बिलार (लघुकथा).

बिलार.

रात में अचानक कान में तेज दर्द शुरू होने से पूरी रात नींद बाधित रही। सुबह-सुबह जब किचन में गया कि थोड़ी चाय बनाकर पी लूं तो वहां का नजारा देखकर सर में भी दर्द शुरू हो गया। पूरे किचन में दूध बिखरा पड़ा था। मैं समझ गया कि वह बिलार जो अक्सर आंगन में घूमते रहता है, कल रात किसी समय मौका देख कर घर में घुसने में सफल रहा। यह उसी की कारस्तानी है। काफी ढूंढने पर दर्द की दवा मिली, वह खाकर, मैं थोड़ी देर और सोने चला गया। धूप खिलने के बाद हाथ-मुंह धोकर किचन साफ करने में जुटा। तब तक दर्द से काफी राहत मिल चुकी थी। किचन साफ करने में घंटा भर से कम समय नहीं लगा, चारों तरफ दूध बिखरा पड़ा था। दिमाग इस तरह से भन्नाया हुआ था कि अगर वह बिलार मिल जाए तो उसकी जान ले लूं। काम निपटा कर जब अख़बार लेकर बाहर निकला कि थोड़ी देर धूप में बैठूंगा, तो देखा आंगन के एक कोने में जहां धूप पर रही थी, बिलार बड़े आराम से लेटा हुआ है। मैंने पास में शस्त्र तलाशने की कोशिश की। और कुछ न पाकर अपना जूता ही उठा कर दे मारा। बिलार तब तक सचेत हो चुका था। जूते का थोड़ा सा हिस्सा उसके शरीर पर पड़ा जरूर लेकिन वह वहां से उठ कर भाग निकला। दोपहर तक उस बिलार की टोह में रहा कि वह नजर आए और मैं अपनी खुन्नस निकालूं। तीसरे पहर के करीब चार-पांच शिकारी लड़के ( मेरी क्षेत्रीय भाषा में उसे कड़ोरबा कहा जाता है) हाथ में लाठी-भाला लिए घूमते दिखा। वे अक्सर इस गली में घूम जाते और नेवला, गिलहरी जो कुछ भी मिल जाए, उसे मार कर ले जाते। संभवतः वे कुत्ते को छोड़कर सब कुछ खाते हैं। मेरे आंगन में एक पेड़ था और आसपास के मकान में भी एक-दो पेड़ लगे थे। उन पर गिलहरियां भागदौड़ करती रहती, उन्हीं की ताक में वे शिकारी इधर आते रहते थे। मैंने कई बार उसे, गिलहरी मारने के लिए फटकारा भी, तब भी वे आ धमकते। आज उन्होंने मेरे मकान के बाहर उस बिलार को घेरकर मारने की कोशिश की। बिलार उनके हाथ से निकल कर मेरे आंगन में घुसा और मेरी स्कूटी की ओट में दुबक कर बैठ गया। मैं छत पर से यह देख रहा था। वे शिकारी मेरे दरवाजे पर आकर, दरवाजा खोलने की मिन्नत करने लगें। मेरे दिमाग में आया कि बिलार से खुन्नस निकालने का यह अच्छा मौका है। यह अकेला ही है जिससे मुझे कई बार परेशानी उठानी पड़ी, मैं अपनी लापरवाही से दरवाजा बंद करना भूल जाता और वह मौका देखते ही या तो दूध पी जाता या किचन में बिखेर कर चला जाता। मेरे मस्तिष्क में, किचन में चारों तरफ दूध बिखरा हुआ था। मैंने सोचा, मैं उन्हें दरवाजा खोल कर आने दूं। उसके बाद तो इसका बचना बिल्कुल नामुमकिन है, चारों तरफ से घेरकर ये बिल्लियों-बिलारों को बड़े आराम से मार दिया करते हैं। मैं एक नजर उन शिकारियों की ओर देखता और एक नजर सहम कर बैठे, चारों तरफ भय से नजर दौड़ाते उस बिलार की ओर। और इस निर्णय पर पहुंचने की कोशिश करने लगा की दरवाजा खोलूं या नहीं।  इसी उधेड़बुन में था कि मुझे याद आया, लगभग डेढ़ महीने पहले, मेरी बहन अपने दोनों बच्चों के साथ, दो-तीन दिनों के लिए मेरे पास आई थी। उस समय उसका छोटा लड़का काफी देर तक रोता रहा था, हमने उसे कई खिलौने दिएं, कई खाने-पीने की चीजें दी, लेकिन वह चुप होने का नाम नहीं ले रहा था। घंटों रोता रहा, इधर-से-उधर भागता रहा। उसी दौरान, उसकी नजर इस बिलार पर पड़ी और वह इसे पकड़ने के लिए इसके पीछे भागने लगा। इसी भागदौड़ में वह रोना भूल गया। उसने अपने हाथ की केक उसके तरफ उछाल दी। बिलार थोड़ी देर तक सहमता रहा फिर आगे बढ़कर खाने लगा। अगले दो-तीन दिनों तक मेरा भांजा आंगन में अपने खाने की चीजें थोड़ा खा कर बिखेर देता और बिलार उसके इर्द-गिर्द, उसके साथ भाग-दौड़ करते हुए बिखरी चीजें खाता। जब वह गया तो उसकी एक गाड़ी और यह बिलार रह गया। उसकी गाड़ी, जो कि उठा-पटक में टूट भी गई थी, मैंने सहेज कर अपनी किताबों वाली अलमारी के ऊपर रख दी। यह बिलार भी तो, दो-तीन दिन ही सही, उसका खिलौना रहा था। फिर मेरा दरवाजा खोलना ठीक होगा ?

© अमित कुमार मिश्रा.

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