प्रेम की परिधि (कविता)

हां मैं मानता हूं-
बेवजह छिनी हैं मैंने
तुम्हारी आजादी,
मैं रोकता हूं तुम्हें
मनचाहे रिश्तें बनाने से,
मेरा प्रेम
तुम्हारे पांव में बेड़ियों की तरह
लिपट गया है।
जिस रिश्ते के सहारे तुम
खुद को मुक्त करना चाहती थी
सामाजिक बंधनों से,
उस रिश्ते ने तुम्हें आजाद करने के बजाए
और भी कसकर जकर दिया है
प्रेम के पाश में।
तुम मचलती हो, कसमसाती हो
और पुनः लौट आती को खुद में
प्रेम में मिले जख्मों के साथ,
मैं भी आहत होता हूं तुम्हें जख्मी देखकर
सोचता हूं
अपने प्रेम को स्वतंत्र कर दूं
तुम्हें दे दूं सारी आजादी
जिसकी आकांक्षा थी तुम्हें, लेकिन
मैं इसका क्या करूं कि
प्रेम सागर जितना विस्तृत होकर भी
अपने प्रेमी पर अधिकार को लेकर
कितना संकीर्ण होता है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

स्त्री अस्मिता और हिन्दी महाकाव्य (आलेख)

साहित्य की प्रासंगिकता. ( लेख.)

हिन्दी साहित्य में लघुमानव की अवधारणा, ( आलेख )