घर जैसा लगता है (गज़ल)

घर   यह   अब   घर   जैसा   लगता   है
माँ-बाप के आ जाने से छत जैसा लगता है

दीवारें   बहुत   ज्यादा   हैं   घर   में
रोशनदान बहुत कम जैसा लगता है ।

एक दरवाज़ा तो खुला छोड़ देते उधर
वह पड़ोसी अपने भाई जैसा लगता है ।

वर्षों बाद आया है खिड़कियाँ खुली देख कर
वह  नन्हा  परिंदा  मेरी  बेटी  जैसा लगता है।

रोज सुबह-सुबह छेड़ जाता है मुझे
उजाला  मेरी  पत्नी जैसा लगता है।

पूजाघर   में   बजती   घंटी   का   टुनटुन
बहन की पाजेब के रूनझुन जैसा लगता है।

'अमित' अब तो करना सिखले रिश्तों की कदर
अपनों   से   ही   घर   घर   जैसा   लगता   है



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