दीवार (कविता).

कई बार कोशिश की मैंने
मकान के पिछले हिस्से की दीवार
खड़ी कर दूं, जिसे
पिछली बारिश ने गिराया था।
तब मुझे लगा दीवार का यह गिरना
मेरा नुकसान करा गया है
लेकिन उस दिन जब अचानक
अपने दरवाजे पर गेहूं सूखाती तुम दिखी
तब जाना, इस दीवार का गिरना
मेरे हृदय-कपाट का खुलना था
मैं छुप छुप कर नित्यप्रति
तुम्हारे रूप-लावण्य का पान करता हूं
जब तक तुम नजरों के सामने होती हो
सुबह तुम्हारे छुपते ही
इंतजार शुरू होता है सांझ की
और सांझ में तुम्हारे ओझल होते ही
सुबह की प्रतीक्षा में
रात कटती है।
तब खीझ उठता है मन कि
दोपहर और रात इतनी लंबी क्यों होती है।
घरवाले रोज प्रयास करते हैं
इस दीवार को खड़ी करने की
और मैं किसी तरह टाल देता हूं उन्हें
लेकिन कब तक ?
मुझे पता है जल्द ही फिर से
उठ खड़ी होगी वह दीवार।
इन दिनों मेरी बेसुधी
उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है
मैं पाता हूं
तुम सुबह और शाम पहले से अधिक रूकती हो
दरवाजे पर
तुम्हारी निगाहें गिरी दीवार के पीछे
ढूंढती है मुझे
मैं शायद, पहले से ज्यादा खुलकर
ताकता हूं तुम्हें।
आज दीवार का सिर अकड़ से ऊंचा उठ रहा है
मैं कसमसाकर सोचता हूं
कोई अड़चन पैदा करूं
इस दीवार के खड़ा होने में
तुम्हारी तलब, सीने को सुलगा रही है
छटपटाता हूं, रोक दूं दीवार को खड़ी होने से
बिखेर दूं इन ईंट-पत्थरों को
चीख चीखकर कहूं,
मत दफन करो इस दीवार में
मेरे अरमान
मुझे जिंदा चुनवाने की कोशिश बंद करो
लेकिन क्या करूं ?
उस दीवार का जो उठाया जा चुका है
तेरे मेरे बीच
जाति, धर्म और सामाजिक मर्यादा के रूप में।

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