कैसे विदा दूं ? (कविता).

कैसे विदा दूं ?

पूरी सृष्टि गतिमान है
तब तुम कैसे ठहर सकते हो।
जाने की ठान ली,
चलो बात तुम्हारी मान ली।
तुम्हें भूलना मुश्किल होगा
तुमने, हंसी दी, आंसू दिए
थोड़ा हंसाकर रूला दिया।
सचमुच तुम्हारी आदतें,
अच्छी नहीं हैं।
ये क्या बात हुई,
मैं तुम्हारे साथ खुद को
एडजस्ट कर ही रहा था
और तुम चल दिए।
जाते जाते एक बात तो
बतलाते जाते,
मैं प्रतीक्षा करूं, तुम्हारे आने की
लौट सकोगे तुम ?
वैसे तुम्हारे होने से,
कुछ हासिल नहीं था मुझे।
पूरे साल मैं तुम्हारे जाने के
दिन गिनता रहा।
अब सोचता हूं-
तुमने दर्द दिए, बेचैनी दी,
हज़ार तकलीफ़ों से गुजारा।
लेकिन, पीड़ा में आनंद पहचानने का
हुनर भी तो तुम्हीं ने सिखलाया।
बाहर देख आया हूं, अभी-अभी।
लोग उल्लासित है,
तुम्हारे बाद जो आएगा, उसे सोचकर।
मैं कैसे समझूं, उसका मिजाज
जो अभी आया ही नहीं।
क्या पता तुमसे अच्छा हो,
या तुम्हारे जैसा,
या शायद, और ज्यादा क्रूर।
मुझे तो महिनों लग जाएंगे
तुम्हें भूलने और उसे स्वीकार करने में।
न जाने कब तब
अपने दस्तखत के नीचे,
तुम्हें दुहराता रहूंगा, और
उसे काटकर,
यकीन दिलाता रहूंगा खुद को, कि
तुम जा चुके हो, कब के।

- अमित कुमार मिश्रा.
   ३१.१२.२०१८.

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