ब्रेख़्त की कविता में युद्ध की विभीषिका का चित्रण (आलेख).

ब्रेख़्त की कविता में युद्ध की विभीषिका का चित्रण।
                     - अमित कुमार मिश्रा।

(घोषणा: मैं बतला देना चाहता हूं कि मैंने ब्रेख़्त की इन कविताओं के मूल जर्मन भाषा से हिंदी में अनुदित पाठ ही पढ़ा है और उसी के आधार पर यह आलेख भी प्रस्तुत की है।)

युद्ध सदैव मानव जाति के विकास में बाधा पहुंचाता रहा है। कोई भी युद्ध हो उसमें मानवीय मूल्यों की हत्या अवश्य होती है। मानव कभी व्यक्तिगत तो सभी सामूहिक स्वार्थवश या ईर्ष्यावश युद्ध का सृजन करता रहा है। युद्ध की एक बड़ी विभीषिका यह है कि इस की लपटें सुलगने के बाद सुलगाने वाले के नियंत्रण में भी नहीं रहती है। मानव सभ्यता के इतिहास में अनेक ऐसे पन्ने दर्ज हैं जो मानवों के सभ्य होने पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में दो-दो विश्वयुद्धों की भयावहता ने संपूर्ण मानवता को झकझोर कर रख दिया। अनेक संपन्न देश भुखमरी के दहलीज पर आ खड़े हुएं। इतिहास के पन्नों में युद्ध का स्थूल स्वरूप मात्र वर्णित होता है उसके सूक्ष्म प्रभाव को समकालीन साहित्य में ही देखा जा सकता है। इतिहास यह बतलाकर मौन हो जाता है कि किसका कितना नुकसान हुआ और इस दृष्टि से कौन विजित रहा और कौन विजेता। युद्ध का प्रभाव आमजन पर क्या पड़ा, आमजन कब तक उसकी मार झेलती रही, युद्ध में जय और पराजय का सामना करने वाले देश कितना खोखला हुएं, इन प्रश्नों का उत्तर साहित्य ही दे सकता है।
‘बेर्टोल्ट ब्रेख़्त’ का नाम जर्मन भाषा के श्रेष्ठ कवियों में शुमार है। उनका जन्म 1898 ई. में हुआ था और उन्होंने प्रथम तथा द्वितीय विश्व युद्ध के परिणामों को करीब से महसूस किया था। 1914-1918 ई. तक चलने वाले प्रथम विश्व युद्ध और 1939-1945 ई. तक चलने वाले द्वितीय विश्व युद्ध में सभी देश प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जूझ रहे थे। इस युद्ध ने मानव सभ्यता के विकास को सैकड़ों वर्ष पीछे धकेल दिया। ब्रेष्ट की कविताओं में युद्ध के प्रभाव को स्पष्ट देखा जा सकता है क्योंकि वे स्वयं इसके भोक्ता के रूप में मौजूद थे। एक तथ्य तो स्वयं सिद्ध है कि युद्ध में जीतने वाले और हारने वाले दोनों ही देश के नागरिकों की हार ही होती है। युद्ध के बाद अनेक वर्षों तक जनता को भुखमरी और गरीबी की मार झेलनी पड़ती है। इस तथ्य को ब्रेख़्त अपनी ‘Der Kreig Der Kommen Wird’ (युद्ध जो आ रहा है) शीर्षक कविता में दिखाते हैं।
“पिछला युद्ध जब खत्म हुआ
तब कुछ विजेता बने और कुछ विजित
विजितों के बीच आम आदमी भूखों मरा
विजेताओं के बीच भी मरा वह भूखा ही।”१
                   युद्ध में अनगिनत सेनाएं और नागरिक मारे जाते हैं। राजनैतिक तौर पर, मारा जाने वाला मृतकों में एक संख्या की वृद्धि करता है लेकिन इसका प्रभाव अनेक पर पड़ता है। पत्नी, बच्चे, माता-पिता सभी अपने-अपने स्तर पर रिक्त होते हैं। ब्रेख़्त कहते हैं, आज जिन स्त्रियों ने गर्भ धारण किया है उनके बच्चे जन्म के पूर्व ही अनाथ हो चुके होंगे। युद्ध, उनसे उनके पिता को छीन चुका होगा। यह युद्ध की विभीषिका है।
“विवाहित जोड़े
बिस्तरों पर लेटे हैं
जवान औरतें
अनाथों को जन्म देंगी।”२
युद्ध के बाद लोग अमानवीय कृत्यों से घिर जाते हैं। भूख, बेरोजगारी और अशिक्षा लोगों को कहां तक ले जा सकती है इसका अनुमान ब्रेस्ट की कविताओं को पढ़ते हुए सहज ही लगाया जा सकता है। जवान लड़के-लड़कियां कुव्यवस्था के फैलने से नशे की चपेट में चले जाते हैं। लोग रोटी के लिए खुद को बेचने पर आमाद रहते हैं।
“कि खाते-पीते मध्यवर्ग की जर्मन लड़कियां
तंबाकू के बदले और निम्न मध्य वर्ग की
चॉकलेट के बदले में
खरीदी जा सकती हैं।”३
जर्मनी जैसे समृद्ध देश को भी युद्ध इस हद तक तोड़ सकता है यह सहज अकल्पनीय है और इतिहास के पहुंच से सर्वथा परे।
युद्ध की मार झेलनी पड़ती है निरीह जनता को और इसका आयोजन सदैव राजनीतिज्ञों के द्वारा ही किया जाता है। ब्रेख़्त लिखने हैं,
“नेता जब शांति की बात करते हैं
आम आदमी जानता है
कि युद्ध सन्निकट है।”४
इसी भाव की पुष्टि ‘दिनकर’ भी कुरुक्षेत्र में करते हैं जब वे लिखते हैं कि, युद्ध सदैव कुछ कुटिल नीतिज्ञों के द्वारा रचा जाता है और उसमें देश की इज्जत या गौरव के नाम पर किशोरों को झोंक दिया जाता है,
“वह कौन रोता है वहाँ-
इतिहास के अध्याय पर,
जिसमें लिखा है, नौजवानों के लहू का मोल है
प्रत्यय किसी बुढ़े, कुटिल नीतिज्ञ के व्यवहार का।”५
युद्ध की निरर्थकता पर प्रायः सभी देश के मानवतावादी विचारक, कवि, चिंतक एकमत हैं। युद्ध के सृजनकर्ता, सदैव युद्ध को गौरव के साथ जोड़कर लोगों को मरने-मारने को उकसाता रहता है। लेकिन युद्ध में मारे जाने वालों के परिजन युद्ध के परिणाम को जानते हैं। ब्रेख़्त अपनी ‘Die Oberan Sagen’ शीर्षक कविता में कहते हैं,
“ऊपर बैठने वालों का कहना है:
यह महानता का रास्ता है
जो नीचे धंसे हैं, उनका कहना है:
यह रास्ता कब्र का है।”६
 नि:संदेह कुछ परिस्थितियों में युद्ध अवश्यंभावी हो जाता है लेकिन इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि युद्ध सदा मानव जाति के लिए अहितकर परिणाम ही लाता है। अनेक बार युद्ध मजबूरन भी करना पड़ता है देश को अपने ऊपर होने वाले हमले के प्रतिकार में भी लड़ना पड़ता है।
हरेक भाषा के श्रेष्ठ कवियों ने अपनी रचना के माध्यम से देश और समाज को युद्ध के परिणामों के प्रति सचेत करने का प्रयास किया है, ब्रेख़्त उनमें प्रमुख स्थान रखते हैं।

संदर्भ:
१. बेर्टोल्ट ब्रेख़्त: इकहत्तर कविताएं और तीस छोटी कहानियां, अनुवाद- मोहन थपलियाल, परिकल्पना प्रकाशन, पृ.-५१.
२. ‘Es Ist Nacht’ (यह रात है), बेर्टोल्ट ब्रेख़्त: इकहत्तर कविताएं और तीस छोटी कहानियां, अनुवाद- मोहन थपलियाल, परिकल्पना प्रकाशन, पृ.-५३.
३. बेर्टोल्ट ब्रेख़्त: इकहत्तर कविताएं और तीस छोटी कहानियां, अनुवाद- मोहन थपलियाल, परिकल्पना प्रकाशन, पृ.-७२.
४. वहीं, पृ.-५५.
५. कुरुक्षेत्र- रामधारी सिंह ‘दिनकर’, राजकमल प्रकाशन, पृ.-०५.
६. बेर्टोल्ट ब्रेख़्त: इकहत्तर कविताएं और तीस छोटी कहानियां, अनुवाद- मोहन थपलियाल, परिकल्पना प्रकाशन, पृ.-५८.

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

स्त्री अस्मिता और हिन्दी महाकाव्य (आलेख)

साहित्य की प्रासंगिकता. ( लेख.)

हिन्दी साहित्य में लघुमानव की अवधारणा, ( आलेख )