शायरी के पन्नें ( शायरी )
शायरी के पन्नें।
अमित कुमार मिश्रा.
१.
मुझसे बेवफाई की,
तेरे लिए,
जा इतनी सजा काफी है।
मेरे किसी शेर में न अब,
तेरी जगह बाकी है।
२.
देख, तू जाते-जाते भी मुझे इनायत फरमा गई
बेवफा खुद बनी, मुझे जहां में शायर बना गई।
३.
सारा जहां तो बैरी है, किस-किस से अब मैं बचाऊं तुझे ?
सीना छलनी अपनों ने किया, ऐ दिल! कहां ले जाऊं तुझे ?
४.
खुदा के दरबार में मंज़ूर होगी उसी की प्रीत,
जो तैर कर जाएगा, धार के विपरित।
५.
ये नशीले नैन, रसीले होंठ, दीवाना बना कर रख देंगी
अगर हो जाए नजरे-करम,
‘अमित’ को बागी बना के रख देंगी।
६.
आप की गलियों में मेरा रोज का आना जाना है
आप मुझे नहीं जानती, मगर मेरा यह दिल,
सदियों से आपका दीवाना है.
कभी फुर्सत मिले दुनिया के झंझावातों से,
तो भीतर,
अपने भीतर झांककर देखिए
वहीं कोने में हमारा ठिकाना है.
७.
एक तेरे होने मात्र से रौशन-ए-बहार आ जाती है
जब-जब भूलना चाहूं तेरी सूरत याद आ जाती है।
गलतफहमियों के शिकार हैं रिश्ते
मैं भीतर आना चाहूं तो सामने किबार आ जाती है।
८.
चाहतों का सिला कहां मिलता है
उम्रभर निभे वह रिश्ता कहां मिलता है
हाथ तो अक्सर मिलाते रहते हैं ‘अमित’
दिल अब किसी से कहां मिलता है।
९.
इश्क के अभी कई रंग बाकी हैं
जाम पी ली है ‘अमित’,
अभी ज़हर की घूंट बाकी है।
जिंदगी से जीत की जश्न मनाने वाले
अभी इश्क का पहला वार बाकी है।
९०.
देखना है, दीवानगी के वार से
इश्क कहां तक महफूज रहती है।
हम आ गए हैं आपके शहर में
देखें, आप कब तक मुझसे दूर रहती हैं।
११.
क्या जरूरत है, मैं करूं किसी के अदा की अदायगी
मेरी चाहत में वह रवानगी है,
किसी पत्थर को भी चाहूं तो भगवान बना दूं.
१२.
किसी के इश्क में फना हो जाएं
किसी के हुस्न के कायल हो जाएं
कलियों ने तो गले लगाई नहीं ‘अमित’
चल किसी शम्मा के परवाने हो जाए.
१३.
आप थे जो हमारे रहगुजर
अक्सर हमारे घर,
बहारों का आना-जाना था.
अब तो ऐसी उदासी छाई है, फिजाओं में
हवाएं भी इधर से गुजरने में कतराती है.
१४.
तेरे कदमों में सर रख दूं
अपने खुदा से भी दगा कर लूं.
एक नजर देख तो मेरी तरफ
तेरी निगाह को आफताब कह दूं.
इसे समझ न मेरी आवारगी
दिल कहता है कि,
तुम्हें अपना खुदा कह दूं.
जमाने में किसी से डरता नहीं ‘अमित’
तू इशारा तो कर,
भरी महफिल में तुझे अपना कह दूं.
१५.
चांद को अपना कहने वाले
चांद की रजामंदी तो जान लेते,
इश्क के पनाह में आए हो
खुद को मिटाने का इंतजाम तो साथ लाते.
१६.
कुछ कहूं तो जमाने को पता लगने का डर है
२४.
अपने ही हाथों अपनी बर्बादी का फरमान लिख आया,
उसी के दरबार में गुनहगार साबित हुआ,
जिसकी खातिर मैं यह गुनाह कर आया।
२५.
परहेज आज भी नहीं है तुम्हें बुलाने में
मगर, सदियों लगेंगे तेरे दिए जख्म भुलाने में।
चलो यह भी अच्छी कहीं तुमने
क्यों वक्त जाया करें पास आने जाने में।।
१.
मुझसे बेवफाई की,
तेरे लिए,
जा इतनी सजा काफी है।
मेरे किसी शेर में न अब,
तेरी जगह बाकी है।
२.
देख, तू जाते-जाते भी मुझे इनायत फरमा गई
बेवफा खुद बनी, मुझे जहां में शायर बना गई।
३.
सारा जहां तो बैरी है, किस-किस से अब मैं बचाऊं तुझे ?
सीना छलनी अपनों ने किया, ऐ दिल! कहां ले जाऊं तुझे ?
४.
खुदा के दरबार में मंज़ूर होगी उसी की प्रीत,
जो तैर कर जाएगा, धार के विपरित।
५.
ये नशीले नैन, रसीले होंठ, दीवाना बना कर रख देंगी
अगर हो जाए नजरे-करम,
‘अमित’ को बागी बना के रख देंगी।
६.
आप की गलियों में मेरा रोज का आना जाना है
आप मुझे नहीं जानती, मगर मेरा यह दिल,
सदियों से आपका दीवाना है.
कभी फुर्सत मिले दुनिया के झंझावातों से,
तो भीतर,
अपने भीतर झांककर देखिए
वहीं कोने में हमारा ठिकाना है.
७.
एक तेरे होने मात्र से रौशन-ए-बहार आ जाती है
जब-जब भूलना चाहूं तेरी सूरत याद आ जाती है।
गलतफहमियों के शिकार हैं रिश्ते
मैं भीतर आना चाहूं तो सामने किबार आ जाती है।
८.
चाहतों का सिला कहां मिलता है
उम्रभर निभे वह रिश्ता कहां मिलता है
हाथ तो अक्सर मिलाते रहते हैं ‘अमित’
दिल अब किसी से कहां मिलता है।
९.
इश्क के अभी कई रंग बाकी हैं
जाम पी ली है ‘अमित’,
अभी ज़हर की घूंट बाकी है।
जिंदगी से जीत की जश्न मनाने वाले
अभी इश्क का पहला वार बाकी है।
९०.
देखना है, दीवानगी के वार से
इश्क कहां तक महफूज रहती है।
हम आ गए हैं आपके शहर में
देखें, आप कब तक मुझसे दूर रहती हैं।
११.
क्या जरूरत है, मैं करूं किसी के अदा की अदायगी
मेरी चाहत में वह रवानगी है,
किसी पत्थर को भी चाहूं तो भगवान बना दूं.
१२.
किसी के इश्क में फना हो जाएं
किसी के हुस्न के कायल हो जाएं
कलियों ने तो गले लगाई नहीं ‘अमित’
चल किसी शम्मा के परवाने हो जाए.
१३.
आप थे जो हमारे रहगुजर
अक्सर हमारे घर,
बहारों का आना-जाना था.
अब तो ऐसी उदासी छाई है, फिजाओं में
हवाएं भी इधर से गुजरने में कतराती है.
१४.
तेरे कदमों में सर रख दूं
अपने खुदा से भी दगा कर लूं.
एक नजर देख तो मेरी तरफ
तेरी निगाह को आफताब कह दूं.
इसे समझ न मेरी आवारगी
दिल कहता है कि,
तुम्हें अपना खुदा कह दूं.
जमाने में किसी से डरता नहीं ‘अमित’
तू इशारा तो कर,
भरी महफिल में तुझे अपना कह दूं.
१५.
चांद को अपना कहने वाले
चांद की रजामंदी तो जान लेते,
इश्क के पनाह में आए हो
खुद को मिटाने का इंतजाम तो साथ लाते.
१६.
कुछ कहूं तो जमाने को पता लगने का डर है
न कहूं तो दिल ही दिल में सुलगने का डर है।
जो न देखूं तेरी ओर, तो नजारों में कोई बात ही नहीं
देखूं तो इन निगाहों में डूब मरने का डर है।
१७.
वश इतनी तबियत बदली है,
सूरत-ए-शहर के बदलने से
पहले पीड़ा से दर्द उठता था,
अब दर्द उठता है पीड़ा से।
१८.
घर तो वश मुर्दा सामान है,
धड़कन, आपके कदमों की आवाज थी।
उसी दिन से गया नहीं मैं घर अपने,
जिस दिन आपके लवों पर,
लौटने से इंकार थी।
१९.
इस वीरान घर में
रौनक तो आ सकती थी
अब चिराग ही न रही तो
रौशनी की क्या बात हो।
२०.
नादान हैं जो हमें जिन्दगी की सबक देते हैं
जानते ही नहीं शायद,
ज़िन्दगी ने खुद हमी से कई पाठ पढ़ें हैं।
२१.
जो भी तीर चलाएं थें तुमने तिरछी निगाहों से
बामुरौवर एक एक जमा यहां हैं।
तेरे दिए जख्म भरे नहीं हैं अभी
हां, जख्मों को छुपाने का अंदाज नया है।
२२.
मुहब्बत की तमाम दफाओं में उसे मुजरिम ठहराया जाए
जो न देखूं तेरी ओर, तो नजारों में कोई बात ही नहीं
देखूं तो इन निगाहों में डूब मरने का डर है।
१७.
वश इतनी तबियत बदली है,
सूरत-ए-शहर के बदलने से
पहले पीड़ा से दर्द उठता था,
अब दर्द उठता है पीड़ा से।
१८.
घर तो वश मुर्दा सामान है,
धड़कन, आपके कदमों की आवाज थी।
उसी दिन से गया नहीं मैं घर अपने,
जिस दिन आपके लवों पर,
लौटने से इंकार थी।
१९.
इस वीरान घर में
रौनक तो आ सकती थी
अब चिराग ही न रही तो
रौशनी की क्या बात हो।
२०.
नादान हैं जो हमें जिन्दगी की सबक देते हैं
जानते ही नहीं शायद,
ज़िन्दगी ने खुद हमी से कई पाठ पढ़ें हैं।
२१.
जो भी तीर चलाएं थें तुमने तिरछी निगाहों से
बामुरौवर एक एक जमा यहां हैं।
तेरे दिए जख्म भरे नहीं हैं अभी
हां, जख्मों को छुपाने का अंदाज नया है।
२२.
मुहब्बत की तमाम दफाओं में उसे मुजरिम ठहराया जाए
आशिक की गुजारिश है, उसे सज़ा न सुनाई जाए।
यह आशिकों की मजलिस है यहां
किसी तीसरे को न लाई जाए।
२३.
इतनी गुजारिश है, हमारे पसीने को पानी न कहा जाए
यह आशिकों की मजलिस है यहां
किसी तीसरे को न लाई जाए।
२३.
इतनी गुजारिश है, हमारे पसीने को पानी न कहा जाए
आग को पानी, पानी को आग न बनाया जाए।
तुम कर लो सौदा, ऐसो-आराम की चीजों का
बस रोटी के मसले पर सियासत न की जाए।
तुम कर लो सौदा, ऐसो-आराम की चीजों का
बस रोटी के मसले पर सियासत न की जाए।
२४.
अपने ही हाथों अपनी बर्बादी का फरमान लिख आया,
उसी के दरबार में गुनहगार साबित हुआ,
जिसकी खातिर मैं यह गुनाह कर आया।
२५.
परहेज आज भी नहीं है तुम्हें बुलाने में
मगर, सदियों लगेंगे तेरे दिए जख्म भुलाने में।
चलो यह भी अच्छी कहीं तुमने
क्यों वक्त जाया करें पास आने जाने में।।
वाह अमित जी आप की लेखनी की जवाब नहीं
जवाब देंहटाएंलाजबाव लाजवाब
धन्यवाद।
जवाब देंहटाएंवाह! विलक्षण पंक्तियाँ 👏
जवाब देंहटाएं