मुहब्बत का एहसास

समूचे रूह को मेरे झकझोर जाती है
गुजरती है सामने से तो मुझे निचोड़ जाती है ।

उसकी निगाहों की शराफ़त देखी है तुमने ?
मुड़कर देखती है तो बीच से चीर जाती है।

कोई बात तो है उसके, जुल्फों की घटाओं में
देख ले तो, बादल पिघल कर बरस जाती है।

मैंने अपनी पीठ पर महसूस की है, उसकी गर्म साँसों को
मुड़ कर देखता हूं तो हवाएं क्यों लरज जाती है ?

क्या उसे भी होने लगी है मेरी मुहब्बत का एहसास ?
सामने से गुजरती है तो उसकी रफ्तार ज़रा थम जाती है।

चलो देख लें तुम्हें क्या मिलता है सौगात-ए-उल्फत ‘अमित’ 
यह शै तो उड़ते परिंदों के पर कतर जाती है।

@ अमित कुमार मिश्रा।

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