरों
के
लिए
ही
आनंददायिनी
थी
शेष
जनता
तो
अभी
भी
अकुला
रही
थी, सिर्फ
तिरंगे
की
आजादी
से
जनता
का
दुख
दूर
नहीं
हुआ, आज
भी
आजादी
उनके
लिए
बेईमानी
लग
रही
थी
और
जब
तक
जनता
को
वास्तविक
आजादी
नहीं
मिल
जाती
राजकवि
चैन
की
सांस
ले
सकता
है
जनकवि
नहीं-
भीतर
झुरा
गई
ठठरी, बाहर
झुलसी
चाम
भूखी
जनता
की
खातिर
आजादी
हुई
हराम
|3
लोकतंत्र
के
नाम
पर
कांग्रेस
सरकार
जनता
को
बेवकूफ
बनाकर
अपनी
शान
में
इजाफा
कर
रही
थी, वह
कहने
को
जनता
की
सरकार
थी
लेकिन
उस
का
सरोकार
कहीं
भी
जनता
से
नहीं
था, भारत
के
शत्रु
इंग्लैंड
से
नेहरू
गले
मिल
रहे
थे, विदेशी
सामान
का
विरोध
करने
वाली
सरकार
खुल
कर
विदेशी
सामग्री
का
उपयोग
कर
रही
थी, जो
कांग्रेस
शराबखाने
के
बाहर
धरने
देती
थी
उसकी
पाटियों
में
शराब
की
नदियां
बहती
थी
और
जनता
दाने-दाने
को
मोहताज
थी-
अरे
अभी
उसरोज
वहां
पर
सरेआम
जक्शन
बाजार
में
शिक्षा
मंत्री
स्वयं
पधारें
चम
चम
करती
सजी
कार
में |4
स्वतंत्रता
की
लड़ाई
में
गांधी
के
पीछे
चलने
वाले
सत्तालोलुप
कब
गांधी
से
आगे
निकल
गए
पता
ही
नहीं
चला
| वह
किसी
भी
तरह
शासन
पर
काबिज
होना
चाहते
थे
इसके
लिए
जो
भी
करना
पड़े
वे
सब
करने
को
तैयार
थे
| गांधी
के
अनुयायियों
ने
गांधी
के
नाम
को
बेच
कर
शासन
किया, गांधीवाद
की
हत्या
कर
शासन
की
और
अंत
में
गांधी
के
नाम
पर
भीख
मांगने
से
भी
नहीं
हिचके, यह
सब
देख-देख
कर
नागार्जुन
का
ह्रदय
व्यथित
हो
रहा
था
और
बिना
किसी
की
परवाह
किए
निर्भीकता
से
वे
उन
सफेदपोशों
को
बेनकाब
करते
हैं-
बापू
के
भी
ताऊ
निकले
तीनों
बंदर
बापू
के
सरल
सूत्र
उलझाऊ
निकले
तीनों
बंदर
बापू
के | 5
गांधी
के
अनुयाई
अवसर
मिलते
ही
गांधी
से
किनारा
कर
अपना
स्वार्थ
साधने
में
लीन
हो
गए, यही
दृश्य
एक
बार
फिर
दिखा
जब
भारतीय
जनता
पार्टी, कांग्रेस
पार्टी आदि दलों की
जनोपेक्षी
कार्य
की
भर्त्सना
करते
हुए
अन्ना
हजारे
ने
अपने
सहयोगियों
के
साथ
जनआंदोलन
किया
और
उनके
अनुयाई (किरण
बेदी, अरविंद
केजरीवाल, कुमार
विश्वास) आदि
सत्ता
के
लालच
में
उन्हीं
पार्टियों
से
जा
मिले
जिसके
कि
वे
विरोधी
थे
| वे
खुद
वही
सब
करने
लगे
जिसके
विरोध
में
उतरे
थें, किंतु
दुर्भाग्यवश
आज
भारत
में
नागार्जुन
जैसा
जनकवि
नहीं
है
जो
सच
को
बेखौफ
होकर
बिना
किसी
धूर्तता
के
प्रकट
कर
सके | वे
होते
तो
अवश्य
ही
इन
जनविरोधी
चेहरों
को
बेनकाब
करते-
आज
गहण
है
भूख
का
धुंधला
है
आकाश
कल
अपनी
सरकार
का
होगा
पर्दाफाश
|6
स्वतंत्रतोपरांत
नेताओं, अफसरों
और
पूंजीपतियों
का
भाग्योदय
हुआ, देश
का
धन
विदेशों
में
जिस
रफ्तार
से
विदेशियों
के
शासन
में
नहीं
गया
उससे
कहीं
तेजी
से
अब
जाने
लगाथा, बड़े-बड़े
व्यापारी-कारोबारी
फलने-फूलने
लगे
और
जनता
लाचार
बनी
रही | धनपतियों
के
लिए
विदेश
से
सुविधा
के
साधन
जुटाए
जाने
लगे, लंदन, अमेरिका
से
चिकित्सक
बुलाए
जाने
लगे, जनता
के
पैसे
से
वजीफा
पाकर
अधिकारी, डॉक्टर, इंजीनियर
बनने
वाले
लोग
सरकारी
गुलाम
बनकर
जनता
को
आंख
दिखा
रहे
हैं, यह
सब
देखकर
और
जनता
की
बेबशी
को
महसूस
कर
नागार्जुन
झूंझला
उठते
हैं-
यह
सब
देख
सुन-कर
अत्यधिक
पुलकित
हो
उठता
है
यह
बनमानुस
यह
सत्तर
साला
उजबक
उमंग
में
भर
कर
सिर
के
बाल
नोचने
लग
जाता
है
यह
व्यक्ति |7
यह
झुंझलाहट
भी
वास्तव
में
पराजय
न
होकर
विद्रोह
है
नागार्जुन
इन
परिस्थितियों
से
घबराकर
भागते
नहीं
है
वे
तो
लड़ने
वालों
में
से
हैं, उनके
भीतर
निर्भिकता
की
आग
भरी
हुई
है, वे
जनता
की
दुर्दशा
को
देख
आक्रोश
से
भर
उठते
हैं| जनशक्ति
की
ताकत
वे
भली-भांति
जानते
हैं | वे
कहते
हैं
कि
बात
जब
कलम
से
न
बने
तो
तलवार
उठा
लो, इन
जहरीले
सांपों
पर
दया
करना
उचित
नहीं
है-
कलम
से
काम
लो
गदा
का, तमंचा
का
ढ़ीली
न
पड़े
डोर
प्रत्यंचा
का
जहरीले
सांपों
पर
दया
नहीं
करना
दुष्टों
पर
हमदर्दी
के
उसांस
नहीं
भरना |8
नागार्जुन
ने
केवल
राजनीतिक
अत्याचारों
का
ही
विरोध
नहीं
किया
है
उनके
विद्रोह
के
केंद्र
में
सामाजिक
कुरीतियां
भी
रही
हैं, इन्हीं
कुरीतियों
में
एक
है
ब्राह्मणवादी
विचारधारा, जिसके
कारण
अनेक
जातियों
को
उपेक्षित
जीवन
बिताना
पड़ा
है | जिस
प्रकार
कबीर
ने
गलत
पाने
पर
हिंदू-मुस्लिम
दोनों
को
ही
निष्पक्ष
भाव
से
फटकार
लगाई
है
उसी
तरह
बाबा
भी
जिसे
गलत
पाते
हैं
उसे
फटकारने
में
हिचकते
नहीं
थे | स्वयं
ब्राम्हण
परिवार
से
होने
के
बावजूद
भी
उन्होंने
स्वर्णो
के
द्वारा
किए
गए
अत्याचार
का
खुलकर
विरोध
किया-
तेरह
के
तेरह
अभागे
अकिंचन
मनु
पुत्र
जिंदा
झोंक
दिए
गए
हों
प्रचंड
अग्नि
की
विकराल
लपटों
में
साधन
संपन्न
ऊंची
जातियों
वाले
सौ
सौ
मनु
पुत्रों
द्वारा
ऐसा
तो
कभी
नहीं
हुआ
था |9
इस
तरह
के
अत्याचार
को
देखकर
नागार्जुन
क्रोध
से
फूफकार
उठते
हैं, वे
स्वर्णों
को
चेतावनी
देते
हैं, उन्हें
सावधान
करते
हैं
कि
वे
अत्याचार
बंद
करे
अन्यथा
उनमें
से
ही
उनका
उद्धारक
जन्म
लेगा
और
तब
उसके
समक्ष
अत्याचार
का
हिसाब
देना
पड़ेगा
| ऐसे
समय
नागार्जुन
को
इस
बात
का
तनिक
भी
ख्याल
नहीं
रहता
कि
वे
स्वयं
एक
ब्राम्हण
है
और
न
ही
उन्हें
अपनों
की
नाराजगी
का
डर
है, उनका
सरोकार
सिर्फ
जनता
के
दुख-दर्द
से
है, चाहे
वह
जनता
किसी
भी
धर्म, किसी
भी
संप्रदाय
या
किसी
भी
जाति
से
संबंधित
क्यों
न
हो-
दिल
ने
कहा
दलित
माओं
के
सब
बच्चे
अब
बागी
होंगे
अग्नि
पुत्र
होंगे
वे
अंतिम
विप्लव
में
सहभागी
होंगे |10
नागार्जुन
वास्तविक
रूप
में
जनकवि
हैं, एक
बेबाक,
बेखौफ
और
निर्भीक
जनकवि
जो
जनता
की
आवाज
को
बिना
किसी
भय
के
रख
सकता
है | उसे
न
सरकार
का
भय
है, न
समाज
का
और
न
ही
खोखले
जातिवाद
का, वह
अन्याय
के विरुद्ध
गर्जन
करता
है, शासन
से
सीधा
टकराता
है
और
पूरी
निर्भीकता
से
अपनी
बात
कहने
का
साहस
रखता
है|
संदर्भ:-
1. नागार्जुन
प्रतिनिधि
कविता,
पृ.-101
2. नागार्जुन
प्रतिनिधि
कविता,
पृ.-104,
शासन
की
बंदूक.
3. नागार्जुन
प्रतिनिधि
कविता,
पृ.-
4. नागार्जुन
प्रतिनिधि
कविता,
पृ.-
98, मास्टर.
5. नागार्जुन
प्रतिनिधि
कविता,
पृ.-
108, तीनों बंदर
बापू
के.
6. नागार्जुन
प्रतिनिधि
कविता,
पृ.-
113, अन्न पच्चीसी
के
दोहे.
7. नागार्जुन
प्रतिनिधि
कविता,
पृ.-
114, आए दिन.
8. नागार्जुन
प्रतिनिधि
कविता,
पृ.-
62, लशुन
9. नागार्जुन
प्रतिनिधि
कविता,
पृ.-
137, हरिजन गाथा.
10.
नागार्जुन
प्रतिनिधि
कविता,
पृ.-
142, हरिजन गाथा.
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