दो मौतें ( कहानी).
दो मौतें।
सर्दियों के मौसम में मैं साढ़े सात के पहले कभी उठा होऊं यह याद नहीं आता। आज छ: बजे से ही मन में कुछ अजीब सी बेचैनी महसूस हो रही थी। बहुत कोशिश की लेकिन नींद नहीं आई। उठकर बाहर आंगन में चला आया। पटना में और आंगन, है ना आश्चर्य वाली बात। किराए के कई मकानों में रहने के बाद मुझे यह मकान रहने को मिला जो मेरे मन के अनुकूल था। मकान काफी पुराना था, प्लास्टर झड़ने लगी थी, लेकिन मुझे पसंद आया। काफी छोटा सा घर, एक तल्ला, दो कमरे, एक छोटा रसोई, एक स्नानगृह, बाहर छोटा सा आंगन और आम का एक पेड़। किराया मैं देने में सक्षम था अतः आ बसा। बीच-बीच में परिजन भी आते-जाते रहते थे अधिकांश मैं अकेले ही रहता। आंगन में पेड़ होने के कारण गौरैया, कौवा, गिलहरी, दिनभर शोर मचाते। कभी-कभी इनके कोलाहल से मन खिझ उठता लेकिन मन शांत होने पर अच्छा लगता। मकान के ठीक पीछे एक खाली प्लॉट था जिसमें आस पड़ोस के सूखे कचरे फेंके जाते थे।
इन दिनों मेरे प्रेम का पात्र कौन-कौन था यह गौण है, प्रमुख यह है कि मेरे क्रोध के केंद्र में दो प्राणी थें, एक गिलहरी जो अपनी चोरी के कारस्तानी से बाज नहीं आती और सूखने को फैलाए मेरे कपड़ों से रेसे खींचती रहती। दूसरी दस-बारह वर्षीय एक लड़की, जो पीछे कचरे से कबाड़ी चुना करती। एक दिन आंगन में एक गेंद आ गिरा। दो दिनों तक जब कोई दावेदार नहीं आया तो मैंने वह गेंद पिछली खिड़की से उस लड़की को दे दी। मेरी इस गलती का परिणाम यह निकला कि पिछले तीन महीनों से जिस घर के दरवाजे पर कोई दस्तक नहीं पड़ी थी इस घटना के अगले दिन उस घर की पिछली खिड़की जोर-जोर से खटखटाई गई। मैंने खिड़की खोल कर देखा तो वह लड़की अपने सामान्य सौंदर्य के साथ साक्षात दर्शन दे रही थी। उसका रूप बिल्कुल वही था जो आपके आस-पास कबाड़ी चुननेवालियों का होता है। खिड़की खुलते ही वह बोली, ‘आपका दिया गेंद लड़कों ने मुझसे छीन लिया, आप दूसरा दे दीजिए।’ मैंने झल्ला कर कहा, “इतनी सुबह गेंद मांगने आई हो।” “मैं कल दिन में आई थी बहुत पीटने पर भी आप खिड़की नहीं खोलें।” तब मुझे पता चला कि यह लड़की मेरे बाहर रहने पर भी आ चुकी थी। उस वक्त मुझे कुछ और सो लेने की इच्छा सता रही थी। मैंने उसे पांच का एक सिक्का देकर गेंद खरीद लेने को कहा। मुझे याद आया कि रात का कुछ खाना बचा रह गया है जिसे फेंकने से मैं बच सकता हूं मैंने वह खाना उठाकर एक पेपर पर रखा और उसे दे दी। वह मेरी दूसरी गलती थी, जिसका खामियाजा भुगतना बाकी था। इन्हीं दिनों दुकान से लाते समय मेरी चावल की थैली फटी और कुछ चावल दरवाजे के पास फैल गएं। उस पर अपना अधिकार जान गिलहरी उन्हें चुन-चुन कर खाती रही और आगे बढ़ती रही। अनायास ही उसने खुद को घर के भीतर पाया, अब भीतर आ ही गई तो डरना कैसा ? उसने पूरे घर का भ्रमण कर यह निश्चित किया कि मेरा रसोई घर उसके काम की जगह है। बस इसके बाद दरवाजे पर गिलहरी और खिड़की पर वह लड़की कब आ धमके कुछ पता नहीं। मैं दोनों पर झल्लाता, चिल्लाता, मारने को उद्यत होता, लेकिन दोनों पर ही डांटने का कोई असर नहीं था और जब मारने जाता तब हाथ नहीं आती।
आज नौ बज गए लेकिन दरवाजे पर गिलहरी नहीं आई। अचानक ध्यान आया खिड़की खटखटाया जाने का समय भी कब का गुजर गया लेकिन आज वह लड़की भी नहीं आई। वह नित्यप्रति खाने की चीजों के तलाश में आती और खिड़की खटखटा कर मुझे परेशान करती। गिलहरी का आवास आंगन का पेड़ था। वह लड़की और उसकी मां ने थोड़ी दूर पर सड़क किनारे टीन, बोरी, कुछ बांस और फटे कपड़ों से छप्पर बना रखा था। एक दिन पैदल लौटते समय वह लड़की अपने घर के पास मिल गई और उसने मेरा परिचय जबरन अपनी मां से करवाया। वहां रुकने में मुझे घुटन हो रही थी लेकिन मैं अपनी भलमनसाहत दिख लाने का मौका नहीं चुकता। अतएव थोड़ी देर खड़ा रहा। बातों बातों में पता चला इन लोगों का एक कुनबा है जो कहीं खाली और गंदी जगह देखकर आश्रय जमाता है और कबाड़ी बेचने जैसे धंधों से भूख का उपाय करता है, तन ढ़कने को चिथड़े कहीं भी मिल जाते हैं। सरकारी महकमे उनके छप्पर उजाड़ देती और वे फिर कहीं जा बस्ते। दोपहर बीतने पर भी इन दोनों के न आने से मैंने चैन की सांस ली। शायद सरकार ने उस लड़की के छप्पर उतरवा दिए हो और वह कहीं और जा बसी हो गिलहरी कहीं जाए छुटकारा मिली। चलो अच्छा हुआ।
आम के पेड़ के नीचे, मैंने एक तुलसी की झाड़ लगा रखी है। वहां कौवों को कोलाहल करते देख जब मैं जिज्ञासा शांत करने पहुंचा तो पाया कि गिलहरी का धर गायब है और सिर वहां पर पड़ा हुआ है। मैं समझ गया आज उस बिल्ली का भाग्य बलवान था जो पिछले कई दिनों से गिलहरी के पीछे पड़ी थी। मैं उससे छुटकारा जरूर चाहता था किंतु पता नहीं क्यों मनवांछित परिणाम पाकर भी खुशी नहीं हुई। शाम को बाहर निकला तो पाया कि उस लड़की की मां आज भी वहीं फुटपाथ पर बैठी है। चेहरा कुछ व्यथित सा लगा। मैंने उत्सुकता बस उसकी लड़की के बारे में पूछा। उसने रोते हुए बतलाया, ‘कल रात कुछ लड़के सोते में उसे उठाकर ले गए। सुबह बड़े नाले के पास उसका शव पड़ा मिला, तन पर के चिथड़े अगल-बगल फैले थे, पूरे जिस्म पर चोट के कई निशान थे। उसके साथ बलात्कार किया गया था। उसी दौरान उसने प्राण त्याग दिए।’ उसकी मां ने बतलाया मोहल्ले के तीन-चार लड़के कई दिनों से उसकी ताक में थे। आज उन लड़कों के भाग्य भी बिल्ली के भाग्य की तरह बलवान निकले। मैंने एक बार उसे देख लेने की इच्छा से उसके बारे में पूछा। उसकी मां ने बतलाया, ‘हमारे पास जलाने को कुछ है नहीं, जगह भी नहीं मिलता, इसलिए कचरे वाली गाड़ी में डलवा दिए।’ मैं घर लौट आया। आधी रात गए तक नींद नहीं आ रही, खाना जैसे पैक करवा कर लाया था वैसे ही पड़ी है। मेरे दोनों दुश्मन एक ही दिन में मारे जा चुके हैं। दरवाजे पर बिल्ली और खिड़की पर नर-रूपी कुत्तों के कहकहे गूंज रहे हैं। पता नहीं प्रातः सूर्योदय होगी या भगवान लज्जा से आंख छुपा किसी घन अंधकार में जा छिपेंगे। आज शहर में दो मौतें हुई हैं जिसका जिक्र ना किसी अखबार में और न ही लोगों की जुबान पर आई है। दोनों मौतें एक दूसरे के समानांतर, एक दूसरे से नितांत भिन्न, एक दूसरे का प्रतिबिम्ब ।
- अमित कुमार मिश्रा।
सर्दियों के मौसम में मैं साढ़े सात के पहले कभी उठा होऊं यह याद नहीं आता। आज छ: बजे से ही मन में कुछ अजीब सी बेचैनी महसूस हो रही थी। बहुत कोशिश की लेकिन नींद नहीं आई। उठकर बाहर आंगन में चला आया। पटना में और आंगन, है ना आश्चर्य वाली बात। किराए के कई मकानों में रहने के बाद मुझे यह मकान रहने को मिला जो मेरे मन के अनुकूल था। मकान काफी पुराना था, प्लास्टर झड़ने लगी थी, लेकिन मुझे पसंद आया। काफी छोटा सा घर, एक तल्ला, दो कमरे, एक छोटा रसोई, एक स्नानगृह, बाहर छोटा सा आंगन और आम का एक पेड़। किराया मैं देने में सक्षम था अतः आ बसा। बीच-बीच में परिजन भी आते-जाते रहते थे अधिकांश मैं अकेले ही रहता। आंगन में पेड़ होने के कारण गौरैया, कौवा, गिलहरी, दिनभर शोर मचाते। कभी-कभी इनके कोलाहल से मन खिझ उठता लेकिन मन शांत होने पर अच्छा लगता। मकान के ठीक पीछे एक खाली प्लॉट था जिसमें आस पड़ोस के सूखे कचरे फेंके जाते थे।
इन दिनों मेरे प्रेम का पात्र कौन-कौन था यह गौण है, प्रमुख यह है कि मेरे क्रोध के केंद्र में दो प्राणी थें, एक गिलहरी जो अपनी चोरी के कारस्तानी से बाज नहीं आती और सूखने को फैलाए मेरे कपड़ों से रेसे खींचती रहती। दूसरी दस-बारह वर्षीय एक लड़की, जो पीछे कचरे से कबाड़ी चुना करती। एक दिन आंगन में एक गेंद आ गिरा। दो दिनों तक जब कोई दावेदार नहीं आया तो मैंने वह गेंद पिछली खिड़की से उस लड़की को दे दी। मेरी इस गलती का परिणाम यह निकला कि पिछले तीन महीनों से जिस घर के दरवाजे पर कोई दस्तक नहीं पड़ी थी इस घटना के अगले दिन उस घर की पिछली खिड़की जोर-जोर से खटखटाई गई। मैंने खिड़की खोल कर देखा तो वह लड़की अपने सामान्य सौंदर्य के साथ साक्षात दर्शन दे रही थी। उसका रूप बिल्कुल वही था जो आपके आस-पास कबाड़ी चुननेवालियों का होता है। खिड़की खुलते ही वह बोली, ‘आपका दिया गेंद लड़कों ने मुझसे छीन लिया, आप दूसरा दे दीजिए।’ मैंने झल्ला कर कहा, “इतनी सुबह गेंद मांगने आई हो।” “मैं कल दिन में आई थी बहुत पीटने पर भी आप खिड़की नहीं खोलें।” तब मुझे पता चला कि यह लड़की मेरे बाहर रहने पर भी आ चुकी थी। उस वक्त मुझे कुछ और सो लेने की इच्छा सता रही थी। मैंने उसे पांच का एक सिक्का देकर गेंद खरीद लेने को कहा। मुझे याद आया कि रात का कुछ खाना बचा रह गया है जिसे फेंकने से मैं बच सकता हूं मैंने वह खाना उठाकर एक पेपर पर रखा और उसे दे दी। वह मेरी दूसरी गलती थी, जिसका खामियाजा भुगतना बाकी था। इन्हीं दिनों दुकान से लाते समय मेरी चावल की थैली फटी और कुछ चावल दरवाजे के पास फैल गएं। उस पर अपना अधिकार जान गिलहरी उन्हें चुन-चुन कर खाती रही और आगे बढ़ती रही। अनायास ही उसने खुद को घर के भीतर पाया, अब भीतर आ ही गई तो डरना कैसा ? उसने पूरे घर का भ्रमण कर यह निश्चित किया कि मेरा रसोई घर उसके काम की जगह है। बस इसके बाद दरवाजे पर गिलहरी और खिड़की पर वह लड़की कब आ धमके कुछ पता नहीं। मैं दोनों पर झल्लाता, चिल्लाता, मारने को उद्यत होता, लेकिन दोनों पर ही डांटने का कोई असर नहीं था और जब मारने जाता तब हाथ नहीं आती।
आज नौ बज गए लेकिन दरवाजे पर गिलहरी नहीं आई। अचानक ध्यान आया खिड़की खटखटाया जाने का समय भी कब का गुजर गया लेकिन आज वह लड़की भी नहीं आई। वह नित्यप्रति खाने की चीजों के तलाश में आती और खिड़की खटखटा कर मुझे परेशान करती। गिलहरी का आवास आंगन का पेड़ था। वह लड़की और उसकी मां ने थोड़ी दूर पर सड़क किनारे टीन, बोरी, कुछ बांस और फटे कपड़ों से छप्पर बना रखा था। एक दिन पैदल लौटते समय वह लड़की अपने घर के पास मिल गई और उसने मेरा परिचय जबरन अपनी मां से करवाया। वहां रुकने में मुझे घुटन हो रही थी लेकिन मैं अपनी भलमनसाहत दिख लाने का मौका नहीं चुकता। अतएव थोड़ी देर खड़ा रहा। बातों बातों में पता चला इन लोगों का एक कुनबा है जो कहीं खाली और गंदी जगह देखकर आश्रय जमाता है और कबाड़ी बेचने जैसे धंधों से भूख का उपाय करता है, तन ढ़कने को चिथड़े कहीं भी मिल जाते हैं। सरकारी महकमे उनके छप्पर उजाड़ देती और वे फिर कहीं जा बस्ते। दोपहर बीतने पर भी इन दोनों के न आने से मैंने चैन की सांस ली। शायद सरकार ने उस लड़की के छप्पर उतरवा दिए हो और वह कहीं और जा बसी हो गिलहरी कहीं जाए छुटकारा मिली। चलो अच्छा हुआ।
आम के पेड़ के नीचे, मैंने एक तुलसी की झाड़ लगा रखी है। वहां कौवों को कोलाहल करते देख जब मैं जिज्ञासा शांत करने पहुंचा तो पाया कि गिलहरी का धर गायब है और सिर वहां पर पड़ा हुआ है। मैं समझ गया आज उस बिल्ली का भाग्य बलवान था जो पिछले कई दिनों से गिलहरी के पीछे पड़ी थी। मैं उससे छुटकारा जरूर चाहता था किंतु पता नहीं क्यों मनवांछित परिणाम पाकर भी खुशी नहीं हुई। शाम को बाहर निकला तो पाया कि उस लड़की की मां आज भी वहीं फुटपाथ पर बैठी है। चेहरा कुछ व्यथित सा लगा। मैंने उत्सुकता बस उसकी लड़की के बारे में पूछा। उसने रोते हुए बतलाया, ‘कल रात कुछ लड़के सोते में उसे उठाकर ले गए। सुबह बड़े नाले के पास उसका शव पड़ा मिला, तन पर के चिथड़े अगल-बगल फैले थे, पूरे जिस्म पर चोट के कई निशान थे। उसके साथ बलात्कार किया गया था। उसी दौरान उसने प्राण त्याग दिए।’ उसकी मां ने बतलाया मोहल्ले के तीन-चार लड़के कई दिनों से उसकी ताक में थे। आज उन लड़कों के भाग्य भी बिल्ली के भाग्य की तरह बलवान निकले। मैंने एक बार उसे देख लेने की इच्छा से उसके बारे में पूछा। उसकी मां ने बतलाया, ‘हमारे पास जलाने को कुछ है नहीं, जगह भी नहीं मिलता, इसलिए कचरे वाली गाड़ी में डलवा दिए।’ मैं घर लौट आया। आधी रात गए तक नींद नहीं आ रही, खाना जैसे पैक करवा कर लाया था वैसे ही पड़ी है। मेरे दोनों दुश्मन एक ही दिन में मारे जा चुके हैं। दरवाजे पर बिल्ली और खिड़की पर नर-रूपी कुत्तों के कहकहे गूंज रहे हैं। पता नहीं प्रातः सूर्योदय होगी या भगवान लज्जा से आंख छुपा किसी घन अंधकार में जा छिपेंगे। आज शहर में दो मौतें हुई हैं जिसका जिक्र ना किसी अखबार में और न ही लोगों की जुबान पर आई है। दोनों मौतें एक दूसरे के समानांतर, एक दूसरे से नितांत भिन्न, एक दूसरे का प्रतिबिम्ब ।
- अमित कुमार मिश्रा।
वाकई लाजबाव
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत आभार।
हटाएंअद्भुत!लड़की और गिलहरी यथार्थ की बूंदो से रसपान कर रही है , भाषा की एकरूपता बनी है ,भाव से भरा हुआ लड़की का गेंद लेने आना , पाठक को पढ़ने पर विवश करती है , अंत तक प पहुंच कर कहानी अपनी सी प्रतीत मालूम पड़ती है , आनेमित्र ! बहुत बढ़िया
जवाब देंहटाएंमिट्टी को स्पर्श कर सोना करने के लिए धन्यवाद किन शब्दों में दूं।
हटाएंअद्भुत!लड़की और गिलहरी यथार्थ की बूंदो से रसपान कर रही है , भाषा की एकरूपता बनी है ,भाव से भरा हुआ लड़की का गेंद लेने आना , पाठक को पढ़ने पर विवश करती है , अंत तक प पहुंच कर कहानी अपनी सी प्रतीत मालूम पड़ती है , आनेमित्र ! बहुत बढ़िया
जवाब देंहटाएंमर्मस्पर्शी कृति
जवाब देंहटाएंखूबसूरत कृति
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