न ही आते तो अच्छा था (कविता).



ऐसे आने से प्रिय तुम
न ही आते तो अच्छा था।
विरह अगन में जलना ही था
मन न मिलाते तो अच्छा था।
छोड़के ऐसे जाओगे गर
न ही आते तो अच्छा था।

प्रीत मुझे सिखलाया फिर क्यूं
जीवन गीत सुनाया था क्यूं
जब पतझड़ ही जीवन-नियति
ऐसे क्षण में सरस बसंत से
रो-रो कर मैं यही कहूंगी
न ही आते तो अच्छा था।

जब़्त आंसू के बंधन खोले
अधरों पर मुस्कान बिखेर
नयनों में उन्माद छिपाए
एक झलक दिखला जाते हो।
तेरी निष्ठुर आंख मिचौली,
से विनती मैं यही करूंगी-
ऐसे आने से प्रिय तुम
न ही आते तो अच्छा था।

मन-मंदिर में छवि बसाकर
हृदय में मिलन की आस जगाकर
जाना ही था मुझे भुलाकर
यादों की अंबार लगाकर।
ऐसे आने से प्रिय तुम
न ही आते तो अच्छा था।

© अमित कुमार मिश्रा।

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