जड़ विहीन राष्ट्र (कविता).

जड़ विहीन राष्ट्र

आज फिर बोया गया है
बीज एक अमरबेल का।
पिछले कुछ सदियों से
जड़-विहीन पेड़ लगाने की परंपरा
निरंतर विकसित की जा रही है।
इस परंपरा को राज्याश्रय प्राप्त है
जिस कारण यह समुचित विकास पा रहा है।
यह परंपरा विरोधी है
उस जड़-मूलक पेड़ का जो
स्वत: अपनी दिशा निर्धारित करता है,
अपनी इच्छा से अपनी तनाओं को
विकास पथ पर अग्रसर करता है।
यह पेड़,
सुनियोजित राष्ट्रीयता के राह में बाधक है
अतैव इसे कटवाया जा रहा है जोरो से
राष्ट्रद्रोह के इल्जाम में।
यह परंपरा, निर्माण चाहती है
एक ऐसे राष्ट्र का जो
पेड़ों का नहीं, लताओं का देश हो।
यह विकसित हो मगर लता की तरह
जो स्वयं अपने विकास की दिशा
तलाशने में असमर्थ हो,
आंख मूंदकर चढ़ती जाए
उन खपचियों पर जो
उसके विकास के पथ पर
बढ़ने के निमित्त
पूर्व नियोजित है।

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