वाह रे इंसान. ( सामाजिक लेख )
वाह रे इंसान! तुझसा बावरा पूरे संसार भर में तलाश पाना असंभव है। इंसान सारे प्राणियों में, श्रेष्ठ, शिक्षित, सभ्य, बुद्धिमान...., घंटा है। यह कैसी बुद्धिमता है कि जानबूझकर गड्ढे में कूद रहे हैं, आंख होते हुए अंधों सा चल रहे हैं, ज्ञान होते हुए मूढ़ सा बर्ताव है।
वैसे तो मैं अव्वल दर्जे का आलसी हूं लेकिन पता नहीं कैसे प्रातः भ्रमण को मैंने नियमित बनाए रखा है। आज सुबह-सुबह चिड़ियाघर के बाहर साइकिल खड़ी कर दरवाजे की ओर बढ़ा। रोज की तरह चारों ओर गाड़ियां-ही-गाड़ियां खड़ी थी। इन वाहनों से लोग स्वास्थ्य लाभ करने पधारे थे। हे बुद्धिमान प्राणी! जिस स्थान पर शुद्ध वायु तलाशने आए हो, उस में आते ही पेट्रोल की धुंआ मिला दी। अब सोचिए दो-चार, दस गाड़ियां हो तो अलग बात है, यहां तो गाड़ियों की बाढ़ उमर पड़ी है। यहां शुद्ध वायु ?
(दैनिक भास्कर, दिनांक 19/12/ 2018, पृष्ठ-2).
खैर, मैं अंदर गया। भीड़ तो उस समय नित्य हुआ करती थी, आज भी है। लोग टहल रहे हैं, दौड़ रहे हैं, व्यायाम कर रहे हैं। एक बड़ी संख्या मोबाइल पर बात करने या कान में आला (टेलीस्कोप) लगाए संगीतानंद में डूबी है। मैं भी हल्की-फुल्की उछल कूद में शामिल हो गया। आज की जिन घटनाओं ने मुझे अधिक प्रभावित किया उस में प्राथमिकता मैं एक जिंदादिली को ही दूंगा।
चिड़ियाघर में हर उम्र-तबके के लोग भ्रमण को आते हैं। बच्चें, युवा, वृद्ध,....। इनमें से हर वृद्ध, वृद्ध नहीं होता। उनकी अवस्था से आप उनके हृदय की अवस्था का अनुमान नहीं लगा सकते हैं। अपनी उछल-कूद से थककर एक बेंच पर बैठा था। वहां पांच लोगों की एक मंडली आकर रुकी; तीन पुरुष, दो महिला। उनमें से दो पुरुष और महिला आपस में पति-पत्नी थे। एक बेचारे पत्नीविहीन। सभी साठ-पैंसठ को छू रहे थे। चेहरे की आभा और पहनावे से कोई रिटायर अधिकारी प्रतीत हो रहे थे। उनमें से एक मजाक-मजाक में ही बेंच के पुश्त पर चढ़कर फूल तोड़ने लगा। एक गुलदस्ते के शक्ल में उन्हें सजा कर उसने अपनी पत्नी को दी। पत्नी की निर्मल हंसी देखते बन रही थी। उनके एक मित्र ने उनसे कहा ‘यहां फूल-पत्तियां तोड़ना मना है, जुर्माना हो सकता है।’ इस पर उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, ‘मुझे तो इंतजार है कि कब जुर्माना हो और मैं वह रसीद दिखला कर सबको बतला सकूं कि मुझमें अब भी जवानी की शरारतें जिंदा हैं। वे ठहाका लगाते हुए अपनी राह चलते रहें और मैं तथा मेरे जैसे कुछ लोग, जिन्होंने इस वृतांत का आनंद लिया था, एक जिंदादिली का साक्षी बन कर आनंद की लहरों में हिलकोरा लेते रहें।
दूसरी घटना एक युवा के स्वास्थ्य और स्वच्छता प्रेम से संबंधित है। वह एक चौबीस-छब्बीस वर्षीय तंदुरुस्त जवान था। उसने कई तरह के कसरत किए जिनमें से कुछ स्थलों पर मैं भी मौजूद था। उसके परिश्रम को देख अभिभूत हुआ। किसी भी व्यक्ति का सबसे बड़ी संपदा उसका स्वस्थ शरीर ही है। उसके संरक्षण में जो भी किया जाए कम है। मेरा ध्यान उस युवक पर टिकने का कारण यह है कि उसने व्यायाम के उपरांत दो-तीन जगहों पर रुककर आसपास फैले कचरे को उठाकर कचरा डब्बा में डाला। मैं समझ गया इसे अपने स्वास्थ्य के साथ-साथ स्वच्छता से भी बड़ा प्रेम है। लेकिन रूकिए, अभी उसके स्वास्थ्य-प्रेम और स्वच्छता-प्रेम का दूसरा पहलू बाकी है। बाहर निकलने के क्रम में दरवाजे तक पहुंचते-पहुंचते उसने जेब से ‘पानपराग’ और ‘तुलसी पान मसाला’ की पुड़िया निकाला, दोनों को एक साथ फाड़ा और मुंह में उड़ेल दी। मैं पुरिया पर छपे उस चेतावनी को पढ़ता रहा जो कैंसर से फेफड़ा गला देने वाले चित्र के साथ छपा था। समझ गया, हर साक्षर आदमी पढ़ना जानता यह जरूरी नहीं, हर आंख वाला देख सके यह कतई आवश्यक नहीं, मैं इन ख्यालों में ही था कि उसने अगला आघात किया। कुछ ही कदम चला था कि उसने ओस से भींगे, चमचमाते सड़क पर, अपनी कला का प्रदर्शन करते हुए, थूक से एक लंबी-चौड़ी रंगोली बना दी। मैं उसके स्वास्थ्य-प्रेम और स्वच्छता-प्रेम को सर-नवा कर चलता बना।
घर लौट कर आया तो अखबार लेकर बैठ गया। अखबार में आए दिन सरकार तथा उसके अधिकारियों की घोटालों और देश में बढ़ते बलात्कार की घटनाओं के अलावे और कुछ होता ही कहां था। आज के अखबार में एक नई खबर दिखी- ‘पटना की हवा दिल्ली से ज्यादा जहरीली’। हंसी आई कि लोग गाड़ियों पर सवार होकर तेजी से मौत की ओर बढ़ रहे हैं।
मैंने अपना संकल्प दुहराया, ‘जब तक अतिआवश्यक न हो गाड़ी का प्रयोग नहीं करूंगा’ और अपने मित्र कवि शिवनंदन की एक पंक्ति गुनगुनाने लगा-
‘अच्छी नहीं लगती हवाएं अब शहरों की
दम घुटने लगा है मेरा, मेरी ही कारस्तानी से।’*
( * आज के प्रखर कवि शिवनंदन प्रसाद की इस, समाज को उसकी गलतियों से आगाह करती, पूरी कविता को उनके ब्लॉग kavishivnandan.blogspot.com पर पढ़ी जा सकती है)
© अमित कुमार मिश्रा।

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