ग़ज़ल
इश्क के दर्द को भी जमाने के दर्द में मिला दे
लेकर अपने हिस्से का जाम समंदर के पानी में मिला दे।
वह दिलफरेब, दिलरूबा की नाज़-ओ-अदा से मिलता है
कांटों की चुभन को हुस्न की चाशनी में मिला दे।
उसकी आँखों का काजल मन को भरमाता बहुत है
उसकी निगाहों की पनाह में खंजर की नोक छिपा दे।
कब तक छिपाए रखेगा सीने का ज़ख्म ज़माने से
तेरा कातिल ही तेरा वैद्य है उसे ही मरहम लगाने दे।
बनकर दोस्त वह दुश्मन को भी मात देता है
उससे हुनरमंद कौन है यहाँ, उसे ही नाव चलाने दे।
तुमने ही गलत उम्मीद पाल रखी थी उनसे 'अमित'
वह तो ज़माने की चाल चलता है, उसे उसकी चाल चलने दे।
बहुत ही उम्दा रचना जिसमें बिम्ब की सुन्दरता रचना को और भी प्रगाढ़ बनाती है
जवाब देंहटाएंबहुत आभार आपका प्रोफ़ेसर साहब।
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