बेरोजगारी ( कहानी )

बेरोजगारी.     (कहानी)           
                                अमित कुमार मिश्रा।
लो भाई सुनो, मैं एक कहानी सुनाता हूं। मेरे पास कहानी सुनाने की ठोस वजह यह है कि मैं इन दिनों अबल दरजे का बेरोजगार हूं। इन दिनों मतलब अभी तक। आपके पास सुनने की क्या वजह है, आप जानो। मैं आपको यकीन दिलाता हूं जैसे ही मुझे कोई काम मिल जाता है मैं आपको कहानी सुना कर परेशान करना बंद कर दूंगा। अब मुझे काम कब मिलेगा यह तो भगवान भी नहीं जानता। वजह दो में से कोई एक है। पहला हमारी व्यवस्था (सरकार) निकम्मी है, जैसा मुझे लगता है; दूसरा मैं निकम्मा हूं, जैसा व्यवस्था समझती है। सही क्या है, पता नहीं। दोनों अपना-अपना तर्क लेकर मैदान में खड़े हैं।
खैर, इसका निर्णय बाद में होगा अभी कहानी सुनाता हूं। चूंकि किसी ना किसी को परंपरागत, कथानायक होना ही है; तो मैं ही क्या बुरा हूं। आज भी रोज की तरह अपने एक मित्र के पास से चाय पीकर मैं पैदल ही लौट रहा था। मैं अलग-अलग दिन अलग-अलग मित्र के पास जाता हूं जिससे उन पर भी बोझ न पड़े। जिस मित्र के पास आज गया था वह इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद अपनी कंपनी लगाकर जीविका चला रहा था। कंपनी का नाम उसने ‘ज्ञानी पंचर वाला’ रखा था जहां सभी कंपनी की साइकिल का पंचर बनाया जाता था। मेरे सभी मित्र कुछ न कुछ करने लगे हैं इसलिए अब मेरा समय गुजारना और भी मुश्किल हो चला है। ऐसा नहीं है कि मुझे काम नहीं मिला। मुझे शहर के एक कॉलेज में अध्यापन का काम मिला। चूंकि यह मेरा प्रिय कार्य था इसलिए मैं जी लगाकर पढ़ाने लगा। समय गुजरने लगा जेब से किराया लगा कर जाना पड़ता था। साल लग गया तब भी पैसे नहीं मिले। विभाग में जब बात की तो पता चला, इस देश में न जाने कितने पी.एच.डी करने वाले छात्र मुफ्त में पढ़ाने को जगह की मांग कर रहे हैं। उनका कहना था ‘तुम्हें काम मिला यही बहुत समझो, बेरोजगारी का कलंक तो मिटा।’ यकीन मानिए यदि मेरे पास किराए के पैसे होते तो मैं कलंक मिटाने के लिए मुफ्त में पढ़ाता रहता लेकिन मुझे मजबूरन फिर से अपना कलंकित मुंह लेकर जीना पड़ रहा है। मेरे एक प्रबुद्ध, राजभक्त मित्र ने मुझसे कहा- “तुमने परिश्रम ही नहीं की फिर नौकरी कैसे मिलेगी ? खामख्वाह सरकार को दोष क्यों देते हो ?”
मैंने अपने प्रमाण पत्र प्रस्तुत किए। उसका तर्क था ‘यह तो आजकल गदहों को भी मिल जाता है।’ सच कहता हूं पहली बार मुझे गुस्सा आया था। मैंने उसकी गिरेबान पकड़ ली और जोर से झकझोरते हुए कहा-
“ स्साले, प्रमाण पत्र बांटने वाले कार्यालयों में किस गदहे की औलाद को सरकार ने बैठा रखा है जो गदहों को घोड़ा होने का प्रमाणपत्र दे रहा है ?”
मेरे गुस्सा होने पर मुझे भी आश्चर्य था और उसे भी। उसने हकलाते हुए कहा-
“भाई मेरे कहने का मतलब...।” शायद मैंने उस दिन कुछ नशा कर रखी थी अन्यथा मुझ में इतना साहस कहां ? मैंने उसकी बात काटते हुए इस तरह कहा जैसे मेरी आवाज दिल्ली तक गूंज रही हो-
“यदि मैं योग्य हूं तो मेरा बेरोजगार होना सरकार की नाकामी है और यदि मैं अयोग्य हूं तो मेरा यह प्रमाणपत्र सरकार के निकम्मेंपन का प्रमाण है।”
उस समय हमारे कुछ मित्रों ने बीच-बचाव किया और मुझे चाय पिलाकर विदा की। सुनता हूं मेरे पीठ पीछे लोग मुझे पागल भी कहने लगे हैं। उन्हें लगता है कि मैं बस चाय पीने चार-चार, पांच-पांच किलोमीटर पैदल चला जाता हूं। सच तो यह है कि यदि मैं ऐसा न करूं तो मुझे अकेले बैठकर खुद की आवाज सुननी पड़ेगी। इन दिनों मेरे अंदर विद्रोह का स्वर फन फैलाने लगा है लेकिन मैं विश्व शांति में जहर नहीं घोलना चाहता। सड़कों पर इसलिए भटकता फिरता हूं कि यदि सड़क दुर्घटना में मारा गया तो सरकार पर यह कलंक तो नहीं लगेगा कि उसकी प्रजा भूख और बेरोजगारी से मर रही है।
माफ कीजिएगा, मैं फिर से भटक गया। आजकल हिंदी में फ्लैश-बैक कि जो हवा चली है मैं उससे लकवाग्रस्त हो गया हूं। इससे पहले कि आप पढ़ना छोड़ दें मैं अपनी औकात, नहीं, नहीं, अपनी आज की कहानी पर लौट आता हूं।
मैं जब मित्र के पास से चाय पीकर और सही मायने में अपना चार घंटे का फिजूल समय बीताकर लौट रहा था, अचानक एक स्कूटी मेरे पास आकर रुकी। वहां काफी अंधेरा था जिसके कारण स्पष्ट कुछ दिख नहीं रहा था। मैं डरते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा। स्कूटी सवार ने आवाज दी- “सुनो।” मैं रुकगया क्योंकि वहां कोई भी नहीं था और मैं बहुत डर गया था। उसने गाड़ी बिल्कुल पास लाकर कहा-
 “एक काम है, करोगे ?”
मुझे बेरोजगारी का कलंक इतना चुभ रहा था कि मैं कुछ भी करने को तैयार था तब भी मैंने संभलकर कहा-
“तुम्हें कैसे मालूम, मुझे काम की तलाश है ?”
वह जोर-जोर से हंसते हुए बोला- “अबे, तेरे जैसा बेरोजगार नहीं तो क्या कोई कलक्टर यहां पैदल भटकता फिरेगा ?”
मैंने डरते-डरते पूछा- “काम तो गलत नहीं है न ?”
वह मेरे सवाल पर हंसा और हंसी मिश्रित स्वर में ही बोला- “ साले! मैं सरकारी नौकरी देने के लिए यहां इंटरव्यू ले रहा हूं क्या ? काम गैरकानूनी ही है चाहिए तो बोल वरना आदमी की कमी नहीं है।” अंतिम बात कहते समय उसके स्वर में चेतावनी की आंच थी।
मैंने अभी तक अनगिनत परीक्षाएं दी थी, इंटरव्यू दिए थे लेकिन नौकरी नहीं मिली। यह जानते हुए कि मुझे अपराध के रास्ते पर ले जाया जा रहा है मेरे कदम डगमगा उठे। मैंने कमजोर आवाज में कहा-
“ मैं गैरकानूनी काम नहीं करूंगा; कोई अच्छा काम है तो बतलाओ।” उसने झल्लाकर कहा-
“अबे, मेरे पास नौकरी होती तो मैं खुद नहीं कर लेता।” कुछ रुककर उसने समझाने वाले लहजे में कहा-
“देख लाखों लोग हैं जो बेरोजगारी की मार झेलते झेलते गैरकानूनी रास्ते पर चलने को विवश हुए हैं, मैं भी उन्हीं में से एक हूं।” उसने जेब से निकालकर सिगरेट सुलगाई और दो कश लगाकर मेरे तरफ बढ़ाते हुए बोला-
“ आजकल दस-दस हजार में बंदे हत्या करने के लिए मिल रहे हैं, तुम्हें क्या लगता है कत्ल करना उनका शौक है ? नहीं उनमें से ज्यादातर बेरोजगारी और पेट की आग से मजबूर होकर ऐसा करते हैं।”
“ तू सोचता रह, मैं चला।”  कहते हुए उसने गाड़ी स्टार्ट कर दी। मैंने एक हाथ अपनी जेब पर फिराई जिसमें पांच-सात सिक्के पड़े थे, दूसरी हाथ पेट पर जो जेब की तरह ही खाली थी और लपककर उसकी गाड़ी पर बैठ गया।

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