मुड़ कर देखना मुझे. ( कविता )

कई बरस बीते,घरबार छूटे ।
रोटी की तलाश में,
शहर क्या निकले
गांव-जवार पीछे ही छूट गएं।
वे बुढ़ी आंखें, जो
अपने बेटे-बहु, पोते-पोतियो को,
देखने के लिए ही,
ज्योति बचाए रखी हैं
निरंतर बुलाती हैं, हमें।
उन बुढ़ी आंखों को,
अपने मनचाहों को
देखने की ललक, इतनी तीव्र है,
वह वर्ष में, दो-तीन दिन,
देखने से कहां मिटती है।
उन्होंने, इन दिनों मुझे
एक नया नाम दिया है- निर्मोही।
उनका दिया सब स्वीकारा,
यह भी स्वीकार है।
लेकिन मैं बतला दूं,
मोह मुझे भी व्याप्ति है,
किंतु, परिवार की रोटी,
बच्चों की शिक्षा,
निरंतर बांधे रहती है।
सच पूछो तो,
अपने उद्गम से प्रवाहित,
नदी को भी,
वापस लौटने की,
मुड़ कर देखने की,
इच्छा तो सताती होगी।
लेकिन क्या वे,
लौट पाती हैं कभी ?

     © अमित कुमार मिश्रा.

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