मैं आग बांटता हूं. (कविता)
कई बार कोशिश की है
दिल के अंगारों को
वहीं सीमित कर जलता रहने दूं।
क्यों बार-बार उसे
कागज पर उतारने की
जहमत उठाई जाए ?
कागज पढ़ी जाती है
अपनी जलन में औरों को भी
जलाती है।
कोई जलता है, कोई सुलगता है,
कोई निरपेक्ष है।
लेकिन मेरा बार-बार प्रश्न करना
अखरता सभी को है।
सभी चाहते हैं,
लोगों से प्रश्न पूछने की आजादी
छिन जानी चाहिए।
क्योंकि इस आजादी का
मेरे जैसा कुछ आवारागर्द इंसान
प्रयोग करता हैं।
और उनके प्रयोग से
कुछ ऐसे चेहरे सामने आ जाते हैं
जो क्रूर से भी क्रूरत्तम हैं।
उन चेहरों पर लोगों की श्रद्धा है
लोग पूजते हैं उन्हें
फिर क्या हक है कि मैं
उनके विरुद्ध कुछ कहूं ?
कुछ सोचूं, आवाज उठाऊं ?
क्या मेरी इस गुनाह पर लोग चुप बैठेंगे ?
मुझे अपने दिल की आग
कागज पर सजाने देंगे ?
वे तो चाहेंगे
मैं भीतर ही भीतर जलूं।
उस आग से कभी
सफेद कागज को काली करने की
गुस्ताखी ना करूं।
वर्ना उनके पास हथियार है
और वे मेरे सफेद कपड़ो को
मेरे भीतर के लाल स्याही से
रंगने में परहेज नहीं करेंगे।
लेकिन मैं नहीं डरता
इन हथियार वालों से।
मुझे याद है
जब गांधी पर गोली चलाई गई
और उनके भीतर की लाली,
उबल कर उनके सफेद धोती पर फैल गई
तो ऐसा लगा जैसे
उनका सर्वांग लालमयी हो गया हो।
वह लाल जिसकी लाली ने संसार को रचा है।
मैं भी उस लाल में रंग कर
ईश्वरीय लाली को प्राप्त करने को
सदैव तत्पर हूं।
जब तुम्हारी इच्छा हो
बंदूक तान कर आवाज देना मुझे
मैं अपने हृदय की आग
कागज पर सजाता
तुम्हें तुम्हारे सामने खड़ा दिखूंगा।
@ अमित कुमार मिश्रा।
दिल के अंगारों को
वहीं सीमित कर जलता रहने दूं।
क्यों बार-बार उसे
कागज पर उतारने की
जहमत उठाई जाए ?
कागज पढ़ी जाती है
अपनी जलन में औरों को भी
जलाती है।
कोई जलता है, कोई सुलगता है,
कोई निरपेक्ष है।
लेकिन मेरा बार-बार प्रश्न करना
अखरता सभी को है।
सभी चाहते हैं,
लोगों से प्रश्न पूछने की आजादी
छिन जानी चाहिए।
क्योंकि इस आजादी का
मेरे जैसा कुछ आवारागर्द इंसान
प्रयोग करता हैं।
और उनके प्रयोग से
कुछ ऐसे चेहरे सामने आ जाते हैं
जो क्रूर से भी क्रूरत्तम हैं।
उन चेहरों पर लोगों की श्रद्धा है
लोग पूजते हैं उन्हें
फिर क्या हक है कि मैं
उनके विरुद्ध कुछ कहूं ?
कुछ सोचूं, आवाज उठाऊं ?
क्या मेरी इस गुनाह पर लोग चुप बैठेंगे ?
मुझे अपने दिल की आग
कागज पर सजाने देंगे ?
वे तो चाहेंगे
मैं भीतर ही भीतर जलूं।
उस आग से कभी
सफेद कागज को काली करने की
गुस्ताखी ना करूं।
वर्ना उनके पास हथियार है
और वे मेरे सफेद कपड़ो को
मेरे भीतर के लाल स्याही से
रंगने में परहेज नहीं करेंगे।
लेकिन मैं नहीं डरता
इन हथियार वालों से।
मुझे याद है
जब गांधी पर गोली चलाई गई
और उनके भीतर की लाली,
उबल कर उनके सफेद धोती पर फैल गई
तो ऐसा लगा जैसे
उनका सर्वांग लालमयी हो गया हो।
वह लाल जिसकी लाली ने संसार को रचा है।
मैं भी उस लाल में रंग कर
ईश्वरीय लाली को प्राप्त करने को
सदैव तत्पर हूं।
जब तुम्हारी इच्छा हो
बंदूक तान कर आवाज देना मुझे
मैं अपने हृदय की आग
कागज पर सजाता
तुम्हें तुम्हारे सामने खड़ा दिखूंगा।
@ अमित कुमार मिश्रा।
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