तू दर्द देने आ जा ( ग़ज़ल)

तू दर्द देने आ जा...


तेरी बेवफाई भी कुबूल मुझे, तू लौट के आजा
तन्हा अब जिया जाता नहीं, खुशी नहीं तो ना सही तू दर्द देने आ जा।

हंसने की ख्वाहिश अब वैसे भी ना रही
चल तू मुझे बेखुदी में रुलाने आजा।

मैं अपने सीने पर सह लूंगा तेरी हर हरजाई
तू मेरी वफ़ा को आजमाने आजा।

यूं कहीं और बैठकर न जला मेरा दिल
तुझे भूल सकूं मुझे ऐसी कोई वजह दे जा।

न डर की 'अमित' थाम लेगा तेरा दामन
मैं मर सकूं बस मुझको यह इजाजत दे जा।

@ अमित कुमार मिश्रा।

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