तुम्हारा स्नेह, ( कविता )
तुम्हारा स्नेह। - अमित कुमार मिश्रा ‘मीत’.
मेरे प्राण
तुम्हें तब भी याद रखेंगे
जब जीवन में,
वह दौड़ चलेगा, जो
समर्पित होगा काल को।
धीरे-धीरे वह सब लौटाना पड़ेगा,मुझे
जो जीवन ने दिया था, कभी।
दृष्टि, श्रवन, वाक्,
कुछ भी तो नहीं रह पाएंगे
पास मेरे।
सभी लौटा लेने को उद्यत जीवन,
मेरे स्मृति शेष भी,
छीन ले जाएगा।
मैं कुछ नहीं रख सकूंगा
न रखने की लालसा है।
हां, बस तुम्हारा स्नेह,
मुझसे न दिया जाएगा।
गोपन रखूंगा मैं उसे,
वह मुझसे लौटायी न जा सकेगी।
मेरे प्राण
एक क्षण, बस एक क्षण,
ठगेंगे काल को।
और, सब कुछ यहीं छोड़ जाने के
नियम को तोड़,
तुम्हारी कुछ स्नेहिल यादें
मैं, उर की गहराई में छुपा
लेता जाऊंगा,
इस लोक से उस लोक तक।
मेरे प्राण
तुम्हें तब भी याद रखेंगे
जब जीवन में,
वह दौड़ चलेगा, जो
समर्पित होगा काल को।
धीरे-धीरे वह सब लौटाना पड़ेगा,मुझे
जो जीवन ने दिया था, कभी।
दृष्टि, श्रवन, वाक्,
कुछ भी तो नहीं रह पाएंगे
पास मेरे।
सभी लौटा लेने को उद्यत जीवन,
मेरे स्मृति शेष भी,
छीन ले जाएगा।
मैं कुछ नहीं रख सकूंगा
न रखने की लालसा है।
हां, बस तुम्हारा स्नेह,
मुझसे न दिया जाएगा।
गोपन रखूंगा मैं उसे,
वह मुझसे लौटायी न जा सकेगी।
मेरे प्राण
एक क्षण, बस एक क्षण,
ठगेंगे काल को।
और, सब कुछ यहीं छोड़ जाने के
नियम को तोड़,
तुम्हारी कुछ स्नेहिल यादें
मैं, उर की गहराई में छुपा
लेता जाऊंगा,
इस लोक से उस लोक तक।
वाह ! मार्मिक भावाभिव्यक्ति👏👏
जवाब देंहटाएंबहुत-बहुत आभार।
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