हर मूरत में प्रिय! तेरी सूरत देखता हूं।


आंख खुलते ही अक्सर तुम्हें देखता हूं
तुम ही आती नजर हो जिधर देखता हूं।

रूप तेरी बसी है निगाहों में ऐसी
खुद में झांकू भी मैं तो तुम्हें देखता हूं।

दर्पणों ने किया है शरारत ये कैसा
जब भी गुजरूं इधर से तुम्हें देखता हूं।

होश में भी मदहोशी का असर देखता हूं
अक्स मदिरा में तिरते तेरा देखता हूं।

मंदिर-मस्जिदों के लाख खाक छाने है मैंने
हर मूरत में प्रिय! तेरी सूरत देखता हूं।

- अमित कुमार मिश्रा।

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