तेरी मेरी प्रेम कहानी (कविता).
कल फिर जब सूरज निकले
चिड़ियों का मधुर कलरव हो
कोमल खिलते फूल विहंसते
भौंरों को ललचाते हों
लता के नाजुक नरम पल्लव पर
कोई पराग रख जाता हो
उषाकाल के मधुर मिलन का
साक्षी जब यह सृष्टि हो
क्या हो जब कल सूरज निकले
और प्रिय! हम ही ना हो ?
कोई तो हो अपने पीछे
नन्हा-सा ही क्यों ना हो
जो सूरज को और चंदा को
मलय पवन, निर्मल गंगा को
सांझ के कंपते मंद नयन को
उषा के स्वर्णिम अधर पटल को
धरती के विश्वास अटल को
अंबर के ऐंठे हुए मन को
वायु के आंचल में भर कर
तेरी-मेरी प्रेम कहानी
सांझ सवेरे बतलाता हो।
- अमित कुमार मिश्रा।
चिड़ियों का मधुर कलरव हो
कोमल खिलते फूल विहंसते
भौंरों को ललचाते हों
लता के नाजुक नरम पल्लव पर
कोई पराग रख जाता हो
उषाकाल के मधुर मिलन का
साक्षी जब यह सृष्टि हो
क्या हो जब कल सूरज निकले
और प्रिय! हम ही ना हो ?
कोई तो हो अपने पीछे
नन्हा-सा ही क्यों ना हो
जो सूरज को और चंदा को
मलय पवन, निर्मल गंगा को
सांझ के कंपते मंद नयन को
उषा के स्वर्णिम अधर पटल को
धरती के विश्वास अटल को
अंबर के ऐंठे हुए मन को
वायु के आंचल में भर कर
तेरी-मेरी प्रेम कहानी
सांझ सवेरे बतलाता हो।
- अमित कुमार मिश्रा।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें