मैयत का न्योता (कविता)

बैठे-बैठे अचानक से स्मृति को झटका लगा और
याद हो आया कि आज तो मुझे
उसकी मैयत में जाना था
पता नहीं दिन भर कैसे भूल कर बैठा रहा ।
अभी परसों ही तो वह मिला था मुझसे
तो उसने मुझे न्योता दिया था
इस इतवार को अपनी मैयत में शामिल होने को ।
आज इतवार है
उसकी मैयत निकली होगी
तीन, चार या पांच बजे के आसपास ।
वह मेरा बड़ा पुराना मित्र था और उसकी मैयत में
शामिल होना मेरे लिए सर्वाधिक आवश्यक था
किंतु आजकल काम का बोझ इतना बढ़ चला है कि
कई सारे जरूरी काम भी मस्तिष्क से पड़े रह जाते हैं
देर सवेर याद आती है चीजें
और उसे याद कर पाता हूं
कि तब तक तो समय हाथ से फिसल चुका होता है
फिर उन चीजों का याद आना और न आना कुछ खास मायने नहीं रखता ।
अभी जाकर देखूंगा अगर उसकी मैयत निकलने में समय बाकी हो
या निकल कर अभी श्मशान में राख नहीं हुई हो
तो जाकर अंतिम क्षण में
मित्रता के नाते खड़े तो अवश्य हो सकता हूं।
कितनी प्रसंता से मिला था वह मुझसे परसों
उसने कहा आज और कल जीने लायक शक्ति बाकी है उसमें
लेकिन इतना तो निश्चय है कि अब वह भूख दो दिन से ज्यादा बर्दाश्त नहीं कर सकता है
और रविवार को आखिरकार उसे दम तोड़ना ही होगा।
रविवार की सुबह से अँतड़ियां कुलबुलाएगी
और तीसरे पहर तक जाते-जाते उसका मरना तैय है।
उसने आज यानी रविवार की शाम
अपनी मैयत में शामिल होने का न्योता दिया था मुझे।
आप आश्चर्य न करें
वह जो मेरे मित्र की दुनिया थी
या जिस दुनिया में हम जीते हैं उसमें
हमारे मरने की तारीख पहले से ज्ञात होता है हमें
और हम स्वयं अपने मैयत में शामिल होने का न्योता अपने परिजनों को, स्वजनों को, मित्रों को, देने में समर्थ होते हैं।

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