मधुकर सिंह की कहानियों में वर्ग-संघर्ष (आलेख)



मधुकर सिंह की कहानियों में वर्ग-संघर्ष ।
                    - सीमा कुमारी
           

बिहार के सृजनशील भूमि से निरंतर हिंदी साहित्य को समृद्ध की जाती रही है। इसी क्रम में एक नाम आता है कथाकार मधुकर सिंह का। वे अपने लेखन संसार में सदैव शोषितों के साथ खड़े रहे हैं। अपनी कहानियों में वे वंचितोंश्रमिकों तथा मजदूरों की आवाज बुलंद करते रहे हैं। मधुकर सिंह ने अपने सृजन-कार्य की प्रतिबद्धता घोषित करते हुए कहा है,
मेरे जैसे रचनाकार को रचना से अलग हो जाना चाहिए या उन संघर्षशील तबकों और संगठनों से जुड़ जाना चाहिए जो रोटी और स्मिता की लड़ाई बड़ी हिम्मत से लड़ रहे हैं।
 मधुकर सिंह की प्रतिबद्धता नागार्जुन की प्रतिबद्धता की तरह ही है जिसमें नागार्जुन कहते हैं,
प्रतिबद्ध हूँजी हाँप्रतिबंध हूँ
बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त।
मधुकर सिंह अपनी रचनाओं में पूंजीवादजातिवादभ्रष्टाचारराजनैतिक-अफसरशाही अराजकताआदि पर कठोर प्रहार करते रहे हैं। उन्होंने देखा कि राजनीतिक आजादी की जो छवि दिखलाई जा रही है वह पूरी तरह छलावा मात्र हैनेताअफसर सभी पूंजीपतियों के पोषक मात्र हैंजो आपस में मिलकर मजदूरों-श्रमिकों का रक्त चूसते हैं। आजाद भारत में बनने वाली पहली सरकार कांग्रेस हो या उसे विस्थापित करके आई हुई जनता पार्टी की सरकार हो सभी पूंजीपतियों की शुभेच्छु हैं। यही कारण है कि मधुकर सिंह का झुकाव मार्क्सवाद की ओर निरंतर बना रहा। कहानी आंदोलनों के तहत भी उनका जुड़ाव प्राय: उन्हीं कहानी आंदोलनों से रहा जो सर्वहारा वर्ग के साथ खड़ा दिखा। इसी क्रम में उनका लगाव समांतर कहानी आंदोलन’ से रहा। आगे चलकर जब वे यह महसूस करते हैं कि इस आंदोलन में सामान्य-जन को केंद्र में लाने के बहाने लेखकों का ध्यान श्रमिक वर्ग से भटकाया जा रहा हैतब वे जनवादी कहानी आंदोलन का मार्ग प्रशस्त करते हैं। यहां उनके लेखन के केंद्र में वर्ग-आधार विहीनआम आदमी (शोषित आदमी) के स्थान पर शोषित वर्ग को उभरते स्पष्ट देखा जा सकता है। उल्लेखनीय है कि मधुकर सिंह के पात्र शोषित और कमजोर हैं लेकिन टूटे हुए नहीं हैंवे पूरी शक्ति से व्यवस्था के समक्ष सीना ताने खड़े हैं। उन्होंने ऐसे पात्रों को उभारा है जो संघर्षशील एवं जुझारू हैं। मधुकर सिंह उन लेखकों से नितांत भिन्न हैं जो दलितों-पिछड़ों और श्रमिकों पर की जा रही क्रूरता को चित्रित करने मात्र को ही लेखन-कर्म मान लेते हैं। मधुकर सिंह ने उस क्रूरता का चित्रण करने के साथ ही नई पीढ़ी को अन्याय के विरुद्ध खड़ा करने का प्रयास भी जारी रखा 
नगीना राम और भैरव तिरपाठी बहुत ऊंचे तूफान को सीने के अंदर रोककर गांव के किनारे पर रुके हुए थे।
हिंदुस्तान को अंग्रेजों से जो आजादी मिली उससे शोषणकर्ता का चेहरा मात्र बदला जनता की स्थिति जस-की-तस बनी रही। सरकार का काम केवल अपना घर भरने तक सीमित रहा। अंधी सरकार की पूरक गूंगे अफसर बनें और अफसरों को राह दिखलाने का जिम्मा उन बहरे सामंतों को मिला जो जनता की कराह सुनना नापसंद करते थे। अब इन सामंतों के हाथों में थाजिसे चाहे नक्सलाइट साबित कर देजिसे चाहे जेल करवा देजिसे चाहे गोली मरवा दे।
 “मिसिर जी जिस-तिज को समझाते हैंजो धर्मपरंपरा और बड़े-छोटे के भेद को नकारता हैवही नक्सलाइट है।
जो व्यक्ति परंपरा से चली आ रही शोषण-व्यवस्थावर्ण-व्यवस्थाऊंच-नीच जैसे घिनौने बंधनों को तोड़ने का प्रयास करताउसे नक्सलाइट घोषित कर दिया जाता है। सामंतों का दुस्साहस इतना बढ़ चला कि जातिधर्म के नाम पर सवर्णों को इकट्ठा कर दलितों की अस्मत से खिलवाड़ करतें हैंउस की बस्ती को आग लगा देते हैं और उसी आग में अपनी अस्मिता के लिए लड़ने वालों को जिंदा जला दिया करते हैं। समाज चुपचाप नपुंसक बना देखता रहता है। इस स्थिति में नेताअफसरपुलिसभले ही मूक बने रहते हैं लेकिन जनकवि और जनवादी लेखकों की कलम अंधी बनी नहीं रह सकती है। नागार्जुन ने हरिजन गाथा’ में लिखा है,
 “ऐसा तो कभी नहीं हुआ था कि
एक नहींदो नहींतीन नहीं-
तेरह के तेरह अभागे-
अकिंचन मनुपुत्र
जिंदा झोंक दिए गए हों
प्रचंड अग्नि की विकराल लपटों में
साधन-संपन्न ऊंची जातियों वाले
सौ-सौ मनुपुत्रों द्वारा।
ठीक यही भाव मधुकर सिंह की कहानी लहू पुकारे आदमी’ में प्रकट होती है जब भैरव त्रिपाठी और नगीना राम से शिकस्त पाकर कैलास पूरे दलित बस्ती को आग लगवा देता है।
वे लोग जब गांव पहुंचे तो मुसहर टोली में आग लगी हुई थी और तमाम बच्चेऔरतेंमर्द चिल्लाते हुए गांव छोड़कर भाग रहे थे।
मुसीबत यह थी कि जाति-व्यवस्था की शोषण-नीति राजनैतिक और पूंजीवादी शोषण-व्यवस्था से भी अधिक घातक थी। स्वर्णदलितों को दबाते थेंदलित भी अपने में जातिउपजाति का निर्माण कर अपनी श्रेष्ठता दिखलाने में लगे थे। इसका परिणाम यह निकला कि श्रमिकों की शक्ति का बंटवारा हो गया और वे संगठित नहीं हो सके। इसी के मद्देनजर मार्क्स ने पूरे संसार को सिर्फ दो जाति में बांटा था- पूंजीपति और श्रमिकशोषक और शोषित। इसी सिद्धांत का पोषण मधुकर सिंह ने अपनी रचनाओं में की है,
गजब चलन है हमारे समाज में। रोटी की असमानता की फ़िक्र नहीं हैसमाज को जाति की असमानता के प्रति लगाव है। 
महात्मा गांधी के आंदोलन के परिणामस्वरूप अनेक ऐसे लोग उभर कर आएं जो खादी पहननागांधीजी के रास्ते पर चलने का ढोंग करनाशुरू कर चुके थे। उनका मकसद गांधी जी की छवि धारण कर अपने आप को देश के उद्धारकर्ताओं में नामित करना था। इन लोगों ने ऊपरी तौर पर वे तौर-तरीकें तो धारण कर लिया हैं जो गांधी जी ने बतलाया था लेकिन इनका मनअंदर से अब भी वैसे ही काला का काला है। उनके अंतरात्मा में किसी तरह की परिशुद्ध नहीं हुई। मधुकर सिंह की कहानियों में ऐसे पात्रों की भरमार है जो आजादी के बाद की इन  कुव्यवस्थाओं का चित्र अंकित करते हैं। गांधी जी ने हरिजन सेवा का जो आंदोलन चलाया थाइक्कीस दिनों तक अनशन किया थाउसे भी एक झंडे के रूप में इस्तेमाल कर लोगों ने गांधी का नाम लेकरअपना उल्लू सीधा करना शुरू किया। ऐसे हरिजन सेवकों की बाढ़ सी आ गई जो अपने आप को हरिजन सेवक के रूप में स्थापित कर गांधीवाद का नारा बुलंद कर रहे थे और अपने आडंबर में इस तरह से लिपटे थे कि हरिजन का छुआ पानी तक पीना उन्हें नागवार गुजरता था।
वे हरिजनों और जुलाहों का छुआ पानी तक नहीं पीते थे। इसलिए डर भी लगता कि नाराज न हो जाएं और स्कूल से निकालना न दें।
ऐसे रामशरण लालजी’ मास्टरों का पूरे देश में चलन बढ़ता जा रहा है। वे गांधीवाद के चोले को धारण कर उन्हीं सामंतवादी परंपराओं का निर्वाह कर रहे थेंजिससे भागते भागते समाज आजादी की ओर अग्रसर हुआ था और यह कथित आजादी प्राप्त हुई थी। अनेक दलित लेखकों की आत्मकथाओं में तथा कई स्वर्ण लेखकों की रचनाओं में भी दलितों की पीड़ा को मुखर आवाज मिली है। मधुकर सिंह भी इस समस्या को उठाते हैं कि सामंत या उन्हीं का ढोंगी रूप धारण किए गांधीवादीसभी अपनी परंपरा से गहरा लगाव रखते हैंजाती-पाती के भेद को बनाए रखना चाहते हैं। दलितोंद्धार के नाम पर भी दलितों को उसी तरह छुआछूत के दायरे में बांधे रखना चाहते हैं और दलित स्त्रियों की अस्मत से खिलवाड़ करना अपना शौक समझते हैं। जिसके हाथ का छुआ पानी पीने से इनकी जाति चली जाती है उनकी स्त्रियों के साथ खिलवाड़ करने से इन्हें कोई आपत्ति नहीं है। उस वक्त इनकी जाति को किसी तरह का दाग नहीं लगता है।
पानी और शरीर में अंतर होता है चेला। जब सयाने होंगे तब इसके अंतर को समझोगे। 
बरसों से अपनी बहू-बेटियों के साथ होने वाली बदसलूकी को, जो हरिजन चुपचाप से अपनी नियति मान कर सहते जा रहे थेउनकी युवा पीढ़ी अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए तैयार होने लगी।
हमारी औरतों की आबरू भी उन्हीं की मर्जी पर है। इधर कुछ दिनों से हमारी जुबान खुलने लगी है।१०
लेकिन सामंतवादियों कोहरिजनों के द्वारा अपने अस्मिता का प्रश्न उठाना नागवार गुजरता था। वे चाहते थे कि जैसे ये पूर्व में इनकी हरकतों को सहते आ रहे थे वैसे ही अब भी चुपचाप सहते रहें। मधुकर सिंह ऐसे संघर्षशील पात्रों को उभारते हैं जो अपनी रोटी और अस्मिता के लिए जुझते हुए प्राण देने पर उतारू हो चला है। उनके संघर्ष का परिणाम उन्हें तरह-तरह से परेशान करके चुकाया जाता है। सामंतों के हथियार के रूप में आजादी के बाद पुलिसअफसरसभी उभर चुके थें। ये सभी एकमत होकर सामंत और पूंजीवादियों से सांठगांठ रखते थें और मौका पड़ने पर इनके विरुद्ध उठने वाली आवाज को नाजायज तरीकों से दबाते रहते थें।
दुसाध टोली में एक रात किसी ने बम फेंक दिया और पुलिस में खबर चली गई कि दुसाध टोली में बम भी बनते हैंबम के फटने से दुसाध टोली में ही धमाका हुआ है।११
अब जिस पक्ष में नेतापुलिसअफसरपूंजीपतिसामंतसभी खड़े थें उस पक्ष के विरुद्ध जाकर सामान्य-जन की आवाज को अखबार में उठाने से किसी अखबार वाले को क्या लाभ था। उन्हें भी तो अपनी रोटी सेंकनी थी। इसलिए अख़बार और तमाम खबर से जुड़ें तंत्रों का जुड़ाव भी उनसे होता चला गया। जो शोषित था उसके पास तो पहले से ही खाने के लाले पड़े हुए थे वहां इनका क्या भला होता। इन्होंने अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए उसी राग में स्वर मिलाना शुरू किया जो बहुजन समाज के विरोधियों का था।
 अखबारों में समाचार जोरदार शब्दों में आया कि इस जिले में नक्सलपंथियों का अड्डा है। हमारा माथा फटता जा रहा थायह नक्सलपंथ क्या होता है ?”१२.
यह कितनी बड़ी विडंबना है कि जिनको किसी पंथसंप्रदाय से मतलब नहीं थाजो अपने जीवन की गरीबी से जूझ रहे थेजिसे अपने पेट की रोटी और तन ढ़कने को वस्त्र के अलावे और कुछ सोचने का मौका नहीं मिलताउसे न जानेनक्सलपंथनक्सलाइटआतंकवादीलुटेरे क्या-क्या संज्ञा दी जाती रही है। समाज में जब इस तरह की घटनाओं की आवाज थोड़ी बुलंद होती है तब सरकारी तंत्र कुछ सुगबुगाते हुई झूठे जांच का स्वांग भरता है। चुनाव के दिनों में वादों की आवाज बुलंद होती है क्योंकि इन दलितों में राजनेताओं को और कुछ दिखे या न दिखें अपना वोट जरुर दिखता है। अपने दल-बल के साथ वे चुनावी-गर्मी में इनके साथ सामिल होने का ढोंग रचते हैं। विपक्षी दलसत्ता पक्ष पर कीचड़ उछालते हुए शोषितों के हमदर्द बनने का कोशिश करते हैं और सत्ता पक्ष वाले विपक्षियों पर आरोप लगाते हैं। आरोप-प्रत्यारोप का यह दौर चलता रहता है और पूंजीपतियों का वर्चस्व दिन-प्रतिदिन कायम होता जाता है। शोषित उसी तरह अपनी गरीबी और जीवन की आम समस्याओं से टकराते रहने को विवश हैं। लेकिन मधुकर सिंह जैसे रचनाकारों के बदौलत लोगों को वह निगाह मिलने लगी थी जिससे वे इन नेताओं की हकीकत पहचानने लगे थे।
जनता की परेशानी बढ़ती जा रही थी। वह चीख पड़ी- यह तुम दोनों की मिली-जुली लाश हैतुम दोनों की।१३
यहां यह चीख-पुकार उन लोगों के हृदय की ज्वाला है जो निरंतर नेताओं और पूंजीपतियों के द्वारा रौंदे जाते रहे हैं। मधुकर सिंह अपनी कहानियों में अत्याचार को चुपचाप चित्रित कर वहां से खिसकने का प्रयास नहीं करते हैं बल्कि वे अपने पात्रों को अत्याचार से जूझने काउसके विरुद्ध खड़ा होने का सबक भी देते हैं। वे वैसे रचनाकारों में हैं जो जीवन की समस्याओं कोकोरे कल्पनाओं के रूप में कल्पित करने के बजायजीवन के यथार्थ से उठाते हैं। उसे चित्रित करते हैं और अपने कर्म से उन्हें प्राणवान भी बनाते हैं। मधुकर सिंह की कहानियों की पृष्ठभूमि पर चर्चा करते हुए अशोक कुमार सिन्हा ने लिखा हैउनके सामने केवल दलितशोषित किसानों के तबके थे। उनकी पीड़ा और आत्म-संघर्ष को भाषा प्रदान करने में ये अकेले थे- कोशी के घटवारों की कहानी के बाद।१४
वैसे तो मधुकर सिंह की कहानियों का फलक बहुआयामी है लेकिन जिस प्रकार प्रेमचंद का कथानक घूम-फिर कर ग्रामीण पात्रों को गढ़ने में ही रमता है उसी तरह मधुकर सिंह का कथानक भी ग्रामीण परिवेश की समस्याओं को उभारने में ही तल्लीन रहा है। उनकी कहानियां ग्रामीण पात्रों के संघर्षों का जीवंत दस्तावेज के रूप में जानी जाती है। अशोक कुमार सिन्हा ने कहा भी है कि मधुकर सिंह ने लगभग 110 कहानियां लिखी है जिसमें एक दर्जन कहानियों को छोड़ दिया जाए तो बाकी की सभी कहानियां भोजपुर के ग्राम अंचल के संघर्ष को दर्शाने वाली कहानियों में ही शुमार है।’ मधुकर सिंह की कहानियों की समीक्षा करते हुए हिंदी कहानी का विकास’ पुस्तक में वरिष्ठ आलोचक मधुरेश ने लिखा है,
 उनकी कहानियों में अकालभ्रष्टाचारशिक्षित बेरोजगारीराजनीतिक मूल्य-मूढ़ता और नैतिक स्खलन के संदर्भों की बहुलता किसी को भी आकृष्ट कर सकती है।१५
स्वतंत्रता के बाद पूंजीपतियों और श्रमिकों की खाई मिटने के बजाय और अधिक गहरी होती गई। मार्क्सवाद के प्रचार के कारण लोगों के बीच यह तथ्य पूरी तरह से प्रचारित हो चुका था कि शोषकों की और कोई जाति नहीं है; उसको केवल शोषक के रूप में देखना है, भले ही वह किसी भी जाति का हो। दलितों के बीच से अनगिनत नेताओं ने जन्म लिया जो राजनीति में प्रवेश तो करते हैं दलितों के मसीहा के रूप में लेकिन वहां पहुंचकर सामंतवादी-पूंजीपतियों से सांठगांठ कर अपना पेट भरने में लीन हो जाते हैं। मधुकर सिंह के सामने यह तथ्य था कि भारत के तकरीबन तमाम राज्यों में (उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, हर जगह) दलित वर्ग के नेताओं को बड़ा-बड़ा मंत्रीपद प्राप्त हुआ लेकिन उन नेताओं ने देश या राज्य का विकास तो दूर अपने वर्ग(समाज) का विकास भी नहीं किया। वह भी शोषक बनकर अपना पूंजी बनाने और अपनी तिजोरी भरने में लीन हो गया। इस तथ्य को मधुकर सिंह ने अपने दुश्मनशीर्षक कहानी में बड़े मनोयोग से चित्रित किया है। हरिजन, जगेश्वर जब मंत्री बनता है तब वह अपने गांव के सामंत माधो ठाकुर के घर उठना-बैठना शुरू करता है, वहीं भोजन ग्रहण करता है और अपने लोगों के बीच रहना उसे अपनी तौहीन लगती है। परिस्थिति यह है कि, भले जगेश्वर जन्म से हरिजन था जिसे सामंतों के द्वारा दलित किया जा रहा था लेकिन अब वह पूंजीपति बन चुका है और पूंजीपतियों ने अपने संसार में गर्मजोशी से उसका स्वागत किया है। ऐसे लोगों को चिन्हित करते हुए मधुकर सिंह कहते हैं कि ये दलित पूंजीपति भी दलितों का दुश्मन ही है। वह जाति से सगा होने के कारण दलितों का सगा नहीं हो सकता। उसे दुश्मन के रूप में चिन्हित कर उसके विरुद्ध भी संघर्ष जारी रखना होगा। भीखम ने उन्हें ललकारा, दुश्मन के लिए हमें इतना मोह क्यों है ? जो दुश्मन होगा वही हमारे साथ नहीं खाएगा।१६
जाति प्रथा के इस घिनौने खेल में सवर्णों के द्वारा दलितों को दमित तो किया ही जाता रहा है, वे अपने कुटिल बुद्धि से दलितों को आपस में एक दूसरे के विरुद्ध भी भड़काते रहते थे। अनपढ़, अशिक्षित दलित इस बात को भूल कर कि हम सभी शोषित हैं और हमें एक दूसरे का सहारा बनना चाहिए, अपने नीचे किसी जाति को घोषित कर उसका शोषण करना शुरू कर देते हैं। शोषित जाति फिर अपने नीचे किसी जाति का शोषण शुरू करती है और इसी तरह शोषण का यह दौर एक चक्र की तरह चलता रहता है। चमार, मुसहर, डोम सभी एक दूसरे से घृणा ही करते हैं। उन्हें इस बात को लेकर कोई चिंता नहीं है कि आपस में उनकी घृणा को सामंत उनके विरुद्ध कैसे इस्तेमाल करते हैं। पांडे जी चमारों की कान खड़े किए रहते हैं कि,
भीतर भीतर अपनी लड़ाई मुसहर टोली के खिलाफ तेज रखो- मुसहर तुमसे छोटी जाति का है।१७
यह समस्या तो जाति व्यवस्था को लेकर उत्पन्न की गई थी लेकिन एक जाति के भीतर भी समानता का भाव नहीं है। ऐसे लोग जिनके पास पूंजी केंद्रीत है वे नहीं चाहते हैं कि समाज में कभी भी समाजवाद का उदय हो। वे सदैव समाज को उसी धूरी पर चलाते रहना चाहते हैं जिसमें उसे निचले तबकों का शोषण करने का अधिकार मिला हुआ है। उसकी पूंजी अक्षुण्ण बनी रहे इसके लिए वे साम्यवाद को नकारते रहे हैं। आजादी के बाद कांग्रेस, एक ओर समाजवाद का नारा बुलंद करती रही दूसरी ओर पूंजीपतियों का साथ देती रही। न उन्होंने जाति प्रथा का विरोध करना उचित समझा न ही पूंजी के बंटवारे से उनका कोई मतलब था। वे तो खुद पूंजी और स्वामित्व के नशे में चूर थे।
जागा पांडे के बाप ने विद्रोही युवकों को समझाया कि इंदिरा जी का समाजवाद बढ़ा अहिंसक है, किसी का भी दिल दुखाने की बात नहीं है। सरकार किसी की जमीन नहीं लेगी, जो शास्त्र, परंपरा के अनुसार चलती रही है वह चलती जाएगी।१८
अपने लेखन-संसार में विचरण करते हुए मधुकर सिंह के समक्ष कथानक के रूप में अनेक समस्याएं आती गई और उन्होंने हर समस्या पर निर्भीक होकर रचना की और समाज को एक नई दिशा प्रदान करने की कोशिश की। उनकी नजर में यह सच्चाई आते देर नहीं लगी कि स्वर्ण में भी सभी सुखी संपन्न नहीं हैं। ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो जाति से स्वर्ण होने के कारण प्रतिष्ठित तो है लेकिन भीतर ही भीतर गरीबी से उनकी स्थिति काफी नाजुक हो गई है। वह भी पूंजीपतियों के द्वारा शोषित किए जा रहे हैं। ऐसे लोगों के प्रति भी कहानीकार अपनी कहानियों में संवेदना का भाव प्रकट करते हैं।
जागा पांडे के बाप की केवल पच्चीस एकड़ धरती है, मगर तिरपाठी जी के पास एक इंच भी नहीं है।१९ 

संदर्भ सूची:
1. ‘भाई का जख्मसंग्रह की भूमिका से.
2. ‘प्रतिबद्ध हूँ’- नागार्जुन.
3. ‘लहू पुकारे आदमी’- मधुकर सिंह.
4. ‘रामरतन मास्टर’- मधुकर सिंह.
5. ‘हरिजन गाथा’- नागार्जुन.
6. ‘लहू पुकारे आदमी’- मधुकर सिंह.
7. ‘रामरतन मास्टर’- मधुकर सिंह.
8. ‘हरिजन सेवक’- मधुकर सिंह.
9. वहीं.
10. वहीं.
11. वहीं.
12. वहीं.
13. ‘लाश’- मधुकर सिंह.
14. ‘मधुकर सिंहपहचान और परख’- अशोक कुमार सिन्हापृष्ठ- 129-30.
15.’ हिंदी कहानी का विकास’, मधुरेश, पृष्ठ-172
16. ‘दुश्मन’- मधुकर सिंह।
17.  ‘लहू पुकारे आदमी’- मधुकर सिंह.
18. वहीं।
19. वहीं।



- सीमा कुमारी
  अतिथि सहायक प्राध्यापिका, हिन्दी विभाग, बी.एस.एस.कॉलेज, सुपौल.
संपर्क- 8507474110
ई-मेल- sss2seema@gmail.com

( मधुकर सिंह के उपन्यास ‘बेनीमाधो तिवारी की पतोह’ का समीक्षात्मक लेख यहां पढ़ें-
https://kaviamitraju.blogspot.com/2019/04/blog-post_44.html


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

स्त्री अस्मिता और हिन्दी महाकाव्य (आलेख)

साहित्य की प्रासंगिकता. ( लेख.)

हिन्दी साहित्य में लघुमानव की अवधारणा, ( आलेख )