हर बार मगर लौटकर वह आता जरूर है (गज़ल)

मेरी हर बात से इत्तेफाक वह रखता जरूर है
मेरे हर फैसले को नामंजूर मगर करता जरूर है |

हर दफे रूठ कर जाता है कि अब न लौटेगा
हर बार मगर लौटकर वह आता जरूर है |

खफ़ा-खफ़ा सा रहता है मुझसे हरदम मगर
सोने से पहले मेरी याद में वह रोता जरूर है |

उसे मेरा पता मालूम नहीं जब से मैंने घर बदला है
हर शाम मेरे पुराने मकान तक वह जाता जरूर है |

बहरहाल उसे दिल से निकालने में कायम तो रहा
मगर अश्क़ बनकर मेरी आंखों में वह आता जरूर है |

नज़रे चुराकर निकल जाते हैं एक-दूसरे से 'अमित'
हर रोज किसी-न-किसी मोड़ पर वह टकराता जरूर है |

- अमित कुमार मिश्रा

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