बेचारा पुरूष (व्यंग्य)

[ व्यंग्य के अंत में मैंने निष्कर्ष पर पहुंचने की चेष्टा की है कि हम लोग स्त्रियों की इन बातों को हल्के-फुल्के में ले तो लेते हैं लेकिन वह कितनी कठिनाइयों से इसका सामना करती है वह भी प्रियजनों की मंगल कामना के निमित्त यह सहज ही अनुभवजन्य है।] शुभ रात्रि दोस्तों! मैं चला सोने। हाँ, भूखे पेट नींद तो बड़ी मुश्किल से आएगी लेकिन किसी तरह रात तो काटनी ही है। जब इंसान की किस्मत में ही भूखा सोना लिखा हो तो वह क्या कर सकता है। किसी ने सच ही कहा है कि पक्षी अपने से पांव के कारण फंसता है और इंसान अपनी जुबान के कारण। अब क्या कहूं, बतलाना तो नहीं चाह रहा लेकिन आप इतनी जिद कर रहे हैं तो बदला देता हूं। रक्षाबंधन का त्यौहार मना कर नेग में कपड़े, पैसे, मिठाई और कई सारी चीजें लेकर पत्नी मायके से लौट आई। दो-ढाई घंटे में जिन कपड़ों को पहना था उसे सिर्फ दस मिनट में बदल ली और विचारी लग गई अपने कामकाज में। मन ही मन कुछ विचार रही थी (आज का हिसाब किताब लगा रही थी)। लाए हुए कपड़ों को बार-बार निकाल कर देखती और रख देती। मन इतना प्रफुल्लित था कि मेरे पसंद का खाना बनाने सोच लिया उसने। बेचारी को दया आ गई कि मैं दिन भर अकेले घर में पड़ा था तो क्यों न मेरे पसंद का ही कुछ बना दे। बातों ही बातों में उसने कहा कि, "रक्षाबंधन के अठारहवें दिन तीज का त्यौहार आता है, अब तीज के लिए लोग तैयारी में लग जाएंगे।" मैं विनोद के मूड में था और मेरी किस्मत मुझसे मजाक करने के मूड में। बस फिर क्या था मधुमक्खी के छत्ते में हाथ दे बैठा। अपनी सूर्यमुखी को चंद्रमुखी समझने की भूल कर बैठा। मैंने मस्का लगाते हुए कहा, "चलो तुम ही लोगों का अच्छा है। आज भाई से कपड़े-पैसे ठग लिए और दो सप्ताह बाद पति से ठग लो। बड़ा सुनियोजित इंतजाम कर रखा है। हम पुरुषों के नसीब में यह सब कहाँ? बस फिर क्या था खाना तो खाने को मिला नहीं; हाँ, मार खानी पड़ी। नहीं-नहीं यह मैं क्या बोल गया ? मार नहीं खानी पड़ी (अपना लाज खुद अपने ही बचाना पड़ता है)। लेकिन कुछ भी हो पेट तो भरता है भोजन से और भोजन बनाने वाली को मैंने मजाक-मजाक में रूष्ट कर दिया। ललचायी नजरों से उस झोले की ओर देख रहा हूं जो श्रीमती जी अपने मायके से लेकर आई थी। लेकिन अपने घर में, अपनी रसोई में रखे हुए चीजों के को खाने का हौसला जो बेचारा पुरुष नहीं जुटा पा रहा है वह पत्नी के झोला में हाथ डालकर कुछ निकाल ले यह तो ही...ही...ही...। मैं सहमा-सहमा झोले की ओर देख रहा हूँ और पत्नी मुंह फेरकर सो गई है। झोले के ऊपर जो पन्नी रखी है अगर वह नहीं होती तो कुछ सामग्री निकाल कर खा भी लेता। लेकिन जैसे ही छूने की कोशिश करूंगा पन्नी खरखराएगी और नींद इतनी कच्ची है श्रीमती का कि उठ बैठेंगी। और फिर सबको पता ही है महाभारत सिर्फ द्वापर में ही नहीं हुआ था कभी भी हो सकता है। चुपचाप सो जाता हूं ज्यादा देर तक नाराज नहीं रह सकती है। सुबह तो खाना दे ही देगी। तीज का यह उलाहना मैंने दिया कि हम पतियों को ठगने के लिए करती हो। लेकिन चौबीस घंटे वह कैसे भूखी रहती है इसका एहसास एक रात में मुझे भी कराने की उसने अच्छी युक्ति सोच निकाली है। नींद तो आ नहीं रही है उठकर पत्नी का मुंह देखता हूँ। यकीन मानिये अफसोस हो रहा है बेकार में बेचारी को नाराज कर दिया। - अमित कुमार मिश्रा।

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