गज़ल

भरे वज़्न में मुझे गुनहगार ठहराया था उसने
खुद  ही  डुबोकर  खुद  ही बचाया था उसने

बार-बार के बुलाने पर जब कोई नहीं आया
तब  थक  हारकर  मुझे  बुलवाया  था उसने

वक्त  की  बात  देखो  ऐसा  भी  दौर  आया
खुद आगे बढ़कर मुझे गले लगाया था उसने

यह उसके इज़हार-ए-मुहब्बत की कोई अदा नहीं थी
मुझे  बर्बाद  करने को कनखियों से निहारा था उसने।

मेरी धड़कनों की तड़प बेचैन न कर दे उसे
इसलिए मेरी सांस को रूकवाया था उसने।

हुलसकर   पहुंच   गए   उसकी   इबादत   में   'अमित'
कल की महफिल में किस कदर रूसवा किया था उसने।

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