रघुवीर सहाय की कविता में लोकतंत्र की हकीकत. (आलेख)

रघुवीर सहाय की कविता में लोकतंत्र की हकीकत.
                                     - अमित कुमार मिश्रा.

रघुवीर सहाय एक पत्रकार-कवि, लेखक हैं। उनकी कविताएं समय सापेक्ष वस्तुस्थिति को यथार्थ रूप में प्रकट करती है। उन्होंने राजनीति, शासन व्यवस्था, आदि की दोहरी नीति को बिना किसी रहम के नंगा किया है। रघुवीर सहाय उन चुनिंदा कवियों में शामिल हैं जिनकी निगाह ने लोकतंत्र के कंकाल को पहचान लिया था। उनकी खोजी निगाह ने इस सत्य को ढूंढ निकाला कि जिस स्वाधीनता के लिए इतनी लंबी लड़ाई लड़ी गई वह जनता के साथ किया गया एक छलावा मात्र था। आजादी के कुछ ही वर्ष बीते थे कि राजनेताओं ने अपना वास्तविक रंग पकड़ना शुरू कर दिया और पूरी ताकत से नेताओं का साथ अफसरों ने निभाया। कवि पुरजोर प्रयास करता है, उस सत्य को तलाशाने की जिसे संविधान नामक पुस्तक की शोभा मात्र को गढ़ा गया था। राष्ट्रगीत में जिस भारत-निर्माता की छवि दिखाई गई है वह तो जनता की है लेकिन वास्तव में कुछ गिने-चुने नेता ही इस देश के रहनुमा बन बैठे हैं।
‘राष्ट्रगीत में भला कौन वह
भारत-भाग्य विधाता है
फटा सुथन्ना पहने जिसका
गुन हरचरना गाता है।’ (-अधिनायक.)
स्वाधीनता आंदोलन में जो जन-सैलाब आया था, उसमें जनता इस उम्मीद से जुड़ी थी कि इस लड़ाई के बाद उनका अपना शासन (स्वशासन) होगा; लोगों को भूख और गरीबी से आजादी मिल जाएगी। लेकिन आजादी के बाद की तस्वीर देखकर लोगों के तन-बदन में आग जलने लगती है।
पूरब-पच्छिम से आते हैं
नंगे-बूचे नरकंकाल।’ (-अधिनायक.)
लोकतंत्र की सुनहरी छवि दिखलाने वाला दर्पण, बहुत समय तक अपनी चमक से लोगों को चुंधियाए नहीं रख सका, वह समय भी आया जब इस यथार्थ का बोध हुआ कि लोकतंत्र और कुछ नहीं एक मनमोहक जाल है जिसमें लोगों को फांसा जा रहा है। मुक्तिबोध, धूमिल, नागार्जुन, रघुवीर सहाय, सरीखे कवियों ने लोकतंत्र की झूठी चमक से मोह भंग होते ही यथार्थ पर चढ़ा पर्दा उठा दिया और जनता के समक्ष लोकतंत्र अपनी नग्न अवस्था में प्रकट हो चली।
‘मोटे, बहुत मोटे तौर पर लोकतंत्र ने हमें
इंसान की शानदार जिंदगी और कुत्ते की मौत के बीच चांप लिया है।’
जितनी तेजी से पूरे विश्व को लोकतंत्र ने आक्रांत किया है उतनी तेजी से शायद ही किसी और विचारधारा का विकास हुआ हो। लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें जनता के हित को सर्वोपरि रखा गया। अपने हित कि साधना होते देख जनता ने इस विचारधारा को हाथो हाथ अंगीकृत किया। उनके आगे एक स्वप्न तैर उठी कि विश्व में एक ऐसे शासन व्यवस्था का भी स्वरूप है जिसमें जनता अपनी मर्जी से सरकार चुन सकती है। सरकार और उसके अफसर, लोगों के हित की साधना में अपनी शक्ति का प्रयोग कर सकते हैं। उनके लिए यह सब एक सुखद स्वप्न से कम नहीं था, इसी का परिणाम था कि विश्व के अनेक देशों में जहां जनता राजनीतिक रूप से शोषण को अपना भाग्य मानकर चुप बैठी थी, वहां उन्होंने बड़े बड़े आंदोलनों को हवा दिया। भारत में भी राजतंत्र और अंग्रेजो की पराधीनता को युगों से झेलती आ रही जनता ने लोकतंत्र के आह्वान पर चुनौती दे डाली। उन्हें यह विश्वास था कि लोकतंत्र का सवेरा उनके लिए एक नया सर्वोदय लेकर आएगा। लेकिन लोकतंत्र के व्यापक विस्तार के दौरान ही जनता के समक्ष सच्चाई खुलने लगी कि लोकतंत्र भी अफसरों-नेताओं और पूंजीपतियों के हितसाधक ही प्रमाणित हुई है। यहां भी जनता को उसी तरह ठगा गया है जैसे पहले ठगा जाता रहा था। इस मोह भंग की स्थिति ने रघुवीर सहाय जैसे कवियों के कलम को धार दिया जिससे वे सीधे-सीधे लोकतंत्र को चुनौती दे डालते हैं।
‘आजादी’ मिली। देश में 'लोकतंत्र’ आया। लेकिन इस लोकतंत्र के पिछले पाँच दशकों में उसका सर्जन करनेवाले मतदाता का जीवन लगभग असम्भव हो गया। रघुवीर सहाय भारतीय लोकतंत्र की विसंगतियों के बीच मरते हुए इसी बहुसंख्यक मतदाता के प्रतिनिधि कवि हैं।’  (- प्रतिनिधि कविताएं -रघुवीर सहाय, राजकमल प्रकाशन.)
खाज में दुर्गंध यह की स्थिति चाहे जैसी भी हो उसे चुपचाप सहते जाओ। जब तक चुप हो, लाचार बने हो, जिन्दा हो। मुंह खोले और मारे जाने का भय है। जैसे ही मुंह खुली कि आंदोलन को राष्ट्रद्रोह के रूप में ढाल दिया जाएगा और आवाज उठाने वाले से जीने का अधिकार, कानून छीन लेगी।
‘वे मेरे शब्दों की ताक में बैठे हैं
जहां सुना नहीं उनका गलत अर्थ लिया
और मुझे मारा।’ (- दो अर्थ का भय.)
कुछ भय और कुछ नाकारापन ने लोगों को इस कदर भयाक्रांत कर रखा है कि वे शोषण को हर रूप में स्वीकार कर बैठते हैं। जनता सदैव कुनीतियों की शिकार होती है। हर आंदोलन के बाद एक नए चेहरे का निर्माण होता है जो पुनः नए सिरे से शोषण का कार्य आरंभ करता है। लेकिन जब तक शोषक अपनी जड़ें जमाए हैं तब तक जनता को भी अपने भीतर की छटपटाहट जिलाए रखनी होगी। लोगों ने मुट्ठी कसने के बजाय हाथ फैला दिए हैं, नतीजतन शासन उसे कमजोर और काहिल समझकर मनमानी पर उतर आई है। रघुवीर सहाय की कविता उन लोगों को प्रताड़ित करती है जो शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने के बजाय केवल उसकी शिकायत करते रहते हैं। शोषण का रोना रोते हैं और चुपचाप सह जाते हैं। देश को बड़ा खतरा उन लोगों से है जो भ्रष्टाचार को कोसते हैं, भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनता की विश्वास अर्जित करते हैं, और अवसर पाते ही खुद भ्रष्टाचार में संलिप्त हो जाते हैं।
‘सब के सब हैं भ्रष्टाचारी
कह कर आप हँसे
चारों ओर बड़ी लाचारी
कह कर आप हँसे।’ (-आपकी हंसी.)
ऐसा व्यक्ति कभी जन सुधार नहीं कर सकता है जो लाचारी की गीत गाया करता है लेकिन व्यवस्था में परिवर्तन लाने को सार्थक प्रयास नहीं करता। शोषितों के ह्रदय में इसी आग को जलाए रखने का प्रयास करते हुए ‘दुष्यंत कुमार’ ने लिखा था- ‘हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।’ लेकिन विडंबना यह है कि लोगों ने आपस में एक होकर जनाक्रोश भड़काने के बजाय व्यवस्था के आगे समर्पण कर दिया है। जब किसी गरीब पर ताकतवर का जुर्म होता है तब लोग तमाशाबीन बने रहते हैं, कोई मिल कर आवाज नहीं उठाता। यहां तक खुद वह व्यक्ति भी जिस पर अत्याचार हो रहा है, अत्याचार सहना कमजोरों की नियति मान बैठता है और अत्याचार हँस कर सह जाता है।
‘और ऐसे मौकों पर हँसो
जो कि अनिवार्य हो
जैसे गरीब पर किसी ताकतवर की मार।’ (- हँसो हँसो जल्दी हँसो.)
रघुवीर सहाय के रिपोर्टर निगाह ने जान लिया था कि कत्ल, कातिल और पुलिस तीनों कड़ी के रूप में जुड़े रहते हैं। मरने वाला जानता है उसने जीने की आवाज बुलंद की है इसलिए वह मारा जाएगा, कातिल उसकी टोह में रहता है और पुलिस वारदात के हो जाने की राह देखती है। कत्ल के बाद लोग उसे (पुलिस को) कत्ल की सूचना देते हैं जिसे पहले से पता था कि हत्या होगी।
‘लोग निडर उस जगह खड़े रह
लगे बुलाने उन्हें जिन्हें संशय था हत्या होगी।’ (- रामदास.)
रघुवीर सहाय न सिर्फ पुलिस की सच्चाई बयान करते हैं बल्कि यह भी दिखला देते हैं कि सभी सरकारी दफ्तरें, नेताओं-मंत्रियों के इशारों पर ही काम करती है। सभी की प्राथमिकता मंत्रियों को खुश रखने की है। जनता को यदि अपना हक़ चाहिए, जिंदगी चाहिए, यहां तक कि हवा-पानी भी चाहिए तो वह मंत्रियों-अफसरों को प्रसन्न करे।
‘दर्द, खैराती अस्पताल में डॉक्टर ने कहा वह मेरा काम नहीं
 वह मुसद्दी का है
वही भेजता है मुझे लिखकर इसे अच्छा करो
जो तुम बीमार हो तो उसे खुश करो।’
यह मुसद्दी देश का नेता है। यह जिस पर खुश हो उसके बारे-न्यारे हैं, जिस पर खफा है उसे बीमार बना कर छोड़ेगा।
 आजादी के बाद से लगातार दुहराए जा रहे झूठे आश्वासन धीरे-धीरे दम तोड़ने लगी। लोग उस वायदे के खोखलेपन को महसूस करने लगें। रघुवीर सहाय की कविता नेताओं के भाषण के पीछे छुपे उस हकीकत को खोज लाती है जिसे लोग समझ नहीं पा रहे थे। बारंबार जो जुमले अपनाए जा रहे थे उससे जनता को आगाह करने का काम कवि अपनी कविता में करते निरंतर दिख पड़ते हैं। जनता को आश्वासन दिया जाता है,
‘हमने बहुत किया है
पर अभी और करना है।’  (-राष्ट्रीय प्रतिज्ञा.)
इस आश्वासन की हकीकत भी वहीं कविता में अंकित है-
 ‘और हमसे लोग अगर कहेंगे कुछ करने को
  तो वह तो कभी नहीं करेंगे।’ (-राष्ट्रीय प्रतिज्ञा.)
यहां अधिकांश नेता अफसर ऐसे ही हैं जो जनता को लूटने में अपनी शक्ति का प्रयोग करते हैं। कुछ ऐसे हैं भी जो वास्तव में कुछ सार्थक करना चाहते हैं तो उनके आसपास चापलूसों की ऐसी भीड़ जमा रहती है जो उन्हें यथार्थ से रू-ब-रू ही नहीं होने देते।
‘सभा में विराजे हैं बुद्धिमान
वे अभी राजा से तर्क करने को हैं
आज कार्य सूची के अनुसार।’  ( -दो अर्थ का भय.)
सड़क पर नेताओं की सवारी निकलने से घंटों पहले सड़क खाली करवा दी जाती है। उनके सामने सिर्फ उन्हें लाया जाता है जिनकी पेट भरी हो, चेहरे पर खुशामदी चमक हो। इन्हें देखकर नेताओं को यही महसूस होता है कि हर ओर खुशहाली है। नेताओं के चमचे उसे सच्चाई तक पहुंचने नहीं देते और जनता को पुलिस अपनी लाठी के जोर पर पिछले सिरे पर रोके रहती है।
‘राजा ने जनता को बरसों से देखा नहीं
यह राजा जनता की कमजोरी न जान सके इसलिए मैं
 जनता के क्लेस का वर्णन करूंगा नहीं इस दरबार में।  (-दो अर्थ का भय.)
रघुवीर सहाय का व्यंग्य बड़ा ही चुटीला है। वे ऐसे लोगों पर प्रहार करते हैं जो व्यवस्था को लेकर केवल चिंता करते हैं, कुछ करने को आगे नहीं बढ़ते। किसी भी समस्या का समाधान केवल विचारते रहने से नहीं मिलता है। उसके लिए संघर्ष करना पड़ता है। भ्रष्टाचार, कुव्यवस्था, अत्याचार आदि पर केवल टिप्पणी करने वालों के रघुवीर सहाय कड़े आलोचक थे। उन पर प्रहार करने के लिए उन्होंने व्यंग्य का सहारा लिया।
‘हरदम सोचते रहना किसी की शुद्धता उत्कृष्टता का नहीं लक्षण है
गधा भी सोचता है घास पर चुपचाप एकाकी प्रतिष्ठित हो
कि इतनी घास कैसे खा सकूंगा
और दुबला हुआ करता है।’ ( -सोचने का परिणाम.)
रघुवीर सहाय ने अपनी कविताओं में नेताओं, मंत्रियों, अफसरों, कोरे चिंतकों की पोल खोली है और इसके लिए व्यंग से बड़ा हथियार कुछ हो ही नहीं सकता है। डॉ. बच्चन सिंह ने लिखा है,
“नेता, मंत्री, लोकतंत्र, राष्ट्रगीत, मतदाता आदि के चतुर्दिक लिखी हुई कविताओं के लिए आवश्यक था कि वे व्यंग्यात्मक होतीं।” (-आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास, बच्चन सिंह.)
               लोकतांत्रिक व्यवस्था में जिस शब्द ने जनता को सबसे ज्यादा चोटिल किया है, वह है- समाजवाद। स्वाधीनता आंदोलन के दिनों से ही समाजवाद का नारा बुलंद कर लोगों को सुख-स्वप्न की ओर आकर्षित किया जा रहा था। भारत में एक ऐसे साम्यवाद की परिकल्पना थी जहां सभी को समान अवसर प्राप्त होना था। पूंजी का विभाजन किया जाना था। श्रमिकों को उसका हिस्सा मिलना था। शोषण का दौर समाप्त किया जाना था, आदि... आदि अनेक स्वप्न थे, जो वास्तव में स्वप्न ही प्रमाणित हुए। स्वतंत्र भारत के नेताओं ने ऐसा साम्यवाद लाया की देश के नब्बे प्रतिशत पूंजी पर मात्र दो प्रतिशत लोगों का स्वामित्व स्थापित हुआ। जनसंख्या का एक बड़ा भाग आजादी के इतने वर्ष बाद भी भूख और बेरोजगारी से त्रस्त है।
 ‘यह महज सुनने में लगता है साम्यवाद/ हम अपने घोड़े को इंसान भी समझे/ खासतौर से जब वह सचमुच इंसान हो।’ (- साइकिल रिक्शा).
रघुवीर सहाय आक्रोशित हो उठते हैं कि वर्षों तक जनता को लोकतंत्र, साम्यवाद, स्वशासन आदि के नाम पर ठगा जाता रहा है। यह दौर यहीं समाप्त नहीं हो रही है बार-बार ठगने के बावजूद यह नेता फिर जनता के दरवाजे पर जाएंगे और यह जानते हुए कि मैंने इसे अब तक झांसे में रखा है उन्हें विश्वास करने को कहेंगे।
‘टूटते-टूटते/ जिस जगह आकर विश्वास हो जाएगा कि/ बीस साल/ धोखा दिया गया/ वहीं मुझे फिर से कहा जाएगा विश्वास करने को।’  (- एक अधेड़ भारतीय आत्मा).
लोगों को धोखा देने के लिए इन नेताओं ने अलग-अलग पार्टियां बना रखी है, प्रत्यक्ष तौर पर एक दूसरे की नीति का विरोध करते हैं, सरकार में आने के लिए जनता को विकास का लोभ दिखाते हैं किंतु बात जब स्वार्थ की आती है तो आपस में मिलजुल कर जनता को नोच खाते हैं। देश को बेचने पर आमादा हो जाते हैं।
‘पांच दल आपस में समझौता किए हुए/ बड़े-बड़े लटके हुए स्तन हिलाते हुए/ जांघ ठोक कर एक बहुत दूर की विदेश नीति पर/ हौंकते डौंकते हुए मुंह नोच लेते हैं/ अपने मतदाता का।’
 रघुवीर सहाय की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे इतने मात्र से ही संतुष्ट नहीं हो जाते हैं कि उन्होंने राजनीतिक कुचक्र का पर्दाफाश कर दिया है। वे जनता के उस कृत्य तक जाने का भी जोखिम उठाते हैं जहां जनता खुद अनीति की मार्ग पर चल रही है या उसका समर्थन कर रही है।
‘हर एक हत्या में, पक्ष किसका लेंगे/ तय किया करते हैं उस समय/ जबकि हत्यारे को पहचान लेते हैं/ वे हर जमाने में सफल व्यक्ति होते हैं/ जो कि पक्ष लेने से पहले तय करते हैं/ किसको हत्यारा बताने में लाभ है।’
       रघुवीर सहाय की कविता स्वतंत्रता के बाद की राजनीतिक स्थिति की गहरी छानबीन करती है और पाठकों को यथार्थ बोध कराती है। रघुवीर सहाय बिना किसी प्रकार की रहम के लोकतांत्रिक व्यवस्था के झूठे ढ़कोसलों पर प्रहार करते हैं। वे इकलौते ऐसे कवि हैं जिन्होंने राष्ट्रगीत, राष्ट्रध्वज, संविधान, लोकतंत्र, मतदान, मतदाता, राजनीति, समाजवाद, पूंजीवाद, जैसे व्यापक विषयों पर कविताएं लिखी है।

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