संघर्ष (कविता).

उठो, आधी रात को
कच्ची नींद में उठो,
तुम्हारे सोने के बाद भी
जागती रहती है पतित राजनीति
चलती है कुचक्र की चालें ।
उठो, इसलिए उठो कि कहीं
तुम्हें शामिल न कर दी जाए
मुर्दों की सूची में।
चलो, इसलिए चलो कि
जहां तुम खड़े हो वहां संसद बनने वाली है
उसी में सौदा होगा लोगों की उम्मीदों का।
हकीकत में यह कसाई खाना है
यहां तुम्हारे स्वप्न रेते जाएंगे
लेकिन सख्त हिदायत है कि
इसे स्वर्ग कहो
लोकतंत्र का स्वर्ग
नेताओं का स्वर्ग
तुम्हारे कातिल का स्वर्ग।
बढ़ो, आगे बढ़ो
इसलिए बढ़ो कि कहीं
पीछे से आती भीड़ के नीचे कुचल न दिए जाओ।
लड़ो, लेकिन व्यवस्था से लड़ो
जिस दिन तुम ने संघर्ष छोड़ा
अपनी लड़ाई सुस्त पड़ने दी
समझ लो, तुम्हारी आत्मा भी
व्यवस्था के आगे समर्पण कर चुकी
और तुम भी हिस्सा बन गए
उस व्यवस्था की जिसने
तुम जैसे न जाने कितने युवाओं को
दबा रखा है
सरकारी पुरस्कारों के नीचे।
मरो, इसलिए मरो कि जो जिंदा हैं
वे जिंदा लाश हैं
तुम्हारे मरने में ही तुम्हारी उपलब्धि है
अगर जिंदा रहे तो तुम्हें भी
बनना पड़ेगा सरकार का कृत्य दास
उन लालची लोगों की तरह
जिन्होंने चंद पैसों की खातिर
अपने अधिकार गिरवी रख दिए हैं
और जीने के लिए सरकारी दलाल बन बैठे हैं।
मरो, लेकिन लड़ते हुए मरो।
लड़ो, क्योंकि सभी ने घुटने टेक दिए हैं
गिजबिजाती राजनीति के आगे
एक तुम ही हो जो जलाए रख सकते हो
आंदोलन की मशाल।
कम से कम तब तक जलाए रखो संघर्ष की आग
जब तक लोकतंत्र के हत्यारे जिंदा हैं
जब तक सरकार खुद को
जनता के पांव की जूती न समझ ले
और तब तक जब तक
व्यवस्था पूंजीवाद की दलाली ना छोड़ दे
और तब तक उठाए रखो हथियार
जब तक देश को जिंदा रखना चाहते हो।

@ अमित कुमार मिश्रा।

टिप्पणियाँ

  1. बहुत खूब । लोकतंत्र को देखने का कवि की यह यथार्थ दृष्टि वाकई पाठक को सोचने के लिए मजबूर करती है , यदि सचमुच पाठक पाठक हो नहीं तो ...

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