तरकीबें (व्यंग्य)
सर्वप्रथम तो मैं आपको यह बतला देना चाहता हूं कि यह कोई कहानी नहीं एक घटना है। हां मैं इस बात का दावा नहीं कर सकता हूं कि यह घटना सही ही है। बात आज की है और कुछ दिन बाद पढ़े जाने पर इन दिनों की है। जिंदगी की भागदौड़ कुछ इस तरह बढ़ गई है कि खुद को भी पता नहीं होता कि मैं आज कहां होऊंगा, सुबह कहां होगी और रात को कहां सोऊंगा। मेरा कार्यक्षेत्र पटना है और अध्ययन क्षेत्र दरभंगा, ससुराल पटना में है और मायका सीतामढ़ी में। इन सबों के बीच बांट-बांट कर जिंदगी को जी रहा हूं। दरभंगा में वहां के विश्वविद्यालय से पीएचडी के इस सप्ताह का कार्य पूरा कर आज ही पटना वापस लौटा हूं। पत्नी से जो सुखद समाचार मिला वह यह था कि वो मायके जा चुकी है, हम लोगों का कमरा दो दिनों से बंद पड़ा है। इसी बीच आंधी-तूफान भी आई थी जिस कारण कमरे में धूल जमा होने की स्थिति विकट होगी। धर्म पत्नी ने कहा, ‘घर को थोड़ा झाड़ पोंछ कर रहने लायक बना लीजिएगा और शाम में मुझे लेने आ जाइएगा।’ अब मैं चल तो पड़ा दरभंगा से पटना की ओर लेकिन मुसीबत यह है कि गांधी जी के बुड्ढे कंधे, बोझ उठाते उठाते अब थक चुके हैं इस कारण एक कंधे पर बोझ उठाते हैं तो दूसरा कंधा सुस्ताता है और दूसरे कंधे पर बोझ उठाते हैं तो पहला कंधा सुस्ताता है। सीधे तौर पर कहूं तो उत्तर और दक्षिण बिहार को जोड़ने वाला गांधी सेतु इतना बोझ उठाते उठाते थक चुका है और अब वह एक बार में एक तरफ जाने वाले मार्ग को ही संभालने में सक्षम है। अतः पुल पार करने में बस को डेढ़ दो घंटे भी लग जाए तो कम ही है। जैसे-तैसे थका-हारा घर पहुंचा, वहां की स्थिति देखकर आत्मा कांप उठी की इतनी धूल-मिट्टी मैं अकेले कैसे साफ कर सकूंगा। मां-बाप का आदेश होता तो टालने की कोशिश भी कर जाता पत्नी ने कहा था टालने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। इसके लिए साहस जुटाना बड़े-बड़े वीर पुरुषों के सामर्थ्य से बाहर है मैं तो फिर भी मैं ही हूं। हाथ-पैर धोकर अपने काम में जुट गया। नाश्ता आते-आते बाहर ही कर चुका था। अभी कुछ ही देर गुजरे होंगे और मैंने मुश्किल से एक अलमारी का सामान ही साफ किया था कि दरवाजे पर दस्तक पड़ी। मैंने बाहर निकल कर देखा एक युवती, लड़की भी कह सकता हूं, एक बैग लटकाए और हाथ में कुछ सामान लिए दरवाजे पर खड़ी थी। मुझे देखते ही उसने नमस्कार किया और कहा कि मैं ‘फलाने कंपनी का कुछ सामान बेच रही हूं उसी के बारे में आपको बताना चाहती हूं। मैंने हाथ जोड़कर उनसे कहा कि मेरे पास बिल्कुल वक्त नहीं है, क्षमा चाहता हूं। लेकिन क्षमा चाहना मेरे अख्तियार में है, मिलना न मिलना दूसरे पक्ष के हाथ है। उसने मुझसे कहा कि ‘मैं आपका ज्यादा समय नहीं लूंगी।’ मैंने कहा ‘मैं थोड़ा सा समय भी नहीं दे सकता हूं।’ उसके चेहरे पर थोड़ी मायूसी आ गई थी और आवाज में थोड़ी करुणा,
“आप बस पांच मिनट दे दीजिए मैं जल्दी जल्दी आपको बतला देती हूं।”
मुझे लगा कि ऐसे टलने वाली तो है नहीं चलो कोई दूसरी तरकीब लगाई जाए। मैंने उससे कहा, “आप भीतर आ जाइए।” तब तक उसकी निगाह ने भीतर का पूरा पूरा जायजा ले लिया था। उसने मुझसे प्रश्न किया,-
“क्या घर में और कोई नहीं है ?”
मैंने कहा, “नहीं पत्नी मायके गई है, मां-बाप गांव में रहते हैं, इस वक्त मैं बिल्कुल अकेला हूं।” मैं जानबूझकर कुटिलता से मुस्कानें लगा। उसने कहा,-
“नहीं बाहर ही बात कर लेते हैं, बाहर ही आ जाइए आप पांच मिनट के लिए।”
मैंने कहा, “मुझे भीतर बड़ा काम है ऐसा करते हैं आप भी आ जाइए और काम में थोड़ा हाथ बटा दीजिए मैं आपकी बातें भी सुनता रहूंगा और दोनों मिलकर काम करेंगे तो काम थोड़ा जल्दी निपट जाएगा।”
उसने झिझकते हुए कहा, “नहीं मैं सोच रही थी आपकी पत्नी नहीं है इसलिए घर में आना ठीक नहीं होगा।”
मैंने कहा, “आप नि:संकोच घर के भीतर आ सकती है, आपके साथ मैं कोई दुर्व्यवहार नहीं करूंगा, कर भी नहीं सकता क्योंकि पत्नी भले ही मायके चली गई हो उसका खौफ ज्यों का त्यों मन में है। वह कभी मुझे छोड़ कर कहीं जाता ही नहीं। जहां रहूं हर वक्त मेरे भीतर से मुझे धमकाता रहता है।”
यहां मैं बता दूं, मैं ये बातें उस लड़की से नहीं आप लोगों से बतला देना चाहता हूं, पुरुषों के मन में पत्नी का भय होना कोई बुरी बात नहीं। यह तो एक अच्छाई है जिसके कारण पुरुष दुराचारी होने से बचा रहता है। अब उस लड़की की ओर मुखातिब होता हूं। मैंने उससे कहा, “आप बेहिचक भीतर चले आइए।”
जब वह भीतर आई तो मैंने एक कपड़े का टुकड़ा उसे पकराते हुए कहा, “आप दूसरी तरफ की अलमारी से किताबों पर पड़ी धूल साफ कीजिए मैं इस तरफ बरतन पर पड़ी धूल झाड़ता हूं और आप अपनी बात करती रहें।”
इतना सुनकर वह बोली, “आप मुझसे मजाक कर रहे हैं। मैं धूल कैसे झाड़ सकती हूं ?”
मैंने उस से प्रश्न किया, आप धूल क्यों नहीं झाड़ सकती, चौबीसों घंटे आप सामान तो नहीं बेच सकती। घर का काम तो करती ही होंगी ?
उसने कहा, “हां करती हूं लेकिन… आप ऐसा कीजिए मैं बाद में आ जाती हूं, तब तक मैं एक-दो घर देख लेती हूं।”
मैंने उससे कहा, “यदि आप एक-दो घर देख लेने के बाद यहां आएंगी तो उस वक्त मैं आपको पोछा लगाते दिखूंगा और आपको उसी काम में मदद करनी होगी।”
बेचारी कितना अच्छा जींस-टीशर्ट पहनकर, चेहरे पर घंटे भर के कड़े परिश्रम के बाद मेकअप सजाकर निकली थी। यहां धूल झाड़ने और पोछा लगाने का नाम सुनकर चेहरे का मेकअप फीका पड़ने लगा। करे तो क्या करे, चुपचाप से कसमसा कर दरवाजे के बाहर निकली और अपना सामान बेचने कहीं और निकल पड़ी।
“आप बस पांच मिनट दे दीजिए मैं जल्दी जल्दी आपको बतला देती हूं।”
मुझे लगा कि ऐसे टलने वाली तो है नहीं चलो कोई दूसरी तरकीब लगाई जाए। मैंने उससे कहा, “आप भीतर आ जाइए।” तब तक उसकी निगाह ने भीतर का पूरा पूरा जायजा ले लिया था। उसने मुझसे प्रश्न किया,-
“क्या घर में और कोई नहीं है ?”
मैंने कहा, “नहीं पत्नी मायके गई है, मां-बाप गांव में रहते हैं, इस वक्त मैं बिल्कुल अकेला हूं।” मैं जानबूझकर कुटिलता से मुस्कानें लगा। उसने कहा,-
“नहीं बाहर ही बात कर लेते हैं, बाहर ही आ जाइए आप पांच मिनट के लिए।”
मैंने कहा, “मुझे भीतर बड़ा काम है ऐसा करते हैं आप भी आ जाइए और काम में थोड़ा हाथ बटा दीजिए मैं आपकी बातें भी सुनता रहूंगा और दोनों मिलकर काम करेंगे तो काम थोड़ा जल्दी निपट जाएगा।”
उसने झिझकते हुए कहा, “नहीं मैं सोच रही थी आपकी पत्नी नहीं है इसलिए घर में आना ठीक नहीं होगा।”
मैंने कहा, “आप नि:संकोच घर के भीतर आ सकती है, आपके साथ मैं कोई दुर्व्यवहार नहीं करूंगा, कर भी नहीं सकता क्योंकि पत्नी भले ही मायके चली गई हो उसका खौफ ज्यों का त्यों मन में है। वह कभी मुझे छोड़ कर कहीं जाता ही नहीं। जहां रहूं हर वक्त मेरे भीतर से मुझे धमकाता रहता है।”
यहां मैं बता दूं, मैं ये बातें उस लड़की से नहीं आप लोगों से बतला देना चाहता हूं, पुरुषों के मन में पत्नी का भय होना कोई बुरी बात नहीं। यह तो एक अच्छाई है जिसके कारण पुरुष दुराचारी होने से बचा रहता है। अब उस लड़की की ओर मुखातिब होता हूं। मैंने उससे कहा, “आप बेहिचक भीतर चले आइए।”
जब वह भीतर आई तो मैंने एक कपड़े का टुकड़ा उसे पकराते हुए कहा, “आप दूसरी तरफ की अलमारी से किताबों पर पड़ी धूल साफ कीजिए मैं इस तरफ बरतन पर पड़ी धूल झाड़ता हूं और आप अपनी बात करती रहें।”
इतना सुनकर वह बोली, “आप मुझसे मजाक कर रहे हैं। मैं धूल कैसे झाड़ सकती हूं ?”
मैंने उस से प्रश्न किया, आप धूल क्यों नहीं झाड़ सकती, चौबीसों घंटे आप सामान तो नहीं बेच सकती। घर का काम तो करती ही होंगी ?
उसने कहा, “हां करती हूं लेकिन… आप ऐसा कीजिए मैं बाद में आ जाती हूं, तब तक मैं एक-दो घर देख लेती हूं।”
मैंने उससे कहा, “यदि आप एक-दो घर देख लेने के बाद यहां आएंगी तो उस वक्त मैं आपको पोछा लगाते दिखूंगा और आपको उसी काम में मदद करनी होगी।”
बेचारी कितना अच्छा जींस-टीशर्ट पहनकर, चेहरे पर घंटे भर के कड़े परिश्रम के बाद मेकअप सजाकर निकली थी। यहां धूल झाड़ने और पोछा लगाने का नाम सुनकर चेहरे का मेकअप फीका पड़ने लगा। करे तो क्या करे, चुपचाप से कसमसा कर दरवाजे के बाहर निकली और अपना सामान बेचने कहीं और निकल पड़ी।
इस तरह की तरकीब मैं अक्सर आजमाया करता हूं इसलिए मैं जानता हूं कि घी सीधी उंगली से कभी निकलता ही नहीं या तो उंगली टेढ़ी करनी पड़ती है या उससे भी अधिक समझदारी यह है कि घी चम्मच से निकाला जाए। एक ताजा घटना लीजिए, इसी बार जब मैं दरभंगा से चलने के लिए स्टेशन पर बैठा था तो गाड़ी तीन-चार घंटे विलंब थी। इसमें गाड़ी का कोई दोष नहीं यह भारतीय रेल की परिपाटी है जिसका पालन न करना आश्चर्य की बात है यह तो अपने परंपरा का निर्वाह कर रही थी। स्टेशन पर कुछ बच्चे अलग-अलग दिशाओं में घूम कर लोगों से धन उपार्जित कर रहे थे (भीख मांग रहे थे कहना अपमानजनक है और किसी के अपमान का अधिकार किसी को नहीं)। एक बारह-तेरह वर्ष की बच्ची धीरे धीरे मेरी ही दिशा में बढ़ रही थी। जब तक लोग आनाकानी करतें वह उसके पैर पकड़ती, गिरगिराती लेकिन बिना पैसे लिए न टलने की उसने सौगंध उठा रखी थी। जब वह मेरे पास आई तो मैं जिस बेंच पर बैठा था उसे बगल में झाड़ते हुए प्रेम से उसका हाथ पकड़कर उसे बगल में बैठाया। दस का एक नोट निकाला और उसे दिखाते हुए कहा, “मैं इस देश का एक बहुत बड़ा और होनहार कवि हूं जब तक गाड़ी नहीं आ जाती कविताएं सुनाऊंगा इससे मेरी भूख मिटती रहेगी और मैं यह नोट गाड़ी के आते ही तुम्हें दे दूंगा जिससे तुम भी अपनी जरूरत पूरी कर सकती हो। उसने देखा यह दस रुपए तो बहुत मंहगे पड़ने वाले हैं, एक तो पता नहीं क्या सुनाएगा नहीं सुनाएगा ऊपर से जितनी देर में यह दस रुपए देगा उतनी देर में तो मैं ना जाने कितने रुपए बना लूंगी। लोग वहां खड़ा होकर तमाशा देखने लगे कि एक भिखारिन भी कवि के जाल में फंसकर फड़फड़ा रही है। अभी स्थिति बिल्कुल उल्टी थी इससे पहले लोग उससे पिंड छुड़ा रहे थे और वह जबरन लोगों के पैर पड़ रही थी, यहां वह लड़की बार-बार जाने के लिए उठती और मैं उसे बांह पकड़ कर बैठा देता। अंत में वह मुझसे जबरन हाथ छुड़ाते हुए वहां से भाग खड़ी हुई। दो-तीन और भीख मांगे वाले बच्चे मुझे दूर से देख रहे थे वे ऐसे बच कर निकलतें जैसे मेरी परछाई से छूते ही उन्हें छूत की बीमारी लग जाने का भय हो।
ऐसी तरकीबें कभी कभी आजमा लेना मैं बुरा नहीं समझता। अब आप अगर इतनी जिद कर रहे हैं तो मैं बतला देता हूं कि ये तरकीबें मिलती कहां हैं। वैसे आपको बिना बतलाए भी समझ जाना चाहिए था कि हरिशंकर परसाई के अलावा और कोई है ही नहीं जो ऐसी तरकीबें बतला सकता हो। बी.ए. के पाठ्यक्रम में पढ़ाने के दौरान मैं बच्चों को हरिशंकर परसाई का बहुचर्चित व्यंग्य ‘समय काटने वाले’, निरंतर कई वर्षों तक पढ़ाता रहा जिसका और कुछ लाभ हुआ हो या न हुआ हो लेकिन समय-समय पर तरकीबें निकालने की समझ जरूर विकसित हो गई है।
दरभंगा में गाड़ी आने पर जैसे ही मैं सेकंड क्लास की ओर बढ़ा देख कर दंग रह गया कि उसमें मक्खी तक के घुसने की जगह नहीं है मैं कैसे घुस सकता हूं। कोई और उपाय न देख कर मैं स्लीपर में घुस गया। वहां रेलवे ने और कोई प्रबंध किया हो या ना। किया हो टीटी की भर्ती भरपूर कर रखी थी। एक टीटी मेरे पास भी आया मैंने अपनी टिकट दिखलाई, इस पर बिगड़ते हुए वह कहने लगा ‘आपको इस स्लीपर वाले बोगी में नहीं चढ़ना चाहिए था।’ मैं क्या करता रोनी सूरत बना कर उन से विनती करने लगा, गाड़ी खुल गई थी और मैं दौड़ कर दी दूसरे दर्जे में नहीं चढ़ सका इसलिए मजबूरन इसमें चढ़ना पड़ा। टीटी ने दयालुता दिखलाते हुए इस तरह कहा जैसे वह मुझे कोई जागीर बख्श रहा हो, ‘यहां तो माफ कर दे रहा हूं लेकिन अगले स्टेशन पर उतर के दूसरे दर्जे में चले जाना।’ मैंने तरकीब सोची चलो टीटी एक स्टेशन के लिए तो दया दिखला ही सकता है। अब मैं हर स्टेशन पर उतरता, बाहर बैठना और गाड़ी खुलने पर जब इतनी रफ्तार पकड़ लेती कि मैं दौड़ कर भी दूसरे दर्जे तक नहीं पहुंच पाता तब गाड़ी में चढ़ने के लिए दौड़ना शुरू करता।
खैर उस महिला को घर से बाहर करने की तरकीब काम आ चुकी थी और मैं जल्दी-जल्दी सफाई करने लगा। काम निपटा कर पत्नी को लाने भी जाना था यदि देर होत तो वहां भी कई तरह के सवाल जवाब से गुजरने पड़ते। अचानक याद आया जब दरभंगा से पटना लौट रहा था मेरे साथ मेरा एक मित्र था जो अपनी प्रिया से बात कर रहा था और दोनों शाम में कहीं फिल्म देखने की योजना बना रहे थे। मैं भी ऐसी कोई योजना बनाने की सोचने लगा था कि याद आया मेरी प्रेमिका तो पत्नी बन चुकी है। विश्वविद्यालय में कई बार कोशिश की एक प्रेमिका तो बना ही लूं। लेकिन जैसे ही पत्नी की छवि याद आती खुद को वफादार बनाने में लग जाता। खुद को कोसता की पत्नी से बेवफाई कर प्रेमिका बनाने के बारे में तुम सोच भी कैसे सकते हो ? मर्यादा का ख्याल हो न हो खौफ का ख्याल छोड़ना बिल्कुल भी उचित नहीं है। इसी कशमकश में रह जाता।
अब आप कितनी भी जोर लगा ले मैं आपसे यह नहीं बताने वाला कि एक बार भावावेश में आकर अपनी कविता सुनाते-सुनाते मैंने अपने साथ पढ़ने वाली एक लड़की को गहरी मित्र बना लिया। अब वह लड़की थी और मित्र भी इस नाते शब्दत: वह महिला मित्र यानी गर्लफ्रेंड की उपाधि से विभूषित हो गई। एक दिन मेरे किसी दुष्ट मित्र ने मित्रता के धर्म से बढ़कर देवर के धर्म को मानते हुए इसकी सूचना मेरी पत्नी को दे दी। उस दिन लगा कि मेरा शोध-कार्य इस जन्म में तो पूरा होने से रहा। काफी क्षमा याचना करने, मिन्नतें मांगने और कसमें खाने पर पुनः इसकी अनुमति दी गई। उस समय मुझे पता चला सिनॉप्सिस पास करवाना उतना मुश्किल नहीं है जितना मुश्किल रूठ जाने पर पत्नी को मनाना है। इसलिए अब जब भी मन में ख्याल आता है कि प्रेमिका बनाऊं, मुझे अपनी डॉक्टरेट की उपाधि दूर होती दिखने लगती है और मन मसोस कर जिस स्थिति में हूं उसी स्थिति में खुद को खुश रखने की कोशिश करता हूं। मित्र अपनी हरकतों से दिल जलाते हैं और मैं उन्हें प्रेम में डूबा देखकर जलने के अलावे कुछ नहीं कर पाने को विवश हूं। खैर आप को कहानी सुनाने के चक्कर में कहीं मेरी खुद की कहानी में ट्रेजडी ना आ जाए इसलिए आप इतनी ही कहानी से संतोष करें मैं जाता हूं पत्नी को वापस लाने।
@ अमित कुमार मिश्रा।
सबकी बातों को कह अपने में कह देने का यह अंदाज वाकई दिलचस्प है और वो इसलिए भी की यह हास्य के रूप में व्यंग सा बन पड़ा है जो बेजोड़ है ।
जवाब देंहटाएंबहुत धन्यवाद श्रीमान।
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