बेनीमाधो तिवारी की पतोह ( समीक्षात्मक आलेख).

किसी देश-समाज में वर्षों से चली आ रही परंपरा को बदलने के लिए एक बड़े जनआंदोलन की आवश्यकता होती है। परंपरावादी आसानी से हार नहीं मानते वे नवीनता को बार-बार पुरातन के आवरण में ढक देना चाहते हैं। इस संघर्ष में, बदलाव चाहने वालों को न सिर्फ परंपरावादियों से लड़ना पड़ती है बल्कि सरकारी तंत्र से भी जुझना पड़ता है क्योंकि सरकारी तंत्र भी कहीं न कहीं परंपरावादियों से ही निर्मित होती है। भारतीय समाज में भी राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद सरकार और पुलिस महकमे का रवैया परंपरावादी और सामंतवादियों के मेलजोल से बनती बिगड़ती रही है। शुरू में बनने वाली कांग्रेस की सरकार हो या बाद में आई जनता पार्टी और क्षेत्रीय पार्टियां सभी राजनीतिक वर्चस्व के लिए लड़ाई लड़ती रही वे सामाजिक कुनीतियों के विरोध में उतरने से सदैव कतराते थे क्योंकि वहां सीधे-सीधे परंपरा की दिवाल खड़ी थी और इस राह से बच निकलना ही राजनीति का गुण था। पुलिस सदैव इनके बीच खुद को पालने का मार्ग निकलती रही। वह राजनीति और परंपरावादी सामंतों से साठगांठ करके जनता को कभी नक्सलवादी तो कभी उग्रवादी बतला कर उसकी हत्या करती रही। जातिप्रथा, ऊंच-नीच, अमीरी-गरीबी, भारतीय राजनीतिक आजादी के बाद भी अपनी पूरी शक्ति के साथ बनी रही। सरकार और उसके तंत्र इनसे पोषित होकर इनका समर्थन करते रहें। इन सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ को अपने कथा साहित्य में स्थान देने के कारण बिहार के प्रसिद्ध कथा लेखक ‘मधुकर सिंह’ हिंदी साहित्य में विशिष्ट स्थान रखते हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में किए जाने वाले बदलावों को रेखांकित तो किया ही साथ ही उन चेहरों को उजागर भी किया जो इस बदलाव के मार्ग में बाधक हैं। इनमें सामंती विचारधारा और ब्राह्मणवादी विचारधारा के लोग तो प्रमुख थे ही पुलिस महकमे का भी कम हाथ नहीं था। इन समाज विरोधियों को बेनकाब करने का जो काम ‘रघुवीर सहाय’, ‘धूमिल’, ‘नागार्जुन’ जैसे कवियों ने अपनी कविता के माध्यम से किया है वही प्रयास मधुकर सिंह ने अपनी कहानियों और उपन्यासों के माध्यम से किया है। ‘बेनीमाधो तिवारी की पतोह’ मधुकर सिंह का बहुचर्चित उपन्यास है जिसमें उन्होंने ब्राम्हणवादी समाज पर समाजवाद का वर्चस्व कायम होते दिखलाया है। लेकिन वे इस यथार्थ को बखूबी चित्रित कर देते हैं कि समाज में इस बदलाव के लिए कोई सरकार आगे नहीं आती है, कोई पार्टी आगे नहीं आती है। जिन लोगों ने राजनीतिक आजादी के खिलाफ इतना बड़ा आंदोलन किया वह भी समाज सुधार के कार्य में, जाति भेद मिटाने के संघर्ष में, आर्थिक खाई को पाटने में लड़ी जाने वाली लड़ाई से सदैव पीछे हटकर खरे रहे हैं क्योंकि उनका पोषण कहीं न कहीं उसी वर्ग से होता है जो समाजवाद का शत्रु है। यहां यदि आम जनता के पक्ष में कोई खड़ा दिखता है तो वह वामपंथी विचारधारा वाले राजनीतिज्ञ ही हैं, जिनके समर्थकों और आंदोलनकारी जनता को नक्सली बतला कर निरंतर कुचलने का प्रयास सरकार और उसकी तंत्र करती रही है।
अपने लघु कलेवर में भी ‘बेनीमाधो तिवारी की पतोह’ उपन्यास अनेक युगीन समस्याओं को यथार्थ रूप में चित्रित करता है। इस उपन्यास की नायिका सुनंदा एक विधवा स्त्री है जो एक रूढ़िवादी ब्राम्हण परिवार में अपना जीवन गुजारती है। बीए पास होने के कारण उसमें बौद्धिक चेतना का विकास भी काफी हुआ है, इस चेतना को तब और भी बल मिलता है जब वह समसामयिक पत्र-पत्रिकाओं में जन आंदोलनों के बारे में अध्ययन करती है। इन्हीं से प्रेरित होकर वह आँगनबाड़ी-सेविका का कार्य करती है आगे चलकर मुखिया का चुनाव लड़ती है और जितती भी है। इसी दौरान वह अपने जाति से इतर एक युवा सुधारक और रंगकर्मी से विवाह करती है। यह विवाह और उसकी राजनीतिक सक्रियता, परंपरावादियों के ऊपर एक चोट है जिससे वह तिलमिलाता है और उसके विरोध में गुटबंदी करता है। इनगुट बंदियों के कारण विकास के कार्य और जन आंदोलन की गति काफी मंद पड़ जाती है फिर भी जन सुधार का जो आंदोलन चलता है वह निरंतर गतिमान रहता है और उसी का फल है कि समाज से आज अनेक बुराइयों को निष्कासित कर दिया गया है। पूरी तरह से आज भी ये समस्याएं समाज से मिट नहीं सकी है लेकिन उसके बंधन में कुछ ढ़ील अवश्य देखने को मिलता है। विकास के कार्य में और समाज सुधार में सबसे बड़ा बाधक सामंती और परंपरावादी सोच है। राजनीति और पुलिसकर्मी सामंत वादियों के हथियार हैं जिससे वह विकास के लहराते पेड़ को काट कर धराशाई कर देते हैं। मधुकर सिंह इस तथ्य को स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि अंग्रेजों के चले जाने और  सत्ता के भारतीयकरण हो जाने से जनसमाज के जीवन में कोई बदलाव नहीं आया। केवल राजनीतिक परिवर्तन मात्र हुआ था।
“गोरे शासक गए तो काले शासक आ गये। बुनियाद में ये भी वही थे, जो अंग्रेज थे। सब कुछ सत्ता-परिवर्तन का खेल था।१.
समाज की समस्याओं का चित्रण करते हुए मधुकर सिंह उसके मूल तक पहुंचने में चूकते नहीं हैं। न ही वे राजनीति से प्रेरित समस्याओं को उजागर करने में डरते हैं। वे सीधे-सीधे नागार्जुन के तेवर को धारण कर लेते हैं और कह डालते हैं कि “सत्ता बराबर, नक्सलवाद, आतंकवाद और डकैती को एक साबित करना चाहती है। वह तमाम तरह के विरोध को एक जैसा करार देना चाहती है।”२ सरकार की कोशिश रहती है कि हर तरह के विरोध और जन आंदोलन को दबाकर रखा जाए इसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष सभी एकमत होते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि जन आंदोलन उनके शोषण नीति के पथ में बाधक बन सकत है। इसलिए वे जन आंदोलन को सदैव एक समस्या के रूप में लेते हुए कभी नक्सलवाद कभी राजद्रोह तो कभी राष्ट्रद्रोह का नाम देकर दबाने को आतुर रहती है। ऐसे ही समय नागार्जुन सहज याद आ जाते हैं जब वे कहते हैं,
“जली ठूंठ पर बैठ कर गई कोकिला कुक
बाल न बांका कर सकी शासन की बंदूक।”३
इसी पक्ष को उभारते हुए उपन्यास में मधुकर सिंह कहते हैं, “नक्सलवाद के नाम पर दलितों, खेत मजदूरों और किसानों की हत्या आम बात हो गई है।”४
इन हत्याओं में पुलिस की भूमिका निरूपित करते हुए उपन्यास में रेखांकित किया गया है कि, “असल में हमारे यहां पुलिस का मौजूदा ढांचा अंग्रेजों की देन है, जो भारतीय गुलामों को दबाने के लिए इसका इस्तेमाल करते थे। उनकी यह दमनकारी नीति आज भी जारी है।”५.
जन-सुधार के मार्ग में पुलिस बल सदैव एक विरोधी के रूप में खड़ी रही है। पुलिस, राजनेता, सामंत और परंपरावादियों से सांठगांठ कर आमजन को नुकसान पहुंचाती रही है। जैसे ही सरकार और सामंतवादियों के विरुद्ध आम जनता अपनी आवाज उठाती है पुलिस उसकी आवाज को दबाने के लिए बल प्रयोग करती है। उपन्यास में एक प्रसंग आता है जब नायक भुनेसर कहता है,
“सरकार की जन विरोधी नीतियों के कारण जैसे-जैसे जनता में असंतोष बढ़ता जाता है वैसे-वैसे राज्य की रक्षक सेना और पुलिस का कहर आमजन पर बढ़ता जा रहा है।”६
सुनंदा और भुनेसर की शादी को ब्राह्मणवादी सोच के पोषक बेनीमाधो तिवारी के द्वारा मंजूरी मिल जाना उपन्यासकार के आदर्शवादी सोच को स्थापित करता है। लेकिन ऐसे व्यक्तियों के होने से इनकार नहीं किया जा सकता है और यह भी यथार्थ का ही एक सकारात्मक पहलू है। यह अंतरजातीय विवाह, खासतौर पर तब जब स्त्री एक विधवा ब्राह्मणी हो पूरे गांव-समाज में चिंगारी की तरह फैल जाती है। सुनंदा और भुनेसर दोनों अपने सामाजिक कार्यों के लिए जन प्रतिनिधि के रूप में स्वीकृत हैं उनके विरुद्ध सामंतवादी, परंपरावादी और सरकारी तंत्रों का एकजुट होना स्वाभाविक ही है वे सब मिलकर विकास के कार्य में रोड़ा अटकाते हैं। इसी बीच किसी अज्ञात व्यक्ति ने बेनीमाधो तिवारी की हत्या भी कर दी जो तब तक गांव में अपने उदारवादी नीतियों के कारण ग्राम देवता के रूप में स्वीकृत किए जा चुके थे। इस हत्या का इल्जाम पुलिस से सांठगांठ करके सामंतवादी, सुधारकों की तरफ ही मोड़ देते हैं। यह सब राजनीतिक तोड़ जोड़ चलती रहती है इसी बीच राजनीतिक और सामाजिक सुधार भी अपनी मंद गति से भारतीय जनमानस में जगह बनाती जाती है। उपन्यास अपने कथानक के माध्यम से न सिर्फ बिहार अपितु पूरे भारत के राजनीतिक-सामाजिक यथार्थ को चित्रित करता है। उपन्यास के अंत में उपन्यासकार कुछ भटका हुआ प्रतीत होता है। उपन्यास के विरोधी पात्रों को मैना (पक्षी) और कुछ अन्य पक्षियों के द्वारा चोटिल करते हुए मार दिया जाना यथार्थ के मार्ग में बाधक है। यह कुछ पुराने उपन्यासों की याद दिलाती है। रचनाकार यदि इसे एक सकारात्मक घटना के रूप में घटित होते दिखलाता तो यह उपन्यास की बहुत बड़ी शक्ति होती लेकिन पक्षियों के द्वारा बदले की प्रवृत्ति के रूप में चार व्यक्तियों की हत्या किया जाना उपन्यास के अंत को काफी कमजोर बना देता है। इसके बावजूद उपन्यास अपने अंदर समेटे हुए समस्याओं और समाज में करवट ले रहे सुधारवादी आंदोलनों को जिस यथार्थ रूप में चित्रित करता है उसके कारण यह उपन्यास सिर्फ लेखक की ही नहीं बल्कि हिंदी के प्रसिद्ध उपन्यासों में सहज ही स्वीकृत किए जाने योग्य है।

संदर्भ-
१. बेनीमाधो तिवारी की पतोह, पृष्ठ- १०.
२. वहीं, पृ.- ६९.
३. शासन की बंदूक, नागार्जुन
४. बेनीमाधो तिवारी की पतोह, पृष्ठ- ७०.
५. वहीं, पृ – ७०.
६. वहीं, पृ.- ७१.

     - सीमा कुमारी। 

‘मधुकर सिंह की कहानियों में वर्ग-संघर्ष’ आलेख यहां पढ़ें-
https://kaviamitraju.blogspot.com/2019/02/blog-post_8.html

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

स्त्री अस्मिता और हिन्दी महाकाव्य (आलेख)

साहित्य की प्रासंगिकता. ( लेख.)

हिन्दी साहित्य में लघुमानव की अवधारणा, ( आलेख )