हर बार मगर लौटकर वह आता जरूर है (गज़ल)
मेरी हर बात से इत्तेफाक वह रखता जरूर है
मेरे हर फैसले को नामंजूर मगर करता जरूर है |
हर दफे रूठ कर जाता है कि अब न लौटेगा
हर बार मगर लौटकर वह आता जरूर है |
खफ़ा-खफ़ा सा रहता है मुझसे हरदम मगर
सोने से पहले मेरी याद में वह रोता जरूर है |
उसे मेरा पता मालूम नहीं जब से मैंने घर बदला है
हर शाम मेरे पुराने मकान तक वह जाता जरूर है |
बहरहाल उसे दिल से निकालने में कायम तो रहा
मगर अश्क़ बनकर मेरी आंखों में वह आता जरूर है |
नज़रे चुराकर निकल जाते हैं एक-दूसरे से 'अमित'
हर रोज किसी-न-किसी मोड़ पर वह टकराता जरूर है |
- अमित कुमार मिश्रा
बहुत खूब
जवाब देंहटाएंबहुत आभार।
जवाब देंहटाएंबहुत अच्छी लगी आपकी ये रचना.. शानदार.,दिल को छू लेने वाली l
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत आभार इस स्नेह के लिए।
हटाएंलाजवाब गज़ल।
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत धन्यवाद आपको।
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