साझी अनुभूतियों की साझी विरासत (समीक्षा)

 साझी अनुभूतियों की साझी विरासत 

न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन के द्वारा सृजन ऑस्ट्रेलिया पत्रिका तो निकाली ही जाती है साथ ही साथ साहित्य सेवा में समर्पित इस संस्था ने कई साझा संकलनों का प्रकाशन कर अनेक साहित्यकारों को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने का कार्य किया है। संस्था के द्वारा 'सृजन दीप' नाम से एक साझा काव्य संकलन प्रकाशित किया गया है। इस संकलन में डेढ़ दर्जन कवियों की कविताएं संकलित हैं। ये कवि भारत के अलग-अलग प्रदेशों के हैं। इनकी संवेदनाएं अलग हैं, क्षेत्र अलग है लेकिन अभिव्यक्ति के द्वारा इन्होंने अपनी-अपनी संवेदनाओं को जन-सामान्य की संवेदना के अनुकूल बना दिया है और उनकी इन संवेदनाओं को उचित मंच देने का कार्य सृजन-दीप साझा काव्य संकलन ने किया है। इस संकलन में जिन रचनाकारों की कविताएं संकलित हैं उनके नाम हैं- राहुल आदर्श, डॉ उषा पाण्डेय, राकेश पुरी, कमल राठौर साहिल, रूपक कुमार, हरिशंकर जोशी मुनिराज, डॉ स्मृति आनंद, मनोरमा शर्मा, डॉ सम्राट सुधा, हेमराज ठाकुर, रंजना सोलंकी भगत, वंदना जैन, दीपक कुमार गुप्ता, डॉ अमरकांत कुमर, डॉ रतन कुमारी वर्मा, डॉ रमेश कुमार निर्मेष, नंद लाल मणि त्रिपाठी और डॉ दुर्गा झा। यह संकलन मुझे आदरणीय डॉ अमरकांत कुमर ने भेंट किया है। इससे पहले भी उनकी कविताओं पर मैं समीक्षात्मक लेख लिख चुका हूँ। इस बार कोशिश यह है कि उनकी कविताओं के साथ इस संकलन में संकलित और भी रचनाकारों की कुछ कविताओं को समेटता चलूँ। इस क्रम में सबसे पहले धन्यवाद के पात्र डॉ शैलेश शुक्ला जी हैं जो इस साझा संकलन के संपादक हैं और जिनके अथक परिश्रम से साहित्य रूपी वृक्ष का यह फल हम सबों के समक्ष फलित हुआ है। इसके साथ ही न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन का पूरा परिवार धन्यवाद का पात्र है।

इस क्रम में राहुल आदर्श जी की कविताओं पर दृष्टिपात करने से यह दिख पड़ता है कि जीवन की विभिन्न संवेदनाओं को उन्होंने अपने काव्य में समेटने का कार्य किया है। संकलन में संकलित उनकी सभी कविताएं एक से बढ़कर एक हैं। पहली ही कविता 'उदास चूल्हे' में यह दिख पड़ता है कि यह कविता नागार्जुन की प्रसिद्ध कविता 'अकाल और उसके बाद' की कड़ी को पुनर्जीवित करती है। इस कविता में रचनाकार ने लिखा है, "एक चपटी तसली में /पक रहे हैं चंद चावल के दाने/ गमों के अश्रु लिए /जल रहे उदास चूल्हे।" राहुल आदर्श की कविताओं में उदासी भी है खामोशी भी, ढलते हुए शाम को निहारती अपलक पलके भी, लेकिन वही एक आशा की सुबह भी है जो एक नई शुरुआत की आस में पूरे साहस के साथ दृढ़ होकर खड़ी है। "एक नई सुबह के लिए/ आशाओं को पलना होगा /शाम को ढलना होगा।" 

जिंदगी के रंग-बिरंगे उत्सव को प्रस्तुत करती है डॉ उषा पाण्डेय जी की कविता। "अपने सदाचार से गैरों को अपनाना है /जीवन उत्सव है, हर पल इसे मनाना है।" उनकी निगाहें गुणों को देखने में अधिक रमती हैं। ये दोष को परे रखकर जीवन का मूल्यांकन करना चाहती हैं, "मैंने कहा, तुम गुणों से भरे हो /इसलिए कांटो की बात /मेरे मन में नहीं आई।" 

राकेश पुरी जी अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में मानव के बीच उठ खड़ी हुई दीवार को तोड़ देना चाहते हैं। यहां चोट सिर्फ उस दीवार पर नहीं है जो मानव और मानव के बीच खड़ी है बल्कि उस दीवार को भी ध्वस्त कर देने की तीव्र लालसा है जो मनुष्य और खुद उसके भीतर उसके अंतरात्मा के बीच उठ खड़ी हुई है, "खिड़कियाँ खोल दो /दरवाजे खोल दो /गर तब भी न निकल सके/ तो दीवारें तोड़ दो।" 

कमल राठौर 'साहिल' एक अच्छे ग़ज़लकार की तरह अपने गज़लों के साथ पेश होते हैं और आशा-निराशा, दुख-दर्द, हर्ष-निनाद के बीच घोषणा करते हैं बीते समय को भूलकर एक नई शुरुआत करने की। उनकी कोशिश है उन जख्मों को भुला देने की जो वक्त ने दिये हैं। "कभी फुर्सत में सोचना खता कहाँ हुई /यह भी इक दौर है, गुजर जाने दो।"

रूपक कुमार जब अपनी कविताओं की खिड़की खोलते हैं तब उन्हें उस खिड़की से पूरी दुनिया दिखती है। वे देखते हैं नींद में उबासी लेते हुए बच्चे को, अखबार फेंकते अखबार वाले को, फूलों से गदराये अमलतास और गुलमोहर के पेड़ को। तब ऐसा लगता है मानो पूरी दुनिया प्रकृति की इन्हीं मनोरम छटाओं में समाई हुई हो। "खिड़की से /दिखाई देता है/ फूलों से गदराये/ छतनार अमलतास /और गुलमोहर के पेड़/ चहचहाते  रंग-बिरंगे पंछी /मानो किसी युद्ध के /प्रयाण की तैयारी में हों।" 

मानव जीवन के कोलाहल के बीच हरीशंकर जोशी 'मुनिराज' जी की कविताएं एक नए सवेरे की आस जगाती है जहाँ वे ढलते हुए सूरज में एक नए सवेरे की आस देखते हैं। मेहनत की रोटी में भविष्य को पलते देखते हैं, अभी-अभी जो बीत गया है उसके आगे आने वाले एक नए पल को देखते हैं। यह उम्मीद मानव जीवन के लिए संजीवनी का कार्य करता है। "मेहनत की रोटी से /कल को पलते देखा है /अभी-अभी जो पल बीता है /उसमें कल को पलते देखा है /मैंने कल को देखा है।"

डॉ स्मृति आनंद, कविता को सिपाही की बंदूक से कम नहीं मानती हैं। उनका मानना है कि रचनाकार अपने शब्दों से वही कर सकता है जो सिपाही अपनी बंदूक से करता है। कविता भ्रष्ट राजनीति, भ्रष्ट शासनतंत्र के सामने जब सीना तान कर खड़ी होती है तब वह कलम से वैसे ही डरता है जैसे सामने कोई सिपाही बंदूक ताने खड़ा हो। डॉ आनंद वकालत करती है मजदूरों के हित की, हे! कलम के सिपाहियों /तुम्हारे सामने/ तुम्हारा भविष्य खड़ा है /भूखा और नंगा /माँग रहा है तुमसे /अपने लिए /कुछ शब्दों के लिबास /कुछ टुकड़े /अपने पेट के लिए /तुम्हें चुप रहने की /मिलेगी सजा /कि/ तुम्हारे पास शब्द हैं।" 

मनोरमा शर्मा जी जीवन में छाये कुहासे को खुद अपने बलबूते  हटाने की प्रेरणा के रूप में कविता रचती हैं, कुहासे के हटने के लिए सुबह के किरणों की प्रतीक्षा करने में समय व्यतीत करना सार्थक नहीं मानती हैं। उनका मानना है कि, "सामने कुहरा घना है /हटा सको तो अभी हटाओ /प्रभात की बात छोड़ो।" 

डॉ सम्राट सुधा, प्रेम को जीवन का चरमोत्कर्ष मानते हैं। जीवन की सारी बेचैनी/तृषा प्रेमी की पवित्र गोद में सर रखते ही तृप्त हो जाते हैं। "तृप्ति /एक गोद तेरी /शेष तृष्णाएँ हैं सब/ सताएँ सब देखीं/ तुझ-सी विराट न मिली।"

हेमराज ठाकुर, साहित्यकारों,पत्रकारों, लेखकों को उसके कर्तव्य-पथ का भान कराते हुए लिखते हैं, "जब कुंद होकर कलम है लिखती /अंधा होकर लिखता है कलमकार /साहित्य विधाएँ तब मरन-धर्मा होती हैं/ और साहित्य जगत होता है शर्मसार।" 

रंजना सोलंकी भगत जी की कविताएं जीवन जगत में होने वाले साक्षात्कार से कुछ दूर ले जाकर अपने हृदय से साक्षात्कार करवाने को प्रस्तुत होती है। दुनिया के कोलाहल के बीच आदमी यदि कुछ नहीं सुन पाता है तो अपने मन की बात। दिन-रात की भाग-दौड़ में वह सब से मिलता है अगर वंचित रहता है तो खुद से मिलने से, अपनी जिंदगी को समय देने से। ऐसे में रंजना जी की कविता अपनी सार्थकता सिद्ध करते हुए पुकार लगाती है, "आज /जिंदगी से फिर मुलाकात हुई /और जी उठे हम।"

वैसे तो वंदना जैन जी की कविताएं हर रूप में पाठकों को गहरी संवेदना में लपेट देती हैं लेकिन उनकी कविताओं का प्रगतिवादी रूप और भी मनोहर लगता है। वहाँ वे सृष्टि के हर खूबसूरत निर्माण का श्रेय उसके निर्माणकर्ता अर्थात मजदूर को देती हैं, "जब तराशा /किसी मजदूर ने/ बड़े नायाब तरीके से तो /अजूबे ताजमहल और कुतुबमीनार बन गए।" 

दीपक कुमार गुप्ता जी की कविताएँ निराश मन को उत्साह से भरने का कार्य करती है। दिनकर की कविताएँ जिस तरह से पाठकों में उत्साह भर्ती है जिसे हृदय में उतार कर व्यक्ति बड़े से बड़े संघर्ष को सहजता पूर्वक झेल जाता है उसी तरह से उत्प्रेरित करने का काम दीपक कुमार की कविताएं करती हैं। "हैं राहों में तेरी चाहे /कितनी भी मुश्किलें तो क्या /बिना ठोकरों के जीवन को /जीने में मजा नहीं।" 


अब चर्चा करता हूँ डॉ अमरकांत कुमर की कविताओं की। उनकी कविताओं पर मैं स्वतंत्र रूप से पहले भी लिख चुका हूँ। यहां मैंने कोशिश की है कि संकलन के सभी कवियों की संक्षिप्त चर्चा करता चलूँ इसलिए किसी कवि को व्यापक रूप से उद्भासित कर पाना इस समीक्षा में संभव नहीं हो सका है। डॉ कुमर की कविताओं पर चर्चा करते हुए मैंने पहले भी कहा था कि जीवन की अनेक संवेदनाओं को समेटने वाले उनकी कविताएँ एक तरफ और प्राकृतिक सौंदर्य को उद्घाटित करती उनकी कविताएँ और गीत एक तरफ रखे जा सकते हैं। दोनों का पलड़ा बराबर ही बैठता है। जब वे ऋतुराज वसंत का वर्णन करते हैं तब प्रकृति की सुकुमारता को चित्रित करने वाले कवियों की याद सहज ही ताजी हो उठती है। कितना मनोहर बिम्ब उपस्थित होता है जब 'चंदन- चंदन' शीर्षक अपनी कविता में वे लिखते हैं, सपनों ने ली है अंगड़ाई /मनोरथों की रुत आई /नव बसंत ने तरुणाई में/ तरल मिठास खिला लाई/ पुरवाई है, तुम आ जाओ/ दूब-चरण रख हरजाई।" यह हरजाई शब्द एक मधुर उपालंभ है। और इस उपालंभ से प्रेमी पिघले नहीं यह तो कल्पना भी नहीं की जा सकती है। "रात के शांत पहरों में ऐसा लगा /तेरे पैरों की आहट कहीं तो नहीं /फूल की पंखुड़ी में सटे ओस में /ये तेरी मुस्कुराहट कहीं तो नहीं।" लेकिन प्रकृति और प्रेम में डूबे हुए कवि का हिर्दय अपने बाहर की दुनिया को देख कर बेचैन हो उठता है। जब वह देखता है कि जिस प्रेमपूर्ण दुनिया की मैं कल्पना करता हूँ उसके स्थान पर सामने एक ऐसी दुनिया उपस्थित है जहाँ उन्माद से भरे लोगों ने भय और आतंक का माहौल बना रखा है, मासूम बच्चे कत्ल किए जा रहे हैं, तब वह क्रंदन कर उठता है। "सुना गया कि लाल चौक पर/ एक धर्म के उन्माद में लोगों ने/ दूसरे धर्म के एक निरपराध बच्चे को /मार डाला है।" यह तो एक संक्षिप्त वर्णन मात्र है। डॉ साहब की कविताओं में इंद्रधनुषी सतरंगी रंग समाया हुआ है।

 डॉ रतन कुमारी वर्मा, एक ओर तो गांव के स्तित्व के समाप्त होने पर विचलित दिखती हैं दूसरी ओर उनके विचल का कारण तंत्र में फैला हुआ रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार है। 'रिश्वतखोरी की जड़ हैं मंत्री जी'/... रिश्वतखोरी की जड़ को जीवित रखे हुए हैं /इन्हीं के बहाने/ अधिकारी, कर्मचारी /सभी मौज कर रहे हैं /फल-फूल रहे हैं।" 

 इस संकलन के अनेक कवियों ने स्त्री-मन की संवेदना प्रकट की है। स्त्री-मन की जिस संवेदना से द्रवीभूत होकर गुप्तजी ने यशोधरा का वर्णन किया था उसी संवेदना से विलगीत डॉ रमेश कुमार निर्मेष लिखते हैं, "पर दया की मूर्ति को /अपनी निश्छल अर्धांगिनी /और अबोध राहुल पर दया क्यों नह आई?/ अहिंसा की प्रतिमूर्ति को /इस प्रायोजित सामाजिक हिंसा पर रुदन /क्यों नहीं आया।" 

नंद लाल मणि त्रिपाठी 'पितांबर' जी जब जेठ-असाढ़ का वर्णन करते हैं तो लगता है की यह कड़ी कुछ और लंबी होती और इसी मधुरता से वे बारहमासे का वर्णन करते हैं तो बारहमासे के वर्णन कि वह परंपरा जो हिंदी कविताओं में टूट सी गई है फिर से नई अंगड़ाई लेती। इनकी कविताओं को देखकर यह याद एक बार फिर से पुनर्जीवित हो उठती है। "सूखी धरती की बुझी प्यास /हरियाली-खुशहाली का विश्वास/ मोर नाचे और जग-जीवन मुस्काए।" 

डॉ दुर्गा झा की कविताओं में स्त्री के विराट स्वरूप को प्रस्तुत करने का सार्थक प्रयास दिखता है। उनकी कविताओं में स्पष्टतः स्त्री के जिस रूप का वर्णन है वह वंदनीय है ग्रहणीय है। रावण के सिर गिने जा सकते थे, चतुरानन ब्रह्मा के आनन दिखते हैं लेकिन स्त्री के इतने रूप हैं, अपने एक ही जीवन में उसे इतने रूप धारण करने पड़ते हैं कि उसे समझ पाना विधाता के लिए भी कठीन है। रावण के तो/ दस चेहरे थे/ ब्रह्मा के हैं तीन /मेरे कितने चेहरे हैं ?/ थक जाओगे/ तुम गिन-गिन।" निसंदेह एक स्त्री को जितने उत्तरदायित्वों का निर्वाहन करना होता है, जितने रूप में उसे प्रस्तुत होना पड़ता है, उसे समझ पाना कतई संभव नहीं, सहज नहीं। 

इस तरह हम देखते हैं कि इस संकलन में संकलित तमाम रचनाकारों की रचनाएं जीवन के विविध रूपों को समेटे हुए हैं। इन रचनाकारों की कविताओं पर अलग-अलग समीक्षाएँ लिखी जाए तब भी हर रूप को समेट पाना संभव नहीं है यहां एक ही समीक्षा में अट्ठारह कवियों की कविताओं से होकर गुजरना पड़ा है। इसकी सीमाओं को ध्यान में रखकर इस पर विचार करना श्रेयस्कर है।

अमित कुमार मिश्रा

अतिथि सहायक प्राध्यापक, एच.एस.कॉलेज,  उदाकिशुनगंज ।

संपर्क  - 9304302308.

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