राष्ट्रद्रोह (कविता)

क्यों इतने उग्र होते हो
यदि मैंने, तुम्हें
गुमराह किया है
क्या तुम नहीं जानते
तुम्हें गुमराह किया जाना
कितना आवश्यक है, राष्ट्रीय विकास के लिए ?
क्या हुआ कि मैंने
तुम्हारे अंदर सोए
धार्मिक उन्माद को जगाया
क्या हुआ कि मैंने
तुम्हारे हाथों, तुम्हारे बंधु-बांधवों की
हत्या करवा दी
राष्ट्र-नीति के लिए
यह कोई नई बात तो है नहीं ।
मैंने अपने शिकारी कुत्तों को
छूट दी है कि,
वह फाड़ खाए तुम्हें
और राष्ट्रद्रोह के चिथड़े डाल दे
तुम्हारी सड़ी-गली लाश पर
लेकिन विचार कर देखो,
यह कोई अनोखी नीति तो
नहीं अपनाई है मैंने
मुझसे पहले की सरकारों ने भी
मरवाया है तुम्हें,
नक्सलवादी, लुटेरे, राष्ट्रद्रोही...
जैसे अलंकारों से अलंकृत कर।
वह भी तो तुम्हीं थे
जिसने भूख के विरुद्ध आवाज उठाई 
और मारे गये।
एक बात जान लो
मेरी प्रिय जनता ;
तुम्हें कुर्बान तो होना ही होगा
राष्ट्र के लिए
क्योंकि राष्ट्र है तो तुम हो
तुम्हारे होने न होने से क्या ?

- अमित कुमार मिश्रा। 

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